Umar, Iccha aur Paise ki Kahani
Umar, Iccha aur Paise ki Kahani

Hindi Poem: जब छोटे थे, जेब में सिक्के भी नहीं थे,
पर सपनों के झोले में बादल भरे कहीं थे।

सोचा था, बड़े होकर सब पा लेंगे,
पैसे भी होंगे, ठाट से जी लेंगे।

जवानी आई — उमंगों की थी बरसात,
जेब में तूफ़ान नहीं, बस खाली हालात।

जॉब मिली तो तनख्वाह ने मज़ाक किया,
मन बोला “शाबाश”, जेब ने इंकार किया!

हर महीने का आख़िरी हफ़्ता भारी पड़ा,
पर्स ने कहा — “भैया, अब तो मैं भी अड्डा छोड़ चला!”

सोचा, “चलो कोई बात नहीं, बुढ़ापे में राज करेंगे,”
थोड़े पैसे बचा लेंगे, चैन से आज रहेंगे।

पर हाय रे किस्मत — जब पैसा होगा भी,
तो इच्छा कहेगी, “अब दम कहाँ बचा जी!”

जोश था तब, तो जेब खाली थी,
अब जेब भरी है, तो चाल धीमी और सांसें खाली सी।

जिन ख्वाहिशों को वेतन में पूरी न कर पाए,
पेंशन तक आते-आते, वो खुद ही दम तोड़ जाएं।

ज़िंदगी का यही हिसाब है प्यारे,
उम्र, इच्छा और पैसे —
तीनों कभी साथ नहीं रहते बेचारे!