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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

“बेटा रोमी, दिन भर मोबाइल पर गेम खेलने और कार्टून देखने से आपकी आँखें खराब हो जाएँगी। अब आप अपने भाई के साथ कुछ देर बाग में खेलने जाइये।”

“मम्मी बाग में कोई पेड़ तो है नहीं, वहाँ तो बस मैदान है और कुछ घास की झाड़ियाँ”, रोमी ने प्यार से कहा।

रोमी की बात सुनकर उसकी माँ फिक्रमंद हो गईं, लेकिन उन्होंने रोमी को समझाया, “बेटा, वहाँ पहले बाग था इसलिए उसे बाग कहते हैं। आप जब मोबाइल फोन छोड़कर मैदान में खेलोगे तो न सिर्फ मोबाइल के रेडिएशन से महफूज रहोगे बल्कि दौड़-भागकर खेलने से शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी आएगी।”

“जी मम्मी….!” कहते हुए रोमी बाहर निकल गया।

जब रोमी मैदान में क्रिकेट खेल रहा था कि तभी उसकी गेंद झाड़ी में कहीं गम हो गई। वह उसे ढंढने झाडी तलाशने लगा कि अचानक उसके पैरों से कुछ दब गया। तभी एक आवाज आई, “…रोमी अपना पैर हटाओ, मैं टूटकर बिखर जाऊँगा।”

आवाज सुनते ही रोमी ने अपना पैर हटाकर देखा तो मिट्टी की एक छोटी-सी गेंद जैसा कुछ था, जो उसके पैर के नीचे दबकर चटक गया था।

“तुम कौन हो और क्यों रो रहे हो?” रोमी ने उस गेंद से पूछा।

“मैं सीड बॉल हूँ। क्या मुझे नहीं जानते हो?” सीड बॉल ने पूछा।

“नहीं तो….” रोमी ने हैरत से कहा।

तब तक उसके साथ खेलने वाले और बच्चे भी आकर ‘सीड बॉल’ की बात सुनने लगे।

“मैं सीड बॉल हूँ। मेरा काम है नए पौधे उगाना। मुझे बनाना बेहद आसान है। आप बच्चे भी ये काम आसानी से कर सकते हो, जिससे पेड़-पौधों की कमी को कुछ हद तक जरूर पूरा किया जा सकता है।”

“वह कैसे….?” बच्चों ने हैरत से पूछा।

“बताता हूँ….आप लोग गौर से सुनिए। सबसे पहले कहीं से ऐसी मिट्टी लें जिसे गूंथकर या गीला करने पर उसकी गोली या गेंद आसानी से बनाई जा सके। गोली या गेंद के अंदर किसी भी पेड़ का बीज रख सकते हैं जैसे नीबू, मौसम्मी, लीची, नीम, आँवला, इमली, अशोक, अर्जुन, बेर, आडू, अमरूद, जामुन, बेल, कैथ, गूलर, सेमल, कीकर, अमलतास, बकैन, अनार, सागौन, शीशम, जंगल-जलेबी. पॉपलर, मोर-पंखी. कटहल, बढहल (लोई). पीपल, बरगद, पाकड़, कनेर, गुलमोहर, महुआ, खजूर, पपीता, सेब और चीकू वगैरह। आम की गुठली चूँकि बड़ी होती है इसलिए उसे बगैर मिट्टी के छाँव में सुखाकर रख लें और जब मौका मिले तो इसे बिना मिट्टी की गोली के अंदर रखे ही नम जगहों पर फेंका जा सकता है। इलाकों और मौसम के मुताबिक भी सीड बॉल बनाये जा सकते हैं। लेकिन आप सब तो बच्चे हैं इसलिए अपने वालिदैन और असातिजा (गुरुजनों) से अपने इलाकों में आसानी से उग आनेवाले पेड़-पौधों के बारे में पहले जानने की कोशिश करें, उसके बाद उन पेड़-पौधों के बीजों को मिट्टी की गेंद के अंदर रखें। बस, तैयार हो गई आपकी सीड बॉल।” सीड बॉल आँखें नचाता हुआ बोला।

सारे बच्चे हैरत से उसकी बातें सुन रहे थे। सीड बॉल आगे बताने लगा, “हाँ, एक बात का ध्यान रहे कि सीड बॉल को बनाने के बाद धूप में न रखें बल्कि छाँव में सुखाएँ। उसके बाद ये सीड बॉल बाग-बगीचों के अलावा सड़क के किनारे फेंक सकते हैं। खासतौर पर बारिश के मौसम में फेंकें, ताकि उनके अंदर नमी आसानी से पहुँच जाए और बीज बरबाद होने से बच जाये। एक सीड बॉल के अंदर दो-तीन बीज भी रख सकते हैं। ये काम आप सब बड़ी आसानी से छुट्टी के दिन कर सकते हैं और अगर कहीं घूमने जाना हो तो फिर कार, ट्रेन या बस की खिड़की से ही सड़क के किनारे या रेल की पटरियों के किनारे सीड बॉल्स को फेंक सकते हैं।”

“हाँ, हाँ, हम जरूर बनाएँगे सीड बॉल,” बच्चों ने खुशी जताते हुए कहा।

“यूँ तो सीड बॉल बनाने का तरीका बहुत आसान है, जो मैंने बताया है लेकिन फिर भी समझ में ना आया हो तो यूट्यूब पर भी उसको बनाने का तरीका देख सकते हैं। हाँ, एक बात का ख्याल रहे, ट्रेन या बस की खिड़की से सीड बॉल्स फेंकते हुए पहले देख लें कि किसी के लग तो नहीं जायेगा और अपने हाथ को भी खिड़की से बाहर नहीं निकालें। ऐसा करने से आप दूसरों को भी परेशान नहीं करेंगे और आपका काम भी आसानी से हो जायेगा।”

सीड बॉल कहने लगा, “पूरी दुनिया में पेड़-पौधों की कटाई बड़े पैमाने पर की जा रही है और लगातार हो रही है इसलिए ये जरूरी हो गया है कि पर्यावरण को बचाने के लिए खूब पेड़-पौधे लगाए जाएँ। आज इस तेज रफ्तार जिंदगी में लोगों के पास इतनी फुरसत नहीं की पेड़-पौधे लगाएँ। ऐसे में सीड बॉल्स के जरिये पेड़-पौधे लगाने का काम आसान हो जाता है। फजाई आलूदगी (पर्यावरण प्रदूषण) खतरे के निशान से ऊपर पहुँच चुका है। दुनिया के सबसे ज्यादा आलूदा (प्रदूषित) शहरों में भारत के भी कुछ शहर जैसे कानपुर, दिल्ली और कोलकाता हैं। ये वे शहर हैं जो हमारे देश में सब से ज्यादा आलूदा शहर माने जाते हैं। इनकी साफ-सफाई का काम भी चलता ही रहता है. लेकिन बच्चों इनमें किए जानेवाले उधोग-धंधों की वजह से यहाँ फजाई आलूदगी पर काबू नहीं पाया जा सका है। साफ-सफाई के साथ साथ हवा का साफ होना भी जरूरी है जिससे साँस लेने में कठिनाई न हो। क्यूँकि बच्चों आप जानते हैं कि ऑक्सीजन के बिना हम सब जिंदा नहीं रह सकते।”

“प्यारे बच्चों, अगर पेड़ों की कटाई इसी तरह होती रही और नए पेड़ लगाने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो वो दिन दूर नहीं, जब हर इंसान को अपनी पीठ पर ऑक्सीजन-सिलेंडर लादकर ही घर से बाहर निकलना होगा। जरा सोचिये, उस वक्त आप कैसे क्रिकेट, हॉकी या फुटबॉल खेलेंगे? और किस तरह स्कूल और दूसरी जगहों पर जाया करेंगे? क्या आप पीठ पर ऑक्सीजन-सिलेंडर लादकर चलना पसंद करेंगे?”

“नहीं….” बच्चों ने एक साथ जवाब दिया।

“क्या आप जब भी घर से बाहर जाएँगे तो धूप का सामना कर लेंगे?”

“नहीं….” बच्चों ने एक साथ जवाब दिया।

“क्या आप चाहते हैं कि आपके खेल के मैदानों में घास भी न हो?”

“नहीं….” बच्चों ने फिर एक साथ जवाब दिया।

“क्या आप एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ सिर्फ नकली फूल और उन पर नकली ही तितलियाँ हों?”

“नहीं….” बच्चों ने एक साथ जवाब दिया।

“बहुत अच्छा बच्चों, उम्मीद है आप सब अपनी छुट्टी के दिनों में सीड बॉल्स बनाएँगे और उन्हें सही जगहों पर फेंकेंगे, जिससे तरह-तरह के पेड़ पौधे उग सकें और सबकी जरूरतें पूरी हो सकें। हमारा ग्रह पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पर ऑक्सीजन और पानी की वजह से जिंदगी मुमकिन है। हमें अपने ग्रह की हिफाजत खुद करनी होगी।”

“अरे हाँ, मैं तो बताना ही भूल गया,” सीड बॉल कुछ सोचता हुआ बोला. “सीड बॉल्स को आप बना ना सकें तो बाजार से बने बनाए भी ला सकते हैं और अब तो ऑनलाइन घर बैठे भी मँगा सकते हैं। इस काम से धरती को राहत मिलेगी और वह फिर से हरी-भरी होने लगेगी। हवा की आलूदगी (वायु-प्रदूषण) कम होगी और चारों तरफ हरियाली बढ़ेगी, जिसे देखकर आपको ताजगी का एहसास तो होगा ही, साथ ही उन पेड़-पौधों की छाँव में मुस्तकबिल में आप ही की तरह और बच्चे भी खेलेंगे। उन पेड़ों पर लगने वाले फलों को खाएँगे, फूलों पर बैठने वाली रंग-बिरंगी तितलियों से रोमांचित होंगे। बहुत-सी चिड़ियों के घोंसले भी इन्हीं पेड़ों पर बनेंगे। आपको मालूम है, पेड़ लगाने के इस तरीके से बहुत-से पशु-पक्षियों को नई जिंदगी मिलेगी। पक्षियों के अलावा गिलहरियाँ और दूसरे छोटे जानवर भी इन पेड़ों पर अपना अपना जीवन बिताते हैं। वो पहाड़ियाँ जिन पर पेड़ खत्म हो गए हैं और सिर्फ पत्थर का टीला बनकर रह गई हैं, वो सब हरी-भरी हो जाएँगी। वो पार्क जहाँ प्लास्टिक के पेड़ लगाए गए हैं, वहाँ असली पेड़ उग आएँगे। हमें इन पेड़-पौधों की देख-भाल भी करनी होगी क्यूँकि पेड़ हमारे सच्चे दोस्त हैं जिन से फजाई आलूदगी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।”

रोमी ने अपने भाई और साथियों की तरफ देखा फिर सब ने एक आवाज होकर कहा, “हम वादा करते हैं कि हम सब छुट्टियों में सीड बॉल्स बना कर सही जगहों पर फेंकेंगे।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’