seth dhillu mal ki kahani
seth dhillu mal ki kahani

उस दिन ‘प्रभात समाचार’ के प्रमुख संवाददाता देबू सरकार को निक्का से बात करके ‘दुनिया के उस अनोखे चोर’ के बारे में इतनी बातें पता चलीं और इतना ‘मसाला’ मिला कि एकबारगी तो वे रोमांचित हो उठे। फिर जिन लोगों के घर चोरियाँ हुईं, उनसे भी वे आज सुबह ही मिलकर आए थे। उन्होंने भी अपने-अपने ढंग से यही बात कही थी। हर जगह उन्हें एक से एक अजीबोगरीब किस्से सुनाई पड़े। गोपालपुर के सबसे मालदार आदमी सेठ ढिल्लूमल ने तो अपने ठेठ देसी अंदाज में साफ-साफ कहा था—

“अरे भई अखबार वाले पत्तरकार!…क्या कहूँ और क्या न कहूँ? मेरे को तो कुच्छ समझ नहीं आता।…मैं तो जी, खुद-ब-खुद बेवकूफ बन गया और अपने पैरों पे कुल्हाड़ी मार ली। आप यकीन मानो, वो चोर तो जी, एकदम टहलता-टहलता सा आया। आते ही बोला कि सेठ ढिल्लूमल जी, मुझे दस लाख रुपए चाहिए। जरा जल्दी से बताइए, घर में कहाँ छिपाकर रखे हैं?…इस पर मैंने उसे सब कुछ बताया और यह भी बता दिया कि चाबियाँ कहाँ पड़ी हैं। और लो साहब, चोर पैसे निकालकर चलता बना। अब क्या होत पछताए, जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत!…”

सेठ ढिल्लूमल की कहानी सुनकर देबू सरकार सनाका खा गए थे। बड़े अचरज से पूछा, “नहीं-नहीं सेठ जी, ऐसा नहीं हो सकता। कुछ न कुछ और ही चक्कर होगा! वरना आप जैसा होशियार आदमी…?”

“अरे, होशियारी क्या करेगी, भाई?…होशियारी गई भाड़ में! वह चोर है ही ऐसा मनमोहना कि उसके आगे किसी की कोई होशियारी नहीं चलती।” सेठ ढिल्लूमल माथे पर हाथ पीट-पीटकर बता रहे थे।

फिर पूरा किस्सा भी सुनाया उन्होंने। बड़ा ही हैरतअंगेज था वह किस्सा…

“अच्छा, मैं बताता हूँ आपको कि उस दिन हुआ क्या।…देखो जी, कोई आधी रात का वक्त था। मैं सो रहा था, तभी किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई। मैंने दरवाजा खोला तो चोर बड़े आराम से टहलता-टहलता घर के अंदर आ गया। वह इतना शरीफ लग रहा था कि मैंने सोचा, कोई हमारा गहरी जान-पहचान का या कोई दूर का रिश्तेदार तो नहीं है!…सच्ची बात तो यह है कि हमारी साली का बेटा दुल्लीराम भी देखने में कुछ-कुछ ऐसा ही है। तो सोचा, कहीं दुल्लीराम ही तो नहीं है? मगर तब क्या जानता था कि यह चोर है, दुश्मन नंबर एक, जो आधी रात को मेरा घर लूटने आया है। टहलते-टहलते वह कमरे में घुसा और पूछा, ‘सेठ जी, जल्दी से बताइए, आपने पैसे कहाँ छिपाकर रखे हैं। मुझे दस लाख रुपए चाहिए, अभी!’

इस पर मैंने हाथ जोड़कर कहा कि भैया, पैसे तो अंदर बैडरूम वाली तिजोरी में हैं। ‘कोई बात नहीं…!’ उसने मुसकराते हुए पूछा, ‘सेठ ढिल्लूमल जी, अब बस, इतना और बता दीजिए कि उस तिजोरी की चाबी कहाँ है?’

मैंने उसे बताया, ‘भैया, चाबी तो मेरे तकिए के नीचे है।’ सुनकर उसने कहा, ‘अच्छा, सेठ जी, अब आप मेरे साथ चलो।’

मैं उसके साथ बैडरूम तक आया। उसने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और तिजोरी से पैसे लेकर चाबी ठीक उसी जगह रखकर चला गया।… समझ गए न आप? यकीन मानो, यही हुआ था, एकदम यही। बस समझो कि उस चोर के आगे मेरी मति मारी गई थी। एकदम सच्ची बात बता रहा हूँ आपको। आप चाहो तो अपने अखबार में लिख देना…!”

कहकर सेठ ढिल्लूमल एक क्षण के लिए रुके। फिर मानो गद्गद होकर चोर की तारीफ करते हुए बोले, “कुछ भी कहो भैया, चोर इतना शरीफ था कि उसने दस लाख कहे तो फिर दस लाख ही लिए और चाबी मुझे सौंपकर चला गया। पूरी शराफत से!…”

‘प्रभात समाचार’ के संवाददाता देबू सरकार ने अपनी डायरी में सेठ बुलाकीराम की सारी बातें नोट कर ली थीं। बारीक से बारीक डिटेल्स तक।

फिर वे शहर के गल्ले के बड़े व्यापारी भोलाभाई और गोपालपुर के कुछ और लोगों के घर हुई चोरियों की जानकारी लेने चल पड़े थे।

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)