"तृप्ति"-गृहलक्ष्मी की कहानियां
Tripti

Hindi Short Story: “क्या साक्षी तुम हर वक्त इस कोप भवन में बैठी रहती चलो बाहर मम्मी बुला रहीं”
“समर्थ कम से कम तुम तो मेरी ख्वाबगाह मेरे स्टडी रूम को कोपभवन मत कहो” मम्मी जी का क्या उन्हें मेरा लिखना पढ़ना कब रास आता है ?
सुबह से रात तक घर के सब काम निबटा कर अपना खाली वक्त मैं खुद के साथ यहां बिताती उस पर भी उनकी भृकुटि तनी रहतीं।

अच्छा बाबा माफ करो अब चलो मेरी मल्लिका उसके इतना कहते ही दोनों हंसते हुए बाहर आए।

साक्षी कल मैं कुछ समय के लिए तेरी मौसी सास के पास जा रही पीछे तुझे सब अच्छे से संभालना… जी मम्मी जी कहते साक्षी किचन में आ गई।

गैस जलाते ही अचानक ब्लास्ट और सब राख
समर्थ और उसकी मां भागते हुए पहुंचे…
जब तक साक्षी को ले जाया गया डॉक्टर ने जवाब दे दिया।

पन्द्रह दिन बाद साक्षी के जाने के बाद से बंद पड़ा स्टडी रूम खोला गया समर्थ की आंखें खुली की खुली रह गईं….

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किताब के पन्ने अपने आप पलट रहें कप में चम्मच वैसे ही चल रही जैसे साक्षी चीनी मिलाती थी…. समर्थ को अपनी आंखों पर यकीन नही हुआ।

चार दिन बाद कनागत शुरू हुए पंडित जी आएं उन्हें सारा घटनाक्रम समर्थ ने चुपचाप बताया कि कहीं उसकी मां सुनकर बेवजह परेशान ना हों।

देखो समर्थ बेटा आत्मा अपने प्रियजनों से अपने प्रिय कार्य के लिए चीज़ों के लिए तब तक हमारे आस-पास होतीं हैं जब तक घर की शुद्धि ना हो जाए फिर साक्षी बिटिया तो बहुत पुण्य आत्मा थी वो किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाएंगी हो सकता है जो तुमने देखा वो सच हो।

ऐसा करो पिंडदान श्राद्ध कर्म करके यजमानों को यथायोग्य आदर सत्कार करके भोज कराओ जिससे साक्षी की आत्मा को मुक्ति मिल सके।

समर्थ ने हवन पूजन के बाद स्टडी रूम को आस-पड़ोस के लोगों के लिए को लाइब्रेरी के रूप में तैयार कर हमेशा के लिए खोल दिया।