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गृहलक्ष्मी की कहानियां - पीतल का लोटा
Stories of Grihalakshm

गृहलक्ष्मी की कहानियां – जिस घर में लड़की ने जन्म लिया हो, जिस घर में उसका बचपन गुजरा हो और जिस घर से उसकी हजारों खट्टी-मीठी यादें जुड़ी हो, शादी के बाद वही घर लड़की के लिए इतना अजनबी क्यों बन जाता है कि उसे अपने अधिकारों को भी भूलना पड़ता है। वन्दना ने हमेशा न्याय की बात कहना अपना धर्म समझा। यही कारण रहा कि वह सबकी प्रिय रही मगर शादी के बाद उसे अपने मायके में झिझक लगने लगी, इसका एक मूल कारण शायद उसकी मां का स्वर्गवास ही रहा।

उसके तीनों भाई-भाभियां एक घर में रहते हुए भी अलग-अलग रहते थे और पिताजी वैसे तो स्थायी तौर पर मां के जाने के बाद से बड़े भाई के साथ ही रहते थे लेकिन उनका थोड़ा बहुत सामान नीचे छोटे भाई के घर में भी एक छोटे संदूक में पड़ा रहता था। तीनों भाई नरम स्वभाव के थे मगर भाभियों के बीच अक्सर खटपट हुआ करती थी। वन्दना जब भी दो-चार दिनों के लिए मायके आती तो भाभियों के बीच होने वाले झगड़ों की वजह से उसका दिमाग तनाव में रहता था। झगड़ों की वजह कोई बहुत बड़ी नहीं थी बल्कि पिताजी के उस संदूक का सामान था, जिसका उन्होंने बंटवारा नहीं किया था। अब वन्दना करीब एक महीने के लिये मायके आई थी क्योंकि उसका स्वास्थ्य थोड़ा ज्यादा खराब था।

वन्दना को मायके आये अभी चार दिन ही हुये थे। वह ऊपर छत पर धूप में बैठकर बाल सुखा रही थी कि नीचे से तेजी की आवाजें आई, वन्दना नीचे उतरकर आई तो उसने देखा छोटी भाभी पिताजी को खूब खरी -खोटी सुना रही थी और पिताजी अपने आंसू पोंछ रहे थे। पूछने पर पिताजी ने बताया कि वह नीचे रखे अपने संदूक से अपना कोट निकाल रहे थे मगर छोटी बहू समझी कि वह कुछ और ही चीज निकालकर ऊपर बड़ी को चुपचाप देने जा रहे हैं। इतनी बात पिताजी के मूंह से सुनकर बड़ी और मंझली बहू भी निकल आई। बड़ी बहू कहने लगी।

‘‘तुझे शर्म नहीं आती ऐसा करते हुए, आखिर कौन-सी चीज उठा लाये पिताजी ऊपर-? 

छोटी बहू भन्ना कर बोली? ‘‘क्यों ले नहीं जाते क्या-पिताजी तो मेरे साथ हमेशा ही पक्षपात करते हैं बड़े बेटे पैसे वाले हैं तो उनके ही घुसते हैं।”

‘‘तो तेरे यहां आकर क्या करें? तू तो उन्हें पीने तक को पानी नहीं देती- ” बड़ी बहू ने कहा तो मंझली ने उसका समर्थन किया।

‘‘तुम तो ऐसा कहोगी ही। यदि तुम पिताजी को खिला-पिला रही हो तो यह तुम्हारा फर्ज है तुम बड़े हो और फिर पिताजी चुपके -चुपके संदूक में से ले जाकर सामान नहीं पकड़ाते रहते क्या तुम्हें ऊपर।”

छोटी बहू की ऐसी बातों से दुखी होकर पिताजी अपना सिर पकड़ कर बैठ गए। वन्दना से अपने बूढ़े पिता ही दयनीय दशा देखी नहीं गई।

क्रोधित स्वर में वह अपने पिता से बोली, ‘‘यह सब आपकी गलती के ही कारण हो रहा है पिताजी। जब सब कुछ आपने बांटकर दे दिया अपने बेटों को तो आपने अपना संदूक क्यों नीचे रख छोड़ा है। जब आप ऊपर रहते हैं, ऊपर ही खाते -पीते हैं तो आपको संदूक भी ऊपर रखना चाहिए था ना। आप अपनी जरूरतों की चीजें लेने ना बार-बार नीचे जाकर संदूक खोलेंगे और ना छोटी भाभी के मन में यह संदेह पैदा हो…।”

हालांकि वन्दना ने न्याय संगत बात ही कही थी और अपने पिता से ही कही थी मगर छोटी बहू तिलमिलाकर वन्दना पर ही बरस पड़ी, ‘‘दीदी -तुम इस घर की बेटो हो, बेटी ही रहो। तुम घर के मामले में बोलने का कोई हक नहीं है, तुम क्या यहां फूट डालोगी?” वन्दना को छोटी भाभी से ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी उसको बहुत ठेस लगी। वह आंसुओं से भीगे स्वर में बोली, ‘‘इसमें मैंने गलत क्या कहा भाभी-? मैंने आपसे तो कुछ नहीं कहा? क्या मुझे अपने पापा से भी कुछ कहने का अधिकार नहीं है-?”

‘‘नहीं है, तुम्हें क्या मतलब, तुम्हारी शादी हो चुकी है तुम बहन बेटी हो वही बनकर रहो-” छोटी बहू बोली।

‘‘लानत है ऐसी बहन-बेटी पर जो इंसाफ की बात नहीं कह सके- ” वंदना भी गुस्से से बोली।

‘‘आने दो शाम को तुम्हारे भैया को, देखना तुम्हारी क्या हालत करवाती हूं” छोटी बहू वन्दना से धमकी भरे स्वर में बोली।

वन्दना के दिल को छोटी बहू की इस भाषा से बहुत आघात लगा। सिर्फ वन्दना ही नहीं, पिताजी भी से बहुत आहत हुए और अपना क्रोध काबू में ना रख सके। वह क्रोध में अपने हाेंठ दबाते हुए नीचे गये और अपना संदूक निकालकर उसका सारा सामान बीच आंगन में निकालकर पटकते गये फिर आहत स्वर में बोले, ‘‘यही है ना क्लेश की जड़ बहू जिसके लिए आज तुमने मेरी बेटी को पराया बना दिया, देखो इस संदूक में क्या है-?”

तीनाें बहुएं बड़े गौर से संदूक में से निकले सामान को देखने लगीं। उस सामान में एक गर्म शाल, कुछ वन्दना की मां की तस्वीरें, कुछ किताबें और एक पीतल का छोटा लोटा था। पिताजी भर्राए स्वर में बोले, ‘‘ये किताबें मेरी जीवन साथी रही है इन्हें ही मैं जब कभी पढ़ने के लिए निकालकर ले जाता रहा हूं। आज इनका भी बंटवारा कर लेना, मगर भगवान के लिए ऐसे नीच वचन मत बोलो-” पिताजी हाफंने लगे थे, शायद उनके अंदर शारीरिक पीड़ा की भी कोई लहर उठी थी।

वन्दना पिताजी को संभालने के लिए बढ़ती इससे पहले ही पिताजी ने पीतल का लोटा उठाया और वन्दना से बोले, ‘‘बेटी-अपने पिता को क्षमा कर देना। आज मेरे कारण तुम्हारा इतना अपमान हुआ है और हां बहुओं, यह लोटा तो एक ही है इसके तीन हिस्से करना संभव नहीं है इसलिए ऐसा करना जब मैं मरूं तो इस लोटे में ही मेरे लिए घी भेज देना क्योंकि ऐसे ही एक लोटे में तुम्हारी सास के लिए भी घी गया था।”

इतना कहकर पिताजी लोटा आंगन में पटक घर से बाहर की ओर चले गये। तीनों बहुएं भी अपने काम में लग गई और वन्दना, वह आंगन मे बिखरी किताबों पर सिर रखकर सिसकने लगी।

पिताजी धीरे-धीरे कछुआ चाल की तरह श्रीराम मंदिर की ओर बढ़े जा रहे थे।
अभी उन्होंने मंदिर की दो-तीन सीढ़िया ही चढ़ी थी कि अचानक सीना थामे वही बैठ गये और उनका सिर एक ओर लुढ़क गया। एक व्यक्ति जिसका नाम कृपाराम था वह यह सब देखते ही मंदिर के सामने बनी अपनी दुकान से नीचे उतरा और दौड़कर वहां आया उसने सीढ़ियों पर निगाह डालते ही कहा,

‘‘अरे, यह तो ईश्वर प्रसाद हैं। हे भगवान, इन्हें क्या हुआ?” फिर उसने उनकी नब्ज देखी और उदास मन से उनके घर की ओर चल दिया।

वन्दना को आंगन में बैठे-बैठे काफी देर हो गई थी, बड़ी बहू नीचे आई और वन्दना से बोली, ‘‘वन्दना, चलो उपर चलो तुम्हारी तबियत ठीक नहीं।”

‘‘अभी आ जाएंगे, तुम चलकर खाना खालो…।”

बड़ी बहू ने इतना कहकर आंगन में बिखरी किताबें एक ओर उठाकर रखी। छोटी बहू अपने कमरे में से सब कुछ देख रही थी जैसे ही बड़ी ने एक तरफ लुढ़का पीतल का लोटा उठाया, छोटी बहू ने आंगन में आकर उससे लोटा छीनकर कहा, ‘‘तुम इसे नहीं ले जा सकतीं, इसे मैं लूंगी…।”

बड़ी बहू सिर हिलाकर बोली, ‘‘तूने वाकई गजब कर दिया है मैं उठकर किताबों के पास रख रही थी ना कि ले जा रही थी।”

मंझली ऊपर के आंगन से ही झांककर बोली, ‘‘और फिर इसे लेने का अधिकार तुझे ही कैसे मिल गया। पिताजी की हर चीज पर तीनों का हक बराबर है…।”

वन्दना की कनपटी सुर्ख हो उठी उसने अपने हाथों में लोटा लिया और कुछ कहती इससे पहले ही बाहर से आवाज आई, ‘‘बेटी वन्दना–।”

वन्दना ने बाहर आकर देखा। कृपाराम को वह एक दृष्टि में ही पहचान गई और बोली, ‘‘ चाची जी आप कहिए कैसे आना हुआ?

‘‘ गजब हो गया बेटी अपने भाइयों को दफ्तर से बुलवा लो। तुम्हारे पिताजी का मंदिर की सीढ़ियों पर हृदय की गति रुकने से देहांत हो गया।”

‘‘नहीं…पिताजी..” वन्दना का दिल दहल उठा। जैसे ही उसे अपने हाथ में पीतल का लौटा होने का अहसास हुआ वह बिलखकर रो पड़ी।