Vikram or Betaal Story in Hindi : एक बार फिर, वीर विक्रमादित्य हाथ में तलवार लिए, पेड़ तक जा पहुंचा। हमेशा की तरह उसने शव को वृक्ष से उतारा व कंधे पर लादकर चुपचाप चल दिया। हालांकि, इस बार विक्रम थोड़ा शांत दिखा। उसने राजा विक्रम से कहा :- “मैं आगे होने वाली घटनाएं भी देख सकता हूं….राजा विक्रम! हो सकता है कि तुम्हें अपना अतीत बड़ा अच्छा व गौरवशाली दिखता हो, किंतु बता दूं कि अब से सैकड़ों वर्ष बाद, तुम ऐसा नहीं कर पाओगे।”
बेताल बड़ी उदासी के साथ, आने वाले कल की झांकी सुनाता रहा :- “आने वाले समय में चारों ओर अव्यवस्था होगी। कानून को कोई नहीं मानेगा। लंबे-लंबे युद्ध होंगे। तुम्हारे देश पर, दूसरे देश के ‘गोरों का राज होगा’।”
फिर वह बोला :- “ये शासक बड़े अलग तरीके से जिएंगे। ये कालीनों के बजाय लकड़ी के तख्तों पर बैठेंगे। इनकी औरतें पालकी में बैठने के बजाय घुड़सवारी करेंगी, ये पुरुष अपने सिर के बजाय दाढ़ी की हजामत कराएंगे।
यह सब सुनकर भी विक्रम चुप रहा, तो बेताल हैरान रह गया। उसने अपनी बात जारी रखी :- “विंध्याचल पर्वतों में धर्मपुर नामक राज्य होगा, वहां महाबल नामक राजा का शासन होगा।
राजा महाबल पर गोरों का हमला होगा। राजा के सिपाही गोरों से घूस लेकर, उसी के खिलाफ लड़ेंगे। ये लड़ाई तलवार व भालों से नहीं, बल्कि बंदूकों से लड़ी जाएगी। गोरे राजा को हरा देंगे। राजा अपनी पत्नी व पुत्री सहित रक्षा के लिए जंगलों में जा छिपेगा।
राजा अपनी पत्नी व पुत्री के साथ भीलों की बस्ती में पहुंचेगा। वे उस पर हमला कर देंगे। अपनी पत्नी व पुत्री की जान बचाते-बचाते राजा महाबल मारा जाएगा। फिर राजा की पत्नी व पुत्री घने वनों में जा छिपेंगी।”

राजा विक्रम चुपचाप चलता रहा और बेताल कहानी सुनाता रहा :- “जंगल से गुजरते पिता-पुत्र, औरतों के पैरों के निशान देखकर तय करेंगे कि उनकी जान बचाएंगे और आपस में तय करेंगे कि वे उन दोनों औरतों को खोज कर उनसे विवाह करेंगे। पिता बड़े पांव वाली स्त्री से विवाह रचाएगा तथा पुत्र छोटे पांव वाली को अपनी पत्नी बनाएगा।
पिता-पुत्र, भूखी-प्यासी व फटेहाल मां-बेटी को खोज लेंगे, जिनके पांवों में छाले पड़ गए होंगे। वे दोनों भी उन दोनों पुरुषों से मिलकर सुरक्षित महसूस करेंगी व उनसे विवाह के लिए मान जाएंगी।
छोटे पांव वाली रानी का विवाह पुत्र से होगा तथा बड़े पांव वाली राजकुमारी का विवाह पिता से होगा, क्योंकि पिता-पुत्र में पहले से ही वह तय था। समय बीतने पर दोनों स्त्रियों के यहां संताने होंगी।

बेताल ने कहानी समाप्त कर, राजा विक्रम से कहा :- “विक्रम! तू अब तक तो चुप रहा, किंतु अब तुझे बताना ही होगा कि उन बच्चों का आपस में क्या संबंध होगा।”
राजा विक्रम इस प्रश्न को सुन उलझन में पड़ गया। उसके पास कोई उत्तर नहीं था इसलिए वह चुप रहा। बेताल ने आह भरी व कहा :- “हे बुद्धिमान राजा! इतनी असफलताओं के बाद आज तुम चुप रहने में सफल रहे। अब तुम मुझे साधु के पास ले जा सकते हो।” उसने चेतावनी दी :- “वैसे राजा, मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि साधु की बातों में मत आना। वह तुम्हें दुर्गा के सामने सिर झुकाने को कहेगा। ज्यों ही तुम वहां शीश झुकाओगे, वह तुम्हारा सिर काट डालेगा। वह तुम्हारी बलि चढ़ाना चाहता है। वह अपने ध्यान में खलल डालने वाले हर राजा के साथ ऐसा ही करता है।”
राजा विक्रम ने बेताल की बात ध्यान से सुनी व चुपचाप चलता रहा। ज्यों ही राजा वहां पहुंचा, उसने साधु को बड़ी बेचैनी से प्रतीक्षा करते देखा। राजा, देवी दुर्गा की बड़ी मूर्ति के आगे जलती आग को देख सकता था।

राजा ने चुपचाप शव को कंधे से उतारा व साधु के आगे रख दिया। साधु प्रसन्न हुआ, उसने कुछ मंत्र पढ़े व दुर्गा की पूजा की। उस शव में जान आ गई। साधु ने राजा से कहा कि वह देवी दुर्गा को शीश नवाए।
विक्रम को बेताल की चेतावनी याद आ गई। वह एक क्षण सोचकर बोला :- “महात्मा। मैं तो एक राजा हूं। इन रीति-रिवाजों को अच्छी तरह नहीं जानता। कृपया मुझे बताएं कि इसे कैसे करते हैं, तब मैं इसे करूंगा।”
ज्यों ही साधु ने अपना शीश झुकाया। राजा ने झट से तलवार उठाई व उसका सिर काट दिया। इसी पल की प्रतीक्षा में बैठा बेताल, झट से साधु के शरीर में प्रवेश कर गया व ओझल होते हुए बोला, “विक्रम! तुमने इसे मारकर अच्छा ही किया। जो कोई तुम्हें मारना चाहे, उसे मारने में कोई अन्याय नहीं होता।”

स्वर्ग से यह सारी घटना देख रहे भगवान इंद्र, राजा विक्रम की वीरता से प्रसन्न हो गए। उन्होंने राजा से वर मांगने को कहा। राजा ने उन्हें धन्यवाद देते हुए विनती की :- “आने वाले युगों में मेरी वीरता व रोमांच की कथाएं संसार-भर में प्रसिद्ध हों।”
इंद्र देव ने वरदान देते हुए राजा से कहा :- “जब तक आकाश में सूर्य-चंद्र रहेंगे, तुम्हारे साहस की कथाएं युवाओं व वृद्धों द्वारा याद की जाएंगी।”
राजा विक्रमादित्य ने भगवान इंद्र को धन्यवाद दिया व रोगी के पुत्र सहित अपनी राजधानी उज्जैन लौट गए। इसके बाद, वे कई वर्षों तक न्यायपूर्वक शासन करते रहे।

