एक बार नदी में बाढ़ आई। आसपास के बहुत से गाँव तबाह हो गये। लोगों के मकान, विशालकाय पेड़, पशु, फसलें सब बाढ़ में बह गये। अपनी शक्ति को देख नदी को घमण्ड हो गया। वह रोज समुद्र से अपनी ताकत का बखान करती। समुद्र ने उसे बहुत समझाया और घमण्ड को छोड़कर विनम्र बनने की शिक्षा दी, लेकिन नदी का अहंकार कम न हुआ।
एक दिन समुद्र ने नदी से कहा, “यदि तुममें इतनी ही ताकत है तो अपने साथ थोड़ी-सी घास बहाकर ले आओ।”
“नदी ने इसे मामूली काम समझा था, लेकिन बहुत प्रयास करने पर भी वह घास को नहीं उखाड़ सकी। मुलायम घास अपने विनम्र स्वभाव के कारण पानी के बहाव के साथ ही झुक कर बहने लगी। आखिरकार नदी प्रयास कर के हार गई। तब समुद्र ने फिर समझाया, “देखो, तुम पेड़, मकान आदि सबको इसलिए उखाड़ सकी क्योंकि वे कठोर और न झुकने वाले थे। लेकिन घास अपनी विनम्रता और झुकाने के स्वभाव के कारण ही मजबूती से जुड़ी रह सकी।” उसी दिन से नदी ने अहंकार छोड़ दिया, विनम्रता अपना ली।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
