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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

ना यहाँ कोई रेलवे स्टेशन था और ना बस स्टैंड, फिर भी वह 40 मिनट से सड़क के किनारे खड़ा था, पहियों वाले सूटकेस का हैंडल पकड़े। शरीर का वजन कभी एक पाँव पर तो कभी दूसरे पर डालता। कोई भी उसे देखकर कह सकता था कि वह यहाँ का नहीं है। और शायद यहाँ होना भी नहीं चाहता। फिर भी जबरदस्ती अपने को रोके हुए है। पास से गुजरते बुजुर्ग को देखकर वह यूँही पसीना पोंछने के लिए मुँह पर हाथ फेरने लगा। बुजुर्ग अपने ख्यालों में गुम थे, पर उसे देखकर जरा थमके। फिर चार-पाँच कदम चलकर रुक गए। वापस आए।

‘किसके यहाँ जाना है बेटा…?’

‘जी…’ वह हकलाया ‘जी…वो…रधुवंशी….’ उसने थूक गटका।

बुजुर्ग ने हैरानी से देखा, कुछ देर रुककर, बोले, ‘इसमें घबराने की क्या बात है? रधुवंशियों के यहाँ जाना है न, वो गली में कोने से अगला मकान….तू ठीक तो है न…?’

शायद माथे पर पसीना ज्यादा आ रहा था। या फिर चेहरा बिगड़ गया था। अपने चेहरे के प्रति इतना सेंसटिव वह कभी नहीं हुआ था। दो क्षण खड़े रहकर बुजुर्ग गर्दन हिलाते हुए फिर आगे बढ़ गए।

चमचमाते काले जूते, बहुत हल्के पीले रंग पर गहरी पीली बुंदकियों वाली कमीज, धारियों वाली ग्रे पैंट, साँवली रंगत और बाल कुछ उड़े हुए…स्पष्ट था कि तीस के आसपास का यह व्यक्ति किसी अच्छे परिवार से है। पर गर्मी की इस दोपहरी में सड़क किनारे खड़ा होना आखिर उसकी कौन सी मजबूरी है? और उस सूटकेस में क्या है जिसकी वह इतनी हिफाजत कर रहा है। और रघुवंशी का मकान सामने ही है तो वह जाता क्यों नहीं?

आखिर वह अपनी जगह से हिला। झिझकते हुए रधुवंशी के मकान की ओर बढ़ा। इस तरह कि जैसे जरा सा खटका होते ही वापस दौड़ पड़ेगा। दरवाजे तक पहुँचकर फिर वही ऊहापोह शुरू। तभी अंदर से किसी महिला की भारी आवाज आई, ‘हाँ जी! किससे मिलना है, अंदर आ जाओ…’

‘जी…म..म..मानव..’ वह और नहीं बोल पाया।

अंदर सन्नाटा पसर गया। कोई आवाज नहीं। कुछ क्षण बाद महिला बाहर आती दिखाई दी। ढीला-ढाला, छींट वाला मेहंदी रंग का सूट, कोई पचास वर्ष की होंगी। लाली मिला हुआ गोरा रंग, भारी शरीर। वह उस आदमी को ऐसे देख रही थी, जैसे शहर में तेंदुआ घुस आया हो।

‘क्या काम है?’

अब तक वह कुछ संयत हो चला था। ‘मैं मानव का दोस्त हूं…’

वह कुछ शांत हुई पर चेहरे पर अब भी संशय था, ‘अंदर आ जा भाई’

अंदर आते-आते उसे सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए कुछ ऊँची आवाज में बोली, ‘मीतो…..पानी ले आ एक गिलास…’

फिर उसकी ओर घूमकर बोली, ‘आराम तै बेठजा…मैं मानव की माँ हूँ..मानव के साथ तन्नै देख्या तो नहीं कभी…अर भाई, तन्नै शायद पता नहीं कि मानव…।’ वह सामने गद्देदार कुर्सी पर धंसकर बैठ गई।

‘वो …मैं जानता हूँ जी….उससे तीन साल पहले मिला था….’ उसने फिर थूक गटका। वह सोफे पर जरा सा ही टिका बैठा था, आगे की ओर झुका हुआ, कोहनियाँ घुटनों पर, बेचौन, अस्थिर। कभी चेहरे पर हाथ फिराता, कभी कालर सीधा करता। शायद बहुत कुछ कहना चाहता था पर शब्द नहीं मिल रहे थे। महिला की शक भरी नजरें अपने चेहरे पर महसू
स कर वह परेशान हुआ जा रहा था। फिर जल्दी से उसने सूटकेस सामने की मेज पर रखा और चेन खोलकर ढक्कन उठाया। महिला की आँखें फटी की फटी रह गईं। बैग पाँच सौ के नोटों की गड़ियों से ठसाठस भरा था। वह उठकर भागने के लिए और तत्पर दिखा। उसका चेहरा सफेद पड़ता जा रहा था। किसी तरह हिम्मत कर बोलना शुरू किया, ‘जब मानव का एक्सीडेंट हुआ तब मैंने ही आपको फोन पर सूचना दी थी…उसके पास से जो रुपये ।

अचानक महिला हिस्टीरियाइ ढंग से दहाड़ी, ‘मीतो….पकड़ इसनै…सेठ जी न बुलाइये भाजकै…’

मोटी होने के बावजूद वह फुर्ती से उठकर उस पर झपटी। तय था कि हाथ आ गया होता तो मार डालती। उसकी चीख सुनकर मीतो भी तेजी से बाहर आई पर जब तक माजरा समझती, वह तीर की तरह दरवाजे से निकल गया।

साथ ही चिल्लाया, ‘सूटकेस में चिट्ठी है जी…सब लिखा है….’

वे दोनों भी पीछे भागी। वह झपटकर बाहर आया कुछ देर दौड़ा। महिला की दहाड़ें पीछे छूटती गई। शुक्र है कि इस बीच गली में कोई नहीं था। मोड़ से मुड़ते ही खुद को सामान्य करने का प्रयास करते हुए तेजी से चलने लगा। यह बात अलग है कि पसीने भरे चेहरे और उखड़ी साँसों ने उसके रोम-रोम को असामान्य बना दिया था। हर पल यही लग रहा था कि कोई उसे देख रहा है, या फिर सभी उसी को घूर रहे हैं। जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश में चेहरा बिगड़-बिगड़ जा रहा था। वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था। गर्मी की दोपहरी में सड़क पर लोग न के बराबर थे। काफी दूर निकलकर मुख्य सड़क पर आते हुए वह एक पेड़ के नीचे रुका और साँसें सामान्य करने के लिए झुककर घुटनों पर हथेलियाँ टिकाकर आँखें बंद कर लीं। धड़कनों की धुकर-धुकर उसे इतनी तेज और ऊँची कभी नहीं लगी थी। मुँह खोलकर गहरी-गहरी साँसें भरता वह काफी देर में शांत हुआ।

जरा साँस आई तो सीधा हुआ। कमर पर उल्टी हथेलियाँ टिकाकर एक बार फिर पीछे झाँका और चल दिया सामने नजर आ रहे बस स्टॉप की ओर। उसने चलते-चलते खूब जोर से उछलकर सीधे हाथ की मुट्ठी हवा में उछाली। मुँह से किलकारी निकली। ऐसा प्रफुल्लित कि जैसे कोई किला फतह कर आया हो। फिर मस्त चाल से चल दिया। सीटी बजाता, जेबों में हाथ डाले। आखिर इतना पैसा फेंककर आने वाला इतना खुश कैसे हो सकता है?

बस स्टाप पर दो-तीन मिनट ही खड़ा हुआ था कि बस भी आ गई। वह किसी किशोर की तरह उछलकर बस में चढ़ा, यूँ ही रौ में कंडक्टर की ओर देखकर मुस्कुराया। बस चल दी। पीछे से तीन-चार लोग दौड़े आते दिखाई दिए। सबसे आगे एक विशालकाय आदमी जो सफेद पजामे और चेक की कमीज में था और जिसके एक पैर में थोड़ी लचक थी। उसके काफी पीछे धोती पहने और सिर पर काली टोपी रखे एक बुजुर्ग, जो बुरी तरह हाँफ रहे थे। उनके साथ-साथ चार-पाँच लोग और। बस लगभग खाली थी, उसने खुशी-खुशी कंडक्टर से बस धीमी करने की प्रार्थना की कि इन सवारियों को भी ले लो। बस धीमी होते-होते आगे वाला व्यक्ति पास पहुँच चुका था।

उसने सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया। आज तो कोई प्राण भी माँगता तो वह निकालकर दे देता। तभी अनहोनी हो गई। भागते व्यक्ति ने बजाय हाथ थामकर बस में चढ़ने के झटके में उसे नीचे खींच लिया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, पीछे दौड़कर आते सब लोग भी उस पर बुरी तरह पिल पड़े। वह लातों, घूसों पर तुल गया। उन लोगों के मुँह से मोटी-मोटी गालियाँ निकल रही थीं। विशालकाय आदमी ने कसकर उसके पेट में लात जमाई, वह दर्द से दोहरा हो गया। चोटों से बचने के लिए शरीर जकड़ लिया। उन्होंने और बुरी तरह पीटना शुरू किया। जरा सी देर में उसकी जकड़न कम होती गई और उसका शरीर ढीला पड़ गया।

बस कुछ दूर जाकर रुक गई थी, पर किसी की हिम्मत नहीं हुई बीच में आने की। उसे पीटने वाले बुरी तरह हाँफ रहे थे। पर रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसे ढीला पड़ते देख बुजुर्ग ने उखड़ी साँसों को काबू करते हुए जोर से कहा, ‘बस रै पावन, मर जै गा…इसनै घराँ ले चलो…ओढै ए देवखेंगे….’

उसके शरीर पर कोई जख्म नहीं लगा था। बस नाक से जरा सा लहू झलक रहा था। उसकी आँखें खुली थीं। शरीर इतना ढीला पड़ गया था कि शायद अब उसे बर्फ पर लिटाकर हंटर भी बरसाए जाते तो वह उफ तक न करता। आनन-फानन में उसे ऑटो में डालकर वे वापस रघुवंशियों के मकान तक ले आए। अब गली सुनसान नहीं थी। चिलचिलाती धूप में भी मकान के सामने अच्छी-खासी भीड़ जमा थी। मानव की माँ किसी शेरनी की तरह दरवाजे पर खड़ी थी। आँखें क्रोध से चौड़ी और आँसुओं से भरी हुई। ऊँची आवाज में सबकी बातों का जवाब देते हुए वह बेहद व्यग्र थी।

आटो के रुकते ही सबने उसे घेर लिया। पावन ने उसे बेरहमी से बाहर घसीटते हुए सड़क पर गिरा दिया। वह किसी आलू के बोरे सा सड़क पर पड़ा रहा। महिला ने उसकी छाती पर दोहत्थड़ जमाया और रुदन के स्वर में गर्जी, ‘के बिगाड़ा था मानव नै तेरा…के सोचकै तन्नै म्हारे घर का चिराग बुझाया…’ वह चिल्लाती जाती और दोहत्थड़ जमाती जाती। आसपास के लोग भी गुस्से में उस पर थप्पड़-मुक्के जमा देते। कुछ देर के लिए वह फिर लातों-घूसों पर था। बस, फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार वह प्रतिवाद नहीं कर रहा था। नाक से निकली खून की लकीर और लंबी हो गई थी।

बुजुर्ग ने महिला को पकड़ा और रोते-रोते बोले, ‘इब रुकजा भागवान…देख यो मर ज्यागा..’

‘इसकी जान ले के ही सकून आवैगा मन्नै…चौ फांस्सी हो…’

बुजुर्ग ने उसे कसकर पकड़ लिया। दूसरों ने भी अब हाथ रोक लिए थे। उन्हें भी शायद हालत की गंभीरता का अंदाजा होने लगा था। बुरी तरह घायल व्यक्ति ने धीरे से हाथ उठाया और कुछ कहने की कोशिश की। पर खाँसी आई और थूक के साथ खून के छींटे उड़ आए। हल्की पीली कमीज खून से सन गई। कुछ देर डूबती साँसों को संयत करने के बाद वह फिर कुछ बोलने की कोशिश करने लगा पर बोल न पाया। मुँह से अटक-अटक कर कुछ शब्द निकले, ‘बैग…चिट्ठी…’

महिला को याद आया। उसका रोना थम गया। ‘भित्तर देखिए…रुपयाँ का बैग गेर के गया था यो…उसी मैं तो ना है कोई चिट्ठी….!!’

अब उसे पीटने वाले भी उसपर तरस खा रहे थे। गली वालों के साथ-साथ अब तममशबीन भी जुट आए थे। मजमा और बड़ा हो चला था।

पावन अंदर से आया तो उसके हाथ में एक कागज था, जिसे वह चलते-चलते पढ़ने की कोशिश कर रहा था। सबकी आँखें उसी पर थी पर वह जैसे जड़ हो गया था।

‘बोलदा क्यूं नी रे…के लिख्या है इसनै…ए पावन…पढ़दा क्यूं नी…’ वह अब क्रोधित होने लगी थी। समूह में खुसर-पुसर।

पावन नीचे झुका और महिला के कान में बोला, ‘माँ, इसनै तो मानव तै बचाण की कोशिश करी थी। जद एक्सीडेंट होया तो इसी नै म्हारे तै फोन करकै बताया था… पुलिस अर एंबूलेंस तै फोन भी इसनै ए कर्या था…’

सब को जैसे साँप सूंध गया। वह आदमी अब नीम बेहोशी में था। किसी ने मुँह पर पानी के छींटे मारे। उसने पलकें झपकी, फिर कुछ कहने की कोशिश की। पावन नीचे झुका और उसके होठों के पास कान लगा दिए। पावन का दूसरा हाथ इस तरह हवा में था कि वह सबको चुप कराना चाहता हो।

वह कुछ नहीं बोल पाया। पावन ने चिट्ठी पढ़नी शुरु की-जब मानव का एक्सीडेंट हुआ तो मैं आत्महत्या करने जा रहा था। मुझ पर इतना उधार था कि मैं अपने आप नहीं मरता तो लेनदार मार डालते। मैं रेल की पटरी पर पहुँचा ही था कि सड़क से धमाके की आवाज आई। साफ था कि कोई भीषण हादसा हआ था। सोचा मरने से पहले कोई भला काम कर लूँ। सड़क पर आया तो गाड़ी में फँसा एक आदमी आखिरी साँसें ले रहा था। मैंने आती-जाती गाड़ियों को रोकने की कोशिश की पर कोई मदद नहीं मिली। पत्थरों से शीशे तोड़कर उसे गाड़ी से बाहर निकाला। उसी के फोन से पुलिस और एंबूलेंस को फोन किया। मरते-मरते उस ने अपना नाम मानव बताया और घर का पता बताकर फोन करने का इसरार किया तो मैंने आपको फोन लगाया, लेकिन तब तक उसकी आँखें पलट गई थीं।

उसके जख्मों से बहते खुन को रोकने के लिए मैंने कोई कपडा तलाशने के लिए गाड़ी खोली तो बैग नजर आया। उसमें भरे नोटों के बंडल देखकर मैं हैरान रह गया। अपनी हालत याद आई। कहाँ तो आत्महत्या करने चला था, कहाँ इतने सारे रुपए सामने पड़े थे। विचार आया कि शायद भगवान की यही मर्जी है अन्यथा यह चमत्कार क्यों होता? वैसे भी मानव अच्छे-खासे परिवार का लग रहा था, उसे भला पैसे की क्या कमी होगी? आखिर दिमाग ने दिल की आवाज दबा दी और मैंने रुपये ले लिए…उधार समझकर। उसी पैसे से मैं फिर खड़ा हो पाया। जैसे ही जरा संभला, हमेशा यहाँ आकर रुपये वापस करने की हिम्मत जुटाता रहा। पर समझ नहीं पाता था कि आपसे कहूँगा क्या? और कहूँगा तो क्या आप यकीन मानेंगे?

मानव के रुपयों ने मुझे और मेरे परिवार को नई जिंदगी दी। तहेदिल से शुक्रिया। आज पैसा लौटा रहा हूँ…जितना लिया था उससे दुगना। उस पैसे का कोई मोल नहीं लगाया जा सकता….पर लौटाए बिना आत्मा पर जो बोझ है, उसके साथ ना जीता हूँ ना मर सकता हूँ। हो सके तो मुझे माफ कर दें। आपका…..

उस आदमी की आँखें भी पावन पर लगी थीं, जैसे एक-एक अक्षर पी रहा हो। चिट्ठी खत्म होते-होते ही उसकी साँसें भी उथली होती चली गईं।

भीड़ दिल थामे खड़ी थी। जहाँ कुछ देर पहले जबरदस्त शोर था वहीं अब सन्नाटा पसरा हुआ था। उसकी नाक से अब भी लहू रिस रहा था। महिला को अब उसकी हालत का ध्यान आया और उसने सीने पर मालिश शुरू की। झट उसके जूते-जुराब उतारे और तलवों को मलना शुरू किया। साथ ही काँपती आवाज में बोली, ‘यो के कर दिया मन्नै…नाक ते खून आवै सै…अस्पताल… एंबूलेंस बुला…ना तो गाड्डी काढ़ जल्दी…’

पावन जल्दी से घर की ओर दौड़ा। उसने बड़ा गेट तेजी से खोला तो उसके टकराने से कंक्रीट का खंभा हिल गया। तेजी से बैक करते हुए गाड़ी फुटपाथ से टकराई…पर किसी तरह वह जल्दी से गाडी बाहर निकाल लाया। एक आदमी ने जल्दी से दरवाजा खोला, दो-तीन ने उसे उठाया। कोई उसे सीधा रखने को कहता तो कोई सिर को सहारा देता। उन्होंने एहतियात से उसे सीट पर लेटाया पर उसका सिर एक तरफ लुढ़क गया। खून सने होठों पर मुस्कुराहट थी, पर आँखें पथराने लगी थीं।

भीड़ में से कोई कह रहा था ‘अब कोई फायदा नहीं। यह तो जा चुका। कैसा सिरफिरा है…मरने के लिए इतनी दूर चला आया….।’

और वह था कि जैसे-जैसे आँखें पथराईं…मुस्कान गहरी होती गई, जैसे परम आनंद का क्षण आ उपस्थित हुआ हो।

वह सच में सिरफिरा था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’