"तीन खामोश औरतें"-गृहलक्ष्मी की लघु कहानी: Hindi Kahaniya
Teen Khamosh Aurte

Hindi Kahaniya: शहरों की बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स की काँच की खिड़कियों पर लगे मखमली पर्दों के पीछे, सैंकडों सिसकियाँ दुन्यवी शोर में दब जाती है! औरतें सहने में, छुपाने में, घर की इज्जत बचाने में और झूठी मुस्कान लबों पर सजाने में माहिर होती है। एक बार लड़की ब्याह दी जाती है, फिर दो कूलों का मान रखने की ख़ातिर हर कड़वे घूँट पी जाती है। ऐसी ही तीन औरतों के शानों शौकत भरे जीवन की कड़वी दास्तान एक कामवाली अपने निज़ी जीवन को सरेआम मुखर करते तीनों के मन की भड़ास निकलवाती है। 

नीलम, रजनी और माला एक ही बिल्डिंग में रहती थी और पक्की दोस्त भी थी। बेशक शानों शौकत भर ज़िंदगी जीती थी। पर…एक मुखौटा पहने भीतर से खाली। फिर भी समाज में स्टेटस बनाएँ रखने की ख़ातिर अपने-अपने पतियों के गुणगान गाते गपशप तो ऐसे कर रही थी जैसे उनके पति जैसा पत्नी की परवाह करने वाला दुनिया में ओर कोई है ही नहीं। तीनों हर कुछ दिन बाद किसी एक सहेली के घर बैठकर बड़ी-बड़ी हाँकते टाइम पास करती रहती। आज भी रजनी के घर महफ़िल जमी थी, रजनी बोली, “यार कैसे महिलाएँ अपने पति के हाथों दमन सहते ज़िंदगी गुज़ार लेती है? मैंने तो अपने पति को हेंड पैक रखा है। कुछ मर्दों के लिए पत्नी की कीमत कौड़ी की होती है, thank god मेरा वाला ऐसा नहीं। माला बोली, “सही कहा यार! हम आजकल की मार्डन लड़कियाँ है, क्यूँ पति के पैरों की जूती बनकर रहें! पंकज तो मुझे सर आँखों पर रखते है। नीलम पीछे कैसे रहती! तुनक कर बोली, “मैंने तो विनोद को शादी से पहले ही अपने सारे शौक़ और आदतों के बारे में बता दिया था! मैं किसी चीज़ में कोम्प्रामाइज़ नहीं करती, हर संडे मूवी या बाहर डिनर चाहिए ही चाहिए।” तीनों एक दूसरे की बात का समर्थन करते अपने पतियों के गुणगान गा रही थी! इतने में वेदना से चिल्लाती निर्मला सोसाइटी कंपाउंड में कराहते चिल्ला-चिल्ला कर सबको इकट्ठा करने लगी।

इसी सोसायटी में निर्मला लगभग आठ, दस घर का काम करती थी। आज रोती चिल्लाती अपने पति से त्रस्त, सोसायटी वालों से मदद की गुहार लगा रही थी। “मैड़म बचा लो मेरा घरवाला मार देगा मुझे! सालों से सहती आ रही हूँ अब नहीं सहा जाता, इंसान हूँ कोई भेड़ बकरी नहीं कब तक सहूँगी? कमाकर देती हूँ मुफ़्त की नहीं खाती! सुबह से शाम तक हाथ छील जाते है इतने घरों के काम करते, उपर से घर जाकर बच्चों को संभालना, घर का काम करना और इनके ताने सुनना”

मारपीट करना तो अब रोज़ का हो चुका है! कब तक सहूँ, कोई तो मेरी मदद करो, कोई तो इस दरिंदे को समझाओ। निर्मला की आवाज़ सुनकर तीनों सहेलियाँ नीचे आई। निर्मला की राम कहानी सुनकर नीलम मन ही मन खुद की तुलना निर्मला से किए जा रही थी, क्या फ़र्क है मुझमें ओर निर्मला में? ये घरकाम करके कमाती है, मैं कोर्पोरेट ऑफ़िस में मैनेजर हूँ, फिर भी कहाँ प्रतिरोध कर पाती हूँ? हालत तो मेरी भी निर्मला जैसी ही है। रवि भी तो कसाई से कम नहीं! मैं भी सुबह से शाम तक घर का काम और ऑफ़िस दोनों देखती हूँ, पर लाट साहब की तरह हुकूम चलाने में माहिर रवि तारीफ़ तो छोड़ो हर बात में गलती निकालते डिवोर्स की धमकी देता रहता है, तो कभी कभार हाथ भी उठा लेता है उफ्फ़..न अपना दर्द किसी को बता सकती हूँ, न सरेआम चिल्ला सकती हूँ। so called बड़े घर की बहू जो हूँ।

निर्मला ऐसे सबके सामने सरेआम अपने पति के विरुद्ध भड़ास निकाल सकती है मैं कहाँ जाकर निकालूँ? स्तब्ध सी बस सहते रहना है। एक सिसकी अंदर ही अंदर दब गई और नीलम ने शर्दी का बहाना बनाते आँखें पौंछ ली।

निर्मला और ज़ोरों से रोने लगी,

मैड़म आगे क्या बताऊँ! हर रात दारु पी कर आना और बच्चों के सामने झगड़ा करना, मारना ये तो रोज़ का हो गया है!

ये देखो आज जलती सिगरेट से हाथ जला दिया तो कभी कोई सामान उठाकर सर फोड़ देता है।

माला ने कमर पर पड़े सिगरेट से जले हुए निशान साड़ी के पल्लू के नीचे छुपा लिए। दो दिन पहले पंकज ने दारु के नशे में जलती सिगरेट रख दी थी पेट पर! माला ने ज़्यादा पीने पर हाथ से ग्लास लेने की कोशिश की तो, गंदी गाली के साथ माला की कमर पर…

रूह काँप उठी माला की! माला सोचने लगी, “कितनी लाचारगी से ज़िंदगी जीनी पड़ती है! खुद ही अपने गाल पर थप्पड़ जड़कर गाल लाल रखने पड़ते है। पंकज भी कान में कीड़े पड जाए एैसी गालियों से नवाजता है! क्या गलती है मेरी? सिर्फ़ उसके दारु पीने पर टोकती हूँ यही! कहने भर को उच्च मध्यम परिवार कहलाता है, फ़र्क इतना है कि निर्मला सराजाहेर ये तमाशा कर सकती है, मैं नहीं! माला रुँआसी हो उठी निर्मला में खुद की छवि पाकर।

निर्मला की आहें बढ़ती जा रही थी! मैड़म क्या बताऊँ? शर्म आती है कहने में भी! पर मोया रोज रात को चुटकी सिंदूर का बदला बलात्कार से लेता है। हमार मन हो की ना हो! बस चढ़ जाता है छाति  पर, बच्चों के सामने ही। रजनी ने आँखें झुका ली और मन ही मन बोली, “बहुत अच्छे से समझती हूँ इस दर्द को, रोज़ झेलती हूँ बलात्कार की पीड़ा, समाज में होते बलात्कार जो ज़ाहिर होते है वो तो अख़बार में छपते है! पर एैसे बलात्कार की रिपोर्ट कहाँ कराने जाऊँ? जो खुद अपना पति करता है।” विनोद को भी रोज़ चाहिए! मन हो, या न हो तबियत ठीक हो, या न हो वहशियत भरा खेल मेरे बेडरूम में भी रोज़ खेला जाता है! मना करने पर कभी थप्पड़ तो कभी लात, शाम से ही डर बैठ जाता है मन में हे भगवान ये रात होती ही क्यूँ है!

एक शराबी पति से सताई हुई गरीब औरत का दर्द तीन सभ्य समाज की महिलाएँ अपने अंदर बखूबी जी रही थी! 

ना सरेआम कुछ बोल सकती थी, ना तड़प सकती थी, ना रो सकती थी!

बस एक झूठी हँसी होंठों पर सजाएँ निर्मला को चुप करा रही थी! भीतर ही भीतर दर्द से चिल्लाती “तीन खामोश औरतें” खुद को बौना महसूस कर रही थी तीन आधुनिक औरतें।

एक गरीब कामवाली अपनी पीड़ा पूरे समाज के सामने रो-रोकर, चिल्ला-चिल्लाकर बता सकती है, हम अपना दर्द कहाँ जाकर सुनाएँ? उच्च सभ्य समाज में हमें हँसते रहना है एक ज़लज़ले को दिल में दबाकर। शख़्सियत पर सभ्यता का चोला पहने और चेहरे पर नकली मुखौटा चढ़ाकर कई राज़ भीतर दफ़न करने होते है! खामोश औरतों को।