" सावन की बारिश "-गृहलक्ष्मी की कहानियां "
Sawan ki Barish

Story in Hindi: “तुम्हें देखा है जब से मैंने , बस दिन – रात ख्याल तुम्हारा ही रहता है, तुम नहीं होते ओझल आँखों से , जहन मैं तुम कुछ ऐसे रहते हो “। अपने कमरे में खिड़की के पास बैठकर आयुष ” सावन की बारिश ” को देखकर अपने रेडियो पर प्रेम से भरे हुए गीतों को सुनकर गुनगुना रहा था।  बाहर के इस मौसम को देखते हुए उसे कुछ लिखने का मन हुआ। उसने अपनी डायरी में अपने बीते हुए दिनों में जीवन के कुछ खुशी के पल , कुछ अनुभवों को लिखना शुरू कर दिया।  उसके दिल ने मन से ” पहली नजर का प्यार ” पर कुछ नज़्म लिखने को कहा और मन ने अपनी कलाकारी शुरू कर दी। यह सिलसिला अभी चल ही रहा था कि नीचे रसोई घर से एक आवाज आती है – ” सुनिए  , चाय – पकौड़े बना लिए हैं , कुछ और भी बनाना है बता दीजिए मैं अभी ऊपर आ रही हूं “। यह आवाज आयुष की धर्म पत्नी आकांक्षा की थी। आयुष और आकांक्षा स्वयं ही एक – दूसरे के ” पहली नज़र का प्यार ” थे और कुछ समय बाद ही दोनों सात जन्मों के साथी बन गए। इस आवाज को सुनकर आयुष एक हल्की – सी मुस्कान के साथ में जवाब देता है – ” नहीं कुछ और नहीं बस आप चाहिए इस ” सावन की बारिश ” में चाय – पकोड़े और प्रेम के संगीत का आनंद लेने के लिए। नीचे रसोई घर में काम कर रही आकांक्षा यह सुनकर एक हल्की – सी मुस्कान के साथ में शर्माते हुए कहती है – ” जी , आज बहुत ज्यादा प्यार आ रहा है ” सावन की बारिश ” में ध्यान रखिए जनाब यह पहली बारिश है “। आयुष कहता है – ” जी देखते हैं , हम तैयार हैं “। 

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कुछ ऐसी ही मीठी – सी नोक – झोंक के बाद दोनों बालकनी में बैठकर चाय – पकोड़ों और प्रेम भरे संगीत के साथ में ” सावन की बारिश ” का आनंद ले रहे थे। अपने ” पहली नज़र का प्यार ” को अपनी बाहों में भरकर दोनों स्वयं को खुशकिस्मत समझ रहे थे। बातों की बातों में अचानक आयुष कहता है – ” आकांक्षा तुम्हें याद है जब पहली बार मैं अपने माता – पिता के साथ में तुम्हारे घर आया था। यह सुनकर दोनों के चेहरों पर एक मायूसी छाने लग जाती है , कुछ ही पलों के बाद ” सावन की बारिश ” भी रुक जाती है। आकांक्षा कुछ ज़रूरी काम है यह कहकर वहां से चली जाती है और नीचे रसोई घर में बर्तन साफ करने लग जाती है। आयुष भी अपनी डायरी को अपनी अलमारी में रखकर बालकनी में रखे हुए पौधों के गमलों में भरे हुए बारिश के अतिरिक्त पानी को निकालने लग जाता है। वह अब तक यह समझ चुका था कि उस दिन आकांक्षा के घर में हुई वह भेंट आज भी सभी को याद है। आकांक्षा को शायद वह सब कुछ आज भी परेशान करता है। 

आयुष नीचे पहुंच जाता है और आकांक्षा का मन भटकाने की कोशिश करता है। मगर उसे असफलता ही प्राप्त हो रही थी। तभी घर के फोन की घंटी बजती है , आकांक्षा फोन उठाती है और कहती है – ” जी , कहिए आप कौन हैं ? उस तरफ से आवाज़ आती है – ” आकांक्षा बेटा , मैं तुम्हारी माँ बोल रही हूं।  ” आकांक्षा कहती है –  जी , माँ आप कैसे हो ? आयुष यह सब सुनकर थोड़ा खुश हो जाता है कि सब कुछ ठीक है। कुछ देर बाद आयुष अपने कमरे में जाकर अपने लैपटॉप पर अपने दफ़्तर का काम करने लग जाता है। समय निकलने लगा था रात का खाना रसोई घर में आकांक्षा बनाने लगती है। और कुछ समय बाद रात का खाना बनकर खाने की टेबल पर लग चुका था। आकांक्षा टेबल पर बैठकर आयुष का इंतजार करती है। मगर जब आयुष खाने की टेबल पर नहीं आता है तो वह आयुष को बुलाने  के लिए ऊपर कमरे में आ जाती है और आयुष को काम करते हुए देखकर थोड़ा मन और वातावरण हल्का एवम खुशनुमा बनाने के लिए आयुष के गले लग जाती है। आयुष कहता है – ” क्या हुआ तुम्हें सब ठीक है “। ” सावन की बारिश ” हो चुकी है मेरे ” पहली नज़र का प्यार ”  आकांक्षा कहती है – ” जी सब ठीक है , चलिए खाना खाते हैं “। दोनों खाने की टेबल पर बैठकर खाना खाने लगते हैं। आकांक्षा कहती है – ” उस दिन जो कुछ भी हुआ उसमें किसी की भी गलती नहीं थी वह सब कुछ सिर्फ समय और परिस्थितियों  के द्वारा निर्मित एक घटना थी। दोनों खाना खाकर सो जाते हैं। 

सुबह हो चुकी थी मौसम सुहाना था और आयुष हर दिन की तरह सुबह की पहली चाय  रसोई घर में स्वयं ही बना रहा था। आकांक्षा सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी , तभी दरवाजे की घंटी बजती है। आयुष दरवाजा खोलता है सामने अपने माता – पिता को देखकर दोनों आश्चर्यचकित हो जाते हैं। दोनों के माता – पिता उनकी शादी के खिलाफ थे। उन्हें समझाने के लिए दोनों ने बहुत प्रयास किए थे। मगर उन्होंने अपनी सहमती नहीं दी थी। सभी बरामदे में बैठ जाते हैं। आयुष के माता – पिता कहते हैं – ” जी उस दिन जो कुछ भी हुआ वह नहीं होना चाहिए था। यह नई पीढ़ी की वजह से हम लोगों को अपने विवेक को नहीं खोना चाहिए था अगर कोई बात बुरी लगी हो तो हमें माफ करना “। आकांक्षा के माता – पिता कहते हैं – ” जी सिर्फ आपकी ही नहीं बल्कि कुछ हमारी भी गलती थी , हम भी उस दिन बहुत कुछ बोले थे।  आप हमें माफ कर देना “। आयुष और आकांक्षा चाय – नाश्ता देते हुए कहते हैं –  ” जी चाय – नाश्ता कर लीजिए “। आयुष के पिता कहते हैं – ” जी बेटा चाय – नाश्ता तो हम ले लेंगे , मगर हमें यह बताओ कि सारी जिंदगी यहीं रहना है या कुछ और भी सोचा है तुमने या अभी भी ” सावन की बारिश ” चाय – पकोड़े और ” पहली नज़र का प्यार ” प्रेम भरे गीत क्यों आयुष ? आयुष और आकांक्षा एक – दूसरे की तरफ़ देखकर शर्माते हुए कहते हैं – ” जी , अभी कुछ नहीं सोचा है “।  आयुष के पिता कहते हैं – ” चलो हमारा कमरा दिखाओ “। 

आयुष और आकांक्षा दोनों अपने माता – पिता को उनके कमरे में ले जाते हैं और उनके यहां आने का कारण पूछते हैं। माता – पिता को आराम करने के लिए कहकर दोनों बालकनी में चाय पीने लगते हैं। आयुष कहता है – ” आख़िर हमारे माता – पिता ही हैं अब हमें क्या करना चाहिए “। आकांक्षा कहती है – ” इतने समय बाद क्या बताने। आयुष कहता है – ” पता नहीं तुमने क्या सोचा है “। आकांक्षा कहती है – ” इतना आसान है सब कुछ भूल जाना , ” सावन की बारिश ” में ”  पहली नज़र का प्यार ” और वो सब बातें , क्या हमें अपनी नाराज़गी जाहिर करने का भी अधिकार नहीं है , बताओ आयुष “। उनकी इन बातों को आकांक्षा की माँ बरामदे में कुर्सी पर बैठी हुई सुन रही थी। अपनी बेटी की इन बातों को सुनकर आकांक्षा की माँ को बहुत बुरा लगता है। शाम का समय हो जाता है अभी तक घर में शांति कुछ ऐसे बनी हुई थी जैसे तूफान आने वाला हो। आयुष और आकांक्षा ने अभी तक कोई भी निर्णय नहीं ले पाया था। दोनों अपने जीवन के बीते हुए पलों और उन सभी अनुभवों को याद करते रहते हैं। 

दोपहर का खाना भी सिर्फ एक औपचारिकता ही थी। दोनों अपने घर में अजनबी बन चुके थे। आकांक्षा के पिता कहते हैं – ” आयुष बेटा यह बताओ तुम्हारा काम कैसा चल रहा है ? सब ठीक है अगर कोई ज़रूरत हो तो जरूर बताना तुम मेरे बेटे हो। तभी आयुष और आकांक्षा ने देखा कि आयुष के पिता चाय और नाश्ता लेकर स्वयं रसोईघर से आ रहे हैं। आकांक्षा ने कहा – ” जी , मैं करती हूं “। आयुष के पिता ने कहा – ” अरे बेटा आज अपने इस पिता के हाथों से बनी चाय और नाश्ता का आनंद लो “। दोनों माँ साड़ी गहने और कपड़े  आयुष और आकांक्षा को देते हुए कहते हैं -” पसंद कर लो , कल तुम्हारी शादी करवानी है हमें। तुम्हारे बाबुल से तुम्हारी डोली उठाकर ले जाना है तुम्हारे पिया के घर में तब हम सब रूढ़िवादी परंपराओं और समाज की झूठे नियम और कायदे कानून के कारण सभी रस्में नहीं निभा पाए थे। मगर अब निभायेंगे हमारे बच्चों ने अपने ” पहली नज़र का प्यार ” पाने के लिए हमारे द्वारा बहुत अपमानित होना पड़ा था “। दोनों माँ से यह सब सुनकर आकांक्षा उनसे गले लगकर रोने लगती है। सब उसे चिढ़ाते हुए गाते हैं – ” पहली नज़र का प्यार ” मिला ” सावन की पहली बारिश ”  में पिया के बाहों में बाबुल के आंगन में ।