sarika pinjarastha
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

समुद्र की लहरें मानों पहाड़ो को छूने की होड़ में हिलोरे ले रहे थे… अरे कितना ऊँचा। दूर तक नजर डालने पर भी न पहुँचे इतनी ऊँची उठी। यह… तो… ए… गिरी। यह… गिरी और मैं तो गड़ जाऊँगी। ओह…ओह… यह तो जाकर टकराया चट्टान से… झाग…झाग…झाग!

‘ओह…मेरे भाल पर स्लेट किसने मारा? खून… खून…खून… ‘सारिका भाल को हाथ से स्पर्श करते हुए कहा। चारपाई पर सोई हुई बीमार सारिका मानो 7-8 साल की बच्ची हो।

हाँ, उस दिन बाहर बारिश हुई थी। सायं 5 बजे वह ऊपर के हिस्से में शिक्षक के पास पढ़ने के लिए बैठी थी। सारिका के माता-पिता समय के पाबन्द तथा अनुशासन प्रिय थे। शिक्षा-दीक्षा के प्रति उनका चुस्त नियम था। विपरीत परिस्थितियों में भी पढ़ाई के लिए जो समय निर्धारित किया गया है, उस पर चलना ही होगा। गीली रेत की खुशबु और उस डग पर बारिश की बुंदे देखकर, सारिका का बाल मन खिड़की से बाहर, बार-बार झाँकता ही रहता, इतने में शिक्षक ने एक सवाल हल करने के लिए कहा।

भाग करना, गुना करना, जोड और घटाव करना.. इन सबका परस्पर जीवन से क्या संबंध, किसलिए ये सब पढ़ना, सबके क्यों अलग-अलग नाम दिये होते है?’ पिछले ही दिन बुद्धिमान सारिका ने यह प्रश्न उठाया था। उन्हीं प्रश्नों के पीछे की मंसा को समझ-बुझ कर वे शिक्षक उत्तर दे रहे थे, पर बच्ची का मन तो उस डग की मिट्टी और बारिस की बूंदों के शाश्वत मिलन को देखने में डूबने ही जा रहा था, लेकिन शिष्टाचार के कारण वह भावुक नजरों से कभी शिक्षक को तो कभी उस शाश्वत मिलन को देख रही थी।

अच्छा तो अब तम समझ गयी न? चल. सारे सवाल हल कर लो। लेकिन शिक्षक की बात अनसुना करते हुए सारिका अधीरता से पूछ बैठी ‘मास्टर साहब, रेतीली मिट्टी बारिश की बूंदों के साथ मिलकर छोटी-छोटी चट्टानें बन जाती है और छोटे-छोटे गड्ढे में जल भरकर जलाशय बन जाते हैं और अपनी मौज में जीवन जीते हैं। काश मैं भी उस मौज का मजा ले पाती!

नहीं?’

जान डालकर, गला फाड़-फाड़कर समझाने वाले वृद्ध शिक्षक तो पल भर के लिए हक्का-बक्का हो गये। झल्लाकर तुरंत ही वे अपने हाथ में पड़े स्लेट को, जो सारिका की तरफ सवाल हल करने के लिए बढ़ाये थे, सारिका के सर पर दे मारे…

ओह… खून! खून! खून! मैंने क्या गुनाह किया था? सारिका ऊंची आवाज में बोल पड़ी। नर्स, दौड़कर सारिका का सर सहलाने लगी।

‘बुखार तो ज्यादा नहीं है, क्या बोल रही थी? सपना देख रही थी न? अब सो जाओ, मैं बैठी हूँ न?’ सारिका चुपचाप सोयी रही।

हाँ… यह तो हॉस्पिटल है। मैं तो बड़े घर की बेटी और बड़े घर की बहु हु न? पर… मेरी शादी में शहनाई भी नहीं बजी। शादी का खाना भी नहीं हुआ…। बारात भी नहीं निकली…। अरे भला ऐसा होता तो कैसे होता? मैं प्रतिष्ठित जमींदार की बेटी, नगर के प्रतिष्ठित और संपन्न घर में मेरी शादी… और बाजे भी न बजे। पर हाँ उस शाम को कितने सारे परिवार उमड़कर आए थे? और वह समारोह एक शाम की मिजलस में ही खत्म हो गया। खुद माता-पिता ने भी ऐसी शादी के बारे में नहीं सोचा होगा। परंतु.. .एनआरआई अर्थात् परदेसी दुल्हे की अत्याधुनिकता के भाव-बोध को कैसे नकारा जा सकता है? यदि गुजराती भाषा में कहना हो तो कहा जा सकता है कि परदेशी दुल्हे की सुधरी हुई शैली को कैसे उलीच सकते है?

सुधार? हाँ केवल इतना ही न? अपने आप तो अन्य जाति में शादी हो सकती है न? यह तो माता-पिता और दोनों के संतोष की बात थी न? है न…।

और हाँ! गाँव में रहने वाले माता-पिता को गर्व करने जैसा खानदान, हाथ से कैसे फिसलने दे? ऐसे चुपचाप, सूनसान शादी… दिल को चंचल बना दे, उत्साहपूर्ण जलजला कर दे ऐसी हो हल्ले के बिना शादी…… और मैं शादीशदा… पत्नी…बेटरहाफ… हो गई।

शून्यता… सब कुछ मर्जी के विरूद्ध…

‘दवाई पी लो।’

‘दवाई पी लो।’

कौन…झकझोर रहा है? नर्स? नही…नही… नहीं पीनी है, सोने दे मुझे।

फिर वही बात? डॉक्टर ने क्या कहा था…भूल गई? चलो, उठो, आपकी माताजी को बुलाऊँ?

डॉक्टर… माताजी… ओह, मुझे धमकी दे रही है यह? माताजी दवाई पिला देगी ऐसा न, पीनी ही पड़ेगी?

पी ही जाने की बाध्यता है न? चाहे मर्जी हो न हो, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

सारी मर्जी…शून्यता…

माँ! माँ पापा को कह दो न, मुझे साइन्स लाइन नहीं लेनी है, मुझे उसमें रस नहीं मिलता, उसे पढ़कर आनन्द प्राप्त नहीं होता है।’

सूरि! माँ ने आँखे दिखाते हुए कहा-

‘क्या, तुझे तेरे पापा के स्वभाव का पता नहीं है? और हाँ, हम जैसे ही साइन्स नहीं लेंगे तो क्या वह मास्टर की बेटी लेगी?

और क्या तू उस मास्टर की बेटी की तरह आर्टस् लेगी?’

‘मुझसे काटकूट नहीं हो पाएगा माँ।

‘हाँ, तुझे कहाँ लंबे अर्से तक पढ़ाई करनी है और मेहती बनना है?’ शून्यता… मेहती…डॉक्टर…मेहती…डॉक्टर…

‘डॉक्टर ने क्या कहा था…? लग रहा था नर्स के शब्द मानों चक्कर खा रहे थे और…

‘माँ, मुझे शादी नहीं करनी, मैं तो डॉक्टर ही बनूँगी।’

‘पहले तो काटने के नाम से मुँह फुलाती थी। और अब…! है ही उल्टी खोपडी की, पढ़ना हो तो शादी के बाद पढना! ऐसा खानदान थोड़ी न जाने दे सकते है? कितने बड़े नगर में ससुराल और कैसा पढ़ा-लिखा युरोपियन-सा दूल्हा!’

‘पर…मां इतनी जल्दी भी क्या है? वह भी तो पढ़ाई के लिए विदेश गया ही था न? मैं भी पढ़ाई कर लूं बाद मे…।’

‘तब तक वह तेरी राह देखे यूं ही न? शादी की बात में इस तरह मुंहफट होकर बोलते हुए शर्म नहीं आती तुझे?’

‘पर शादी तो…’

‘चूप…बैठ… चूप…’

डॉक्टर मेहती…शादी…शून्यता…!

चूपचाप शादी… दूल्हा घोड़े पर सवार भी न हुआ। मोटर में न बैठा… न बजे गाजे-बाजे, न हस्त धूनन…पूरोहित के मंत्र… अग्नि की साक्षी…। शादी का मंडप…चार फेरे…चौरी…

‘शिट्।। नोनसेन्स!’ दूल्हे की सिगरेट के धुंए के गोले सारिका के आसपास लिपट गये।

सिर्फ धुंआ… धुंए के वलय… उस धुंए को छोड़नेवाला ही खुद धुंआ हो गया। रह गये केवल सास के पास खबर पूछने आनेवाले रिश्तेदार-संबंधी…

सप्रयत्न सारिका उस तरफ कान और आँख लगा रही थी।

‘कैसा है अब सारिका भाभी को?’

‘वैसे का वैसा ही।’

‘क्यूं? डॉक्टर क्या कह रहे है?’

‘क्या कहेंगे? ताप चढ़ता-उतरता रहता है, अशक्ति बहुत है, दिमाग कमजोर होता जा रहा है, बकवास बढ़ता जा रहा है।’

वही आवाज उसके करीब आई। कैसी हो सारिका भाभी? पहचाना कि नहीं? गहरे पानी में सारिका ने डूबकी लगाई…चक्कर…चक्कर…चक्कर छोटे-बड़े चक्कर…अब तो छोटे दो ही चक्कर… बहुत छोटे…यह तो मधुकर भाई के चश्मे… तो मंजुला मधुकर आये है क्या?

सारिका ने परिचय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिया…तुरंत फिर से आवाज आई-

‘स्वीटी को तो पहचानती हो न? स्वीटी, आन्टी को नमस्ते कीजिए। कीजिए, बब्बु… नहीं मानेगा? मम्मी को, आन्टी तुझे प्यार नहीं करेंगे हां! करो, करो… हां ऐसे। नमस्ते… गुड गर्ल…सारिका भाभी देखिए, आको नमस्ते कर रही है।

सारिका ने ओंठ फुसफुसाये। महाप्रयत्न से बोल ही दिया।

‘मर्जी के विरूद्ध?’

‘वह क्या कह रही है नर्स? देखिए तो कमला बहन?’

बकवास, और क्या?

बकवास… शून्यता…! सारिका ने आँखे बंद ही कर ली।

‘झूठी बकवास मत कर। वह गीत जो बहन ने सीखाया है न, वह सुलु मासी को नाच-गाने के साथ सूना तो।’ मां ने चुपके से आँखें निकाली, सारिका के हाथ को झटक दिया।

‘नकार… भूख लगी है।’

‘भूख कैसी? कहा न माँ ने उसे खाना भी न मिले, चल उठ तो! खड़ी हो जा, जलदी से उठ जा! हाँ… ऐसे ही… शुरू कर… एकदम बराबर, सही है…’

छोटी सी सारिका ने रोती हुई आवाज में, ढीले-ढाले हाथों से नखरे शुरू किये…

‘मैं तो कंड़े चुनने गई थी रे माँ,

मुझे बिछु ने काटा रे माँ,

हंबो हंबो…’

मुझे नहीं गाना! इच्छा के विरूद्ध बच्ची ने थोड़ा गाया, और भाग गई…

‘ऐसी जिद्दी है न? वैसे तो बकवास करती रहती है, परंतु जिद्द करें तो फिर ऐसा ही। सही में उसके पापा का डर है। आज रात को फिर से ठीक करवाऊंगी। इतना भी कहा करती है, वह तो उसके पापा के कारण ही…!’

शून्यता…

पर न नाचना और न गाना हो तो?

‘डान्सींग क्लब में तो जूड़ना ही पड़ेगा।’

परंतु… मुझे… मुझे सबके बीच में इस प्रकार नाचना नहीं आएगा।

‘नहीं आएगा न, इसीलिए ही सीखना है? दोस्तों, मित्रों के साथ पार्टी एवं क्लब में जाएंगे, और ये सब नहीं आएगा तो मेरे रूतबे का क्या? तुम्हें मेरी रीति से ट्रेइन्ड होना ही चाहिए।’

‘पर मैं क्लब में न आऊँ तो?’

‘वैसे तो चले ही नहीं। मिस्टर और मिसीस साथ में ही होने चाहिए…सब कुछ आना ही चाहिए। एक बार सीख लिया कि सारी शर्म, संकोच खत्म ही समझो। चल! चल! उठ! मेरी वाईफ इस तरह अनगढ़ हो उस बात को तो मैं कभी न चलाऊँ। यु मस्ट।’

डान्सर ने ताल और रिधम के लिए लाठी उठाई…

‘यस…कमेलोग…हियर यु आर। उसकी लकड़ी के साथ मिस्टर और मिसीस ताल पर, स्लो…स्लो क्वीक! वन टु थ्री फोर…’

‘मारवेलस! सुपर्ब! वेरी स्मार्ट!’ अति जोर से सारिका ने दो-तीन ताली बजा दी और बोल पड़ी…

हुप…हुप… बंदर!

शून्यता…!

रास्ते पर मदारी डुगडुगी बजा रहा था। छोटी सारिका लड़कों की टोली के साथ उस खेल को देख रही थी।

‘भगा भाई और रतनबाई! नाचो…नाच…. मेरे राजा रानी!’.डुग डुग डुग डुग…

छोटी बंदरिया रतनबाई कुछ खाने लगी, मदारी ने उसे लाठी मारी। ‘चल उठ, रतनबाई नाचे तो भगा भाई नाचे।’ डगाक डुग डुग डुग… तब भी बंदरिया नहीं उठी।

‘नहीं उठती? अरे सब मालिक लोग क्या कहेंगे? हमारा पेट कैसे भरेगा? चलो… मान जाओ…’ डुग डुग डुग डगाक!

मदारी लाठी हिलाने लगा। डुगडुगी के ताल पर भगाभाई और रतनबाई कंधे पर हाथ रखकर नाचे, बहुत नाचे।

‘सब लोग ताली बजाओ, बूढ़े, बच्चे, जवान, बड़े-बड़े भाई साहब, ताली बजाओ, पालतु जानवर का खेल देखो, अंगरेजी नाच देखो। बाबुसाहब और मेमसाहब नाचे’ डुग डुग डुग डगाक…!

बच्चों की टोली हर्षित होकर पुकार उठी, एक साथ कई आवाजें, ‘बंदर बंदर हुप।।हुप।’ दौड़ते बच्चों की आवाज के पीछे कूत्ते भौंकने लगे।

‘बंदर बंदर…हुप… सुपर्ब मार्वेलस।’

‘क्या है सारिका भाभी? बंदरों को सुपर्ब और मार्वेलस! क्या है ये सब?’ बोब्ड हेर को झुलाती हुई ननद ने सारिका को झकझोर दिया।

‘ओह, सुधा बहन, इतने सारे कूत्ते क्यों भौंक रहे हैं?’

‘कुत्ते नहीं है, यह तो हमारा टोमी है, बुलाऊँ उसे? टोमी…टोमी टोमी… कमोन?’

दुम हिलाता हुआ कूत्ता सुधा के पैर के पास आ खड़ा हुआ। सुधा प्यार से उसे सहलाने लगी।

‘भाभी,देखिए न टोमी कितना बड़ा हो गया है? अब तो उसका नाम टाईगर रखना होगा हाँ! बुच् बुच् बुच् टाईगर शेकहेन्ड! बस डार्लिंग हीयर यु आर। ‘सुधा की गोद में छूपाता हुआ टोमी ऊँचा उठकर सारिका के मुँह के पास झूका रहा।

शून्यता…

बोब्ड हेर… गोद में छूप रहा टाईगर किसका नाम ये…? डार्लिंग! किसका उच्चारण ये?

माथेरान की होटेल में देर रात, मिसिस तारापुरवाला टाईगर से दुलार करती हुई, बरामदे में आराम कुर्सी में बैठी थी।

कल राइडिंग के लिए जाना है न? चलो जल्दी सो जाते हैं। सारिका का हाथ उसके हाथ में लेकर पति ने गुडनाईट कहा और सुना। थकी हुई सारिका बिछौने में जाते ही सो गई। परंतु…देर… रात…।

‘हाउ लकी ईज योर टाईगर? पति की आवाज बाहर सुनाई दी।

‘व्हाय डा…लिंग?’ मिसिस तारापुरवाले के प्यार भरे शब्दों के बाद की पुचकार… सुनते ही सारिका दबे पांव बरामदे में धंस गई। शीतल चांदनी में मिसिस तारापुरवाला सारिका के पति के वक्ष पर सिर रखकर दुलार रही थी।

‘देखो, ऐसा मत कहो। लेट मी से, हाउ लकी ईज योर वाईफ?’

मिसिस तारापुरवाले के हृदय पर सिर रखकर, सारिका के पति ने स्वर्गीय सुख का आनंद भोगते हुए आँखे मींच दी। दोनों की प्रमत्तावस्था को भंग करती हुई सारिका सटकर खड़ी हो गई। दोनों ने उसी को देखा। तनिक भी ना घबराये। परंतु… एकदा कुछ न होते हुए भी वह शर्म से मर गई थी। पति के प्रति शंका मात्र से वह खुद अर्धमृत हो चुकी थी।

‘बा कह रही थी, मनीष आया था, बहुत देर तक बैठा था।’

हाँ, सारिका की रुम में बहुत देर तक बैठा था, परंतु… ऐसे अनेक स्त्री-पुरुष मित्र आते ही थे न? यहाँ, कहाँ कोई बाधा थी?

‘हाँ सिनेमा की टिकट निकालकर ले आये थे। आपकी राह देखते हुए बहुत देर तक बैठे रहे। आखिर कोई भी नहीं गया और टिकिटें भी बेकार गई।’ डरते हुए सारिका तनिक हँसी।

‘परंतु आप दोनों को तो जाना चाहिए था न? मेरी क्या आवश्यकता थी? फालतू में यहाँ बैठे रहे, उसकी बजाय वहाँ बैठते, समजी तुम? घर में बैठकर आँखों में आने की क्या जरूरत थीं?’

‘पर आप…’

सारिका की बात अनसूनी करके उसको शाबाशी देते हुए पति ने बात को घुमाया। सारिका ने सोचा, मजाक होगा? ये तो ऐसे ही चले, संकेत होगा? परंतु उसका सही अर्थ तो सारिका को माथेरान में देर रात को ही समझ आया। उसकी उपस्थिति से कोई न घबराया, न ही हक्का-बक्का हुए। जड़वत् खड़ी सारिका को अति सहज रूप से पति ने पूछा,

‘क्या नींद नहीं आई?’

मिसिस तारापुरवाले ने अपनी कुर्सी को सम्हालते हुए बड़ी स्वस्थता से कहा।

‘हेव योर सीट मिसिस शाह!’ ‘और तुरंत ही टाईगर टाईगर कमोन!’ मिसिस तारापुरवाले की गोद में अब उसके पति के बदले टाईगर खेल रहा था। उसके बालों में उंगलियाँ सहला रही थी वह…टाईगर…टाईगर…

‘सारिका भाभी, ये टोमी कितना समझदार है न? जैसे कि हाल पूछने आया हो, कैसे झूका हुआ है? केवल बोल नहीं पाता इतना ही। हाँ संवेदना तो उसकी आँखों से टपक रही है न?’ सुधा के शब्दों को सुन रही सारिका के मन में छोटे-मोटे कूत्ते चकराने लगे।

‘टोमी…टाईगर…कूत्ते का पिल्ला…सब बराबर है। यह तो छोटा-सा एक ही दिन का पिल्ला छाती पर आ बैठा…’ बड़ाबड़ाती हुई सारिका शांत हो गई।

शून्यता…

‘अगर तुझे गोद भरने की या वात्सल्य उडेलने की जल्दी हो तो यह पिल्ला कहाँ गलत है?’

नहीं, नहीं, नहीं, भगवान के लिए, मैं आपके पैर पड़ती हूँ। ओह, मुझे उससे वंचित न करें। जो हो गया वह भले ही रहा, उसकी हत्या मत करना। यह एक बच्चा भले हो जाय बाद में कभी नही…।’

‘अरे माता-पिता होने के लिए तो पूरी जिंदगी है। अभी तो फ्री लाईफ, क्लब लाईफ, रिसेप्शन, डिनर,घुमना-फिरना बस यही होना चाहिए। शादी को तो अभी केवल एक साल ही हुआ है। अगले सप्ताह तो हमारी शादी की सालगिरह मनाने की धूम-धाम चल रही है! वोट रोट यु टोक?’

गोद में पिल्ला खेल रहा था, कूद रहा था, शेकहेन्ड भी करता था, पैर को चुमता था, दुम हिलाता, वही पिल्ला मोटर में भी, पार्टियों में, क्लबों में, समारंभ में भी, घुमने के सारे स्थानों पर भी साथ ही रहा। टोमी डार्लिंग का तो कितना जतन, कैसी मेहमान नवाजी! ‘आज कैसा अजीब है कि टायगर नाम रखना होगा’, बच्चे से भी अधिक हिफाजत पानेवाला पिल्ला…

‘ओह… ओह यह पिल्ला तो बड़ा होता ही चला, मरे सर, कपोल, हाथ… कैसी खुरदरी जिह्वा फेर रहा है… मुझे तो चक्कर आ रहे है… वह भी मानो झूले का चक्कर…उपर जा रहे झूले से नीचे देखने पर आनेवाले चक्कर आते है? परंतु… यह तो माथेरान… पेनोरमा पोईन्ट की ऊँचाई, बाप. .. रे…कितना ऊंचा? और चौतरफ घाटी ही घाटी। कितनी संकरी पगडंडियाँ! अगर घोड़े का पैर फिसला तो? अरे… अरे… यह घोड़ा, मुझे राईडिंग में मजा नहीं आयेगा…’

तबडक् तबडक…(घोड़े के दौड़ने की आवाज) ओह… मेरी तो हड्डियाँ चर-चर… हो रही है। मुझे मजा नहीं आयेगा। यह मुझे कहाँ लेकर जा रहा है? मैं तो अकेली पड़ गई, कहाँ है सब लोग?

‘मिस्टर तारापुरवाला, कितना अँधेरा? यह मंकी पॉइन्ट तो कितना निर्जन–सूमसान है! परंतु ये सब लोग गये कहाँ? दिखाई क्यों नहीं दे रहे? दूर तक देख रही सारिका के कंधे के पास, ‘म्युच्युअल अन्डरस्टेन्डिंग डार्लिग…’ मिस्टर तारापुरवाले की झहरीली साँस। पूरे वातावरण को आवृत कर रही थी।

‘ओह, हटाइए, हटाइए, यह कूत्ता तो जीभ बाहर निकालकर हाँफ रहा है। मेरी छाती पर… ओह सुधा बहन…बचाओ…बचाओ… खटिया उलट क्यों गई? भाग जाऊँ? मुट्ठियां भींचकर दौड़ जाऊँ? अरे, मुझे बचानेवाले सारे कहाँ रह गये? कौन बचाए? किसको दया है?’ बेबस सारिका की रुंआसी आवाझ सुनकर सुधा तो घबरा ही गई।

‘नर्स नर्स… डॉक्टर देखिए तो।’

क्या हुआ, क्या हुआ, आप रो क्यों रही हो! क्या कुछ कष्ट है? रोना नहीं चाहिए, रोने से तो…।

‘यह नर्स कह क्या रही है, मैं रो रही हूँ? मेरी आँखों में आँसू है?… तब तो उस दिन यह खजाना कहाँ लूट गया था? जिस दिन परम दुर्भाग्य, स्त्री की बदतर दशा वैधव्य को मैंने प्राप्त किया… उस दिन तो एक आँसु के लिए कितनी खोज की थी, थक गई थी। परिणामतः कोने में जाकर बैठी थी और कानाफुसी को सहन कर रही थी।’

‘पागल लग रही है।’

‘नहीं, नहीं वह तो दुःख के कारण हक्का-बक्का हो गई है।’

‘अरे, दु:ख लगे तो रोए तक नहीं, उसे स्त्री कहें या पत्थर?’

‘इसकी आँखे तो देखो एकदम सूखी है।

कितने सारे रिश्तेदार सास के पास धंस गये थे, सास से दूर! सारिका साज-श्रृंगार के बिना सफेद साडी में पाँव को पेट में गड़ाये, शून्य नजर से आवाजाही को देख रही थी। मृत्यु की गहन शांति थी। घर में युवा मृत्यु हुई थी। जैसे शादी की, वैसे मरण की कोई दौड-धूप नहीं थी। वही सारे रिश्तेदार, वही हल्ला, वही आवाजाही! रिश्तेदार आकर, अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे, मुख गंभीर थे। सुधरे हुए को तो रोने से भी बंधन-परहेज? मुँह खोलकर हृदयविदारक रुदन भी नहीं कर सकते? चुपके-चुपके रोकर माँ की तो आँखे फुल गई, परंतु सारिका की आँखों में तो अश्रु का अकाल पड़ा था।

‘बीमारी और मृत्यु समान क्यों लगते हैं?’

अब भी सारिका पति के मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रही थी, क्योंकि पति की बीमारी के समाचार तो दूर-दूर से आकर रिश्तेदार बंगले में रहने लगे, उन लोगों की मेहमान नवाजी में, किसी अनिष्ट घटना या आघात को अनुभव करने की सारिका को फुरसत ही नहीं मिली थी।

डॉक्टर की आवा-जाही, इंजेक्शन्स की तैयारियाँ, फोन की लगातार घंटी, महाराज को विविध प्रकार के भोजन बनाने की सूचना, मेहमानों की सुविधा के लिए की जानेवाली भाग-दौड़ ये सब करते हुए सारिका थककर चूर-चूर हो जाती थी। बीमार पति किस कमरे में सोया है, उन्हें हुआ क्या है, खुद की वहाँ जरूरत है या नहीं, खुद की तकदीर को उस बीमारी के साथ संबंध है या नही…। उस विषय में सोचने या चिंता करने तक की फुरसत उसे किसी ने भी नहीं दी थी।

हाँ कोई प्राणपन से जी फाड़कर रोया तक नहीं, न ही कोई बेसुध होकर गिर पड़ा, आये हुए मेहमानों में से कोई भी बिदाई हेतु हिले तक नहीं, बल्कि उसमें वद्धि हई. आवाजाही बढ गई। माहौल गंभीर हआ. नि:शब्दता ने डेरा डाला।

सारिका को सफेद साड़ी में, बिना श्रृंगार के खुले बालों के साथ, मुख्य हॉल में सास के पास बिठाया गया। तब ही उसे प्रसंग का गांभीर्य समझ में आया। चूपचाप बैठी सारिका आने-जानेवाले के पगरव को सुन रही थी। आनेवाले पांच मिनट बैठकर उपस्थिति दर्ज करवा के लौट जाते थे। चप्पल पहनते वक्त हो रही कानाफूसी सारिका के कानों में टकराती थी।

ये तो स्त्री है या पत्थर, सास की तो आँखे फुल गई है और यह तो सूखी आँखों से लोगों को ताक रही है।

ये सब सुन रही सारिका को लगा कि ‘रोना तो चाहिए। मेरे लिए अति रुदन करने का दिन आ चुका है। वे तो गये… जिनके लिए मैंने अपनी चाहतों, खुशी, संवेदनाओं को जड़ बना दिया था। जिनके ईशारों पर आज तक नाचती रही, उसी रंगमंच का सूत्रधार आज नहीं है। आज तो है इतना बड़ा घर, सारे रिश्तेदार, नौकर वर्ग, सुख-सुविधाएँ…। तथा धुम्रसेर के समान कहीं-कहीं अनुभूत होती पति के मृत्यु की शांति, भयावह शांति।’

‘मृत्यु-मृत्यु–वैधव्य… अरे इतना बड़ा दुःख, बड़ा-सा दुर्भाग्य, फिर भी आँखें रूखी-सूखी धरती के समान विरान क्यों बनी है? मुझे रोना है, अन्यों की खातिर भी रोना है। आज तक मैंने दूसरों के लिए सब कुछ किया और आज मैं रो नहीं पाती? ये आँसू मुझे धोखा देंगे?’…

इतने में सारिका बेहोश होकर नीचे गिर पड़ी। लोगों ने कहाः ‘पागल है। दिमाग काम नहीं कर रहा…डॉक्टर, अस्पताल…’ तीन दिन के बाद जब वह होश में आई तब वह अस्पताल के स्पेशल वॉर्ड में थी। दो माह से डॉक्टरों के मुख से उसके रोग के विविध नाम सुन रही थी, बेबसी के कारण खटिया पर थी। स्वास्थ्य अधिक खराब होता जा रहा था। ब्लड प्रेशर, हिस्टीरिया, एम्नेशिया और कभी कभी पागलपन, सन्निपात या बकवास जैसा…

‘नर्स… नर्स… मैं रो रही हूँ? मेरी आँखों में आँसू है? सासुजी को बुलाओ… उन मेहमानों को बुलाओ। नहीं, नहीं नर्स तुम मेरी आँखों को पोंछो मत। महा मेहनत से मुझे आँसू मिले है। किसी भी कीमत पर मैं उन्हें मेरे आँसू नहीं दूंगी। जा…जल्दी से जा… दौड़… मैं रो रही हूँ… हाँ… आँसू. ..आँसू…’

‘आया…नर्स…डॉक्टर…। दर्दी ने दंगा मचाया। चलो जल्दी चलो। पलंग का पिंजर डाल दो, बंध कर दो।’

सारिका की बूमाबूम और हो-हल्ला मचाने के कारण उसके पलंग की चारों ओर से पिंजर डाल दिया। उसी पिंजर में सारिका का तन और मन फड़फड़ा रहा हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’