भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
रात के अंधेरे में आहिस्ता-आहिस्ता उतरते जा रहे थे। काली सीसम जैसी रात को दो बहादुर आगे बढ़ते जा रहे थे। घोड़ी के मुँह से निकल रहे सफेद झाग में भी मानो गांव अभी नजदीक ही है, ऐसा स्पष्ट चिन्हित हो रहा था। आखिर गांव का टीला दिखा और जेनु मियां बोले- “तुम्हारा मादरे वतन आ गया केसरी सिंह!”
- “हां” केसरी सिंह बोला। भाव सिंह को केसरी सिंह के नाम से जेनु मियां बुलाते थे।
जीवा मेजर के शब्द अभी भी भाव सिंह के कानों में गूंज रहे थे।
- “भावसिंह! वाराही जाने का विचार भी छोड़ दे। मौत तुझे नहीं छोड़ेगी!।”
- “जीवा मेजर! तुमने कच्छ में चाहे डंका बजाया हो लेकिन इधर तो तू काफी डरता है! मौत का इतना डर?” इतना बोलकर जेनु मियां को लेकर चल निकला था। आज से लगभग बीस बरस पहले बागी बने भावसिंह राठौड़ को पकड़ने चार-चार जिलों की पुलिस घूमती थी। ऐसी स्थिति में भावसिंह अपने वतन वाराही में आ रहा था। वाराही पुलिस थाने का गांव था और तहसील का भी बड़ा मथक। पुलिस की जीप हमेशा उसके घर पर रहती थी। इस बात को जानकर भी मानो अपने आपको खुद ही पुलिस के हाथ में पकड़वाने को ही भाव सिंह वाराही जा रहा था।
वाराही के पादर में ही भाव सिंह का घर था। आहिस्ता-आहिस्ता उसने चारों ओर देखा। रात के नौ बज चुके थे। चुपचाप वह अपने घर में घुसा। घर में एरंड तेल का दिया जल रहा था। थोड़े से प्रकाश में भाव सिंह को उसकी मां ने देखा। एकदम से वह खटिया में से खड़ी हो गई।
- “भावसिंह! तू इधर कहां से? पुलिस!!”
- “मां! चाहे कोई भी हो! आज माताजी की पल्ली भराएगी। और मैं उसका प्रसाद न ग्रहण न करूं ऐसा हो ही नहीं सकता। भावसिंह की मां अवाचक हो गई और बोली- “बेटे भाव सिंह! मां भगवती तेरी रक्षा करें” मां के मुंह से सिर्फ इतने ही शब्द निकल सके।
आसो सुद अष्टमी याने दुर्गा पूजा का श्रेष्ठ दिन! अष्टमी को असंख्य हिंदुओं के घर पल्ली होती है। भाव सिंह माता जी की पल्ली का प्रसाद लेने आज पहुंचे थे। उन्होंने श्रद्धापूर्वक प्रसाद लिया और फिर जेनु मियां से बोले- “जेनू! तू महादेव के मंदिर की ओर घोड़ा लेकर खड़ा रहना- मैं गरबा के दर्शन कर के अभी आता हूं!”
वाराही के बाजार के बीच देहरा वास में बड़ी गरबी होती है। भाव सिंह तेज कदम रखते हुए उधर पहुंचे। बीच में ही लकड़ी की गरबी में अपनी ज्योति जल रही थी। पुरुष लोग गरबी गा रहे थे। भाव सिंह वृत्ताकार घूम रहे वृंद के बीच में से निकल गया और माताजी के सम्मुख आकर खड़ा हो गया। सिर पर असली रजवाड़ी फेंटा था (कसबवाली विशिष्ट पगड़ी) अपने कंधे पर कारतूस की हार और हाथ में बंदूक! गरबा गा रहे पुरुष एक पल के लिए इस कुछ अनजाने से, लेकिन राजवंशी दिख रहे मनुष्य को देखते ही रह गए। एक व्यक्ति ने दीप की ज्योति में उस चेहरे को देखने का प्रयास किया और उसके मुंह से शब्द निकल ही गये- अरे, यह तो भावसिंह जी हैं!” गरबी गा रहे पुरुष दौड कर उन्हें देखने को आ गए। भाव सिंह ने अपनी जेब में से पैकेट निकाला और सौ रुपये का नोट माता जी के चरणों में रखा। उस वक्त एक बड़ा-सा मानव-वृंद उनके आसपास जम गया था। माता जी के दर्शन कर और दूसरी गरबी के दर्शन करने चले तब हजारों लोग उनके आसपास खड़े हो गए थे। माताजी के दर्शन कर वे दूसरी गरबी के दर्शन के लिए चले। गरासिया के मुहल्ले में आकर वहां की गरबी के दर्शन भी उन्होंने किए। उस वक्त एक बहुत बड़ा मानवसमूह उनके आसपास खड़ा हो गया था। उनमें कुछ मित्र थे! कुछ सहपाठी थे। कुछ दुश्मन भी थे। पुलिस के लोग भी थे। बड़े बुड्डे भी थे। परिचित सभी मौन रहकर उनकी क्रिया को देख रहे थे। जिसको पकड़ने के लिए पुलिस ने बहुत बड़ा ईनाम जाहिर किया था। वह व्यक्ति इतनी सरलता से किसी से डरे बिना और अकेला ही तहसील के मथक में आकर आंखें बंद कर माता जी की प्रार्थना कर सकता है? सच ही में यह बहुत बड़ी बात थी। और प्रार्थना पूरी कर जब वह वापस चला, तब सैकड़ों लोग उनके पीछे-पीछे मंत्रमुग्ध होकर चलने लगे। आखिर उसने उन लोगों से कहा- “अब तुम सब वापस चले जाओ! माता जी के दर्शन करने की मेरी मन्नत पूरी हुई। मेरे वतन की चढ़ाने आया था। मैं धन्य हुआ। मेरे वतन के भाइयों को देखने का अवसर भी मुझे मिला!” और वे लोग उसे कोई प्रत्युत्तर दें, इसके पहले तो वह अंधेरे में खो गया। आज भी भाव सिंह उस प्रसंग को याद करते हए कहते हैं- माताजी के ऊपर पूर्ण श्रद्धा होने के कारण ही किसी ने मुझ पर उंगली तक नहीं उठाई। ना तो किसी की ऐसा करने की हिम्मत भी हुई। आज भी भावसिंह जी हयात हैं।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
