Grehlakshmi Kavita: चलते चलते क्यों रुक सी गई हैं जिंदगी
परेशान हर लम्हा क्यों हो रही हैं जिंदगी
जीने का मज़ा क्यों छीन रही है जिंदगी
खामोश थे लम्हें क्यों बुलवा रही हैं जिंदगी
रुके से कदमों को क्यों खींच रही हैं जिंदगी
अनजाने थे ये रास्तेंं क्यों बहका रही हैं जिंदगी
शमा से खामोश जल रहे थे क्यों हवा बन गई जिंदगी
शांत पानी की लहरों में क्यों कंकर डाल रही जिंदगी
शायद महिब्बत के भंवर में उलझ सी गई हैं जिंदगी
