Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: मई की जलती हुई दोपहर, मल्टीप्लेक्स में मूवी देखने के लिए कितनी मुनासिब है; यह बात ज़रूरतमंद आशिक़ ही समझ सकते हैं। यह वह जगह ज़रूर है जहाँ बेदर्द इंसानी करतूतों की बरस रही आग से बचते हुए, दिलों को गर्म-ठंडी साँसों की धौंकनी दी जा सके। रद्दी, बेस्वाद मूवीज़ बनाने वालों का मैंने बहुत बार मन से उपकार माना है; वे जाने-अनजाने दुनिया की भागमभाग से थके दुनिया के अनागतों को अपने ही ख़्वाबों में खो जाने की सहूलित से लबालब, कॉर्नर सीट मुहय्या कराते हैं। आज यह ख़याल भी हावी हो रहा था कि कम से कम उन कूड़ा मूवीज़ में ज्यादा तेज़ आवाज़ें सरकारी प्रतिबंध का शिकार हो जानी चाहियें। बहरहाल! इन्टरवेल के बाद हमने तय किया कि, उस शोर-शराबे में बैठने की जगह मॉल के ही किसी रेस्टोरेंट के माहौल का सुख लें। इन्टरवेल के बहुत धीमे और कानों में रस बहाते संगीत के बीच मैंने उसे छेड़ने की नीयत से आँख मारी।

“तुम्हारे बग़ैर कैसे रह सकूँगी?” उसने जब कहा तो मैं समझ गया कि क्या हुआ होगा जो मेरी आँखों ने ऐसी गूंज पैदा कर दी।

उसके चेहरे के बदले और रुके भावों पर नज़र मारते हुए मैंने कहा- “घर में आज फिर शादी की बात हुई है?”

“यह कहानी तो रोज़ ही चलती है।”

“लाइफ़ का यही वे है, तो डरना क्या। मैं रहूँगा ना तुम्हारे साथ, बस फिजिकल डीस्टेंस ही तो होगी। और ज़िंदगी सब सिखा देती है, हर किसी के बिना जीना और अकेले मरना।”

“हाँ, लेकिन मैं किसी और से प्यार तो नहीं ही कर सकूँगी।” मैं जानता था, स्थिर आँखों ने उस दिन का सच कहा।

जज़्बाती होने की जगह नीयत में बदमाशी आज सुबह से ही थी मेरे। “हा…हा…हा…देखो डियर, मैं तो इस बात का कोई प्रॉमिस नहीं करता। तुमसे पहले किसी और से प्यार था मुझे। तुम्हारे बाद क्या होगा…फ्यूचर की किसी अनदेखी बात के लिए कैसे प्रॉमिस कर सकता हूँ, जिसका कंट्रोल मेरे पास नहीं?”

“वह तो मुझे भी पता है, कभी कोई अच्छी बात नहीं कर सकते?” जैसे वह जागी हो और होने वाले सच को अपने मुताबिक सच में बदल देना चाहती हो।

“अच्छा बताओ, तुम्हें वे वायदे लुभाते हैं जिनके झूठ हो जाने के पूरे आसार हों? हा…हा…हा…” वह जानती ही है कि मुझे उसकी उम्मीदों से खिलवाड़ करने का भरपूर शौक़ है।

“तुमसे कोई प्रॉमिस नहीं माँगती; पर अच्छे सपनों से भी तो ज़िंदगी जी जा सकती है। ढंग की बातें कर लेने में तुम्हें कौन सी तकलीफ़ होती है?” मैंने सोचा इससे अभी ही तो कहा था कि रहूँगा तुम्हारे साथ,बस फिजिकल डिस्टेंस होगा, शायद उसे यह झूठी तसल्ली लगी हो; पर अच्छे ख़्वाब झूठी तसल्ली से दूरी कितनी रखते हैं?

“मेरी जान! मैं उन ढंग की बातों से कैसे ख़ुद का चेहरा छिपा सकूंगा जो मुझे ख़्वाबों का क़ातिल बता रही होंगी?”

“छोड़ो ये सब। इस मामले में कभी हमारी बनी है, जो आज बनेगी।”

मेरे पनीर टिक्का के मन पर, बगैर बहस विजयी व्हाइट सॉस पास्ता का मुझे ना पसंद आने वाला टेस्ट लेते हुए मैंने उसकी और कुछ खाने की इच्छा पूछी। अगर ज़िंदगी को सवाल समझें, तो उसकी उठती हुई पलकों में ज़िंदगी जीने के हज़ार जवाब तैरते हुए नज़र आए मुझे। ज़िंदगी को गुनाह कहने वालों से नफ़रत यूँ ही तो पनपी है।