मामला हर क्षण रोमांचक होता जा रहा था। किस्सों पर किस्से…!
उस मायावी चोर के किस्से खत्म होने में ही नहीं आते थे।
इनमें सेठ भोलाभाई का किस्सा भी खासा अजब-गजब था। उन्होंने अपने घर हुई चोरी के साथ-साथ सुपर हाईटेक चोर का पूरा ब्योरा देते हुए कहा था—
“अजी मेरे प्यारे भाईजान देबू जी, क्या बताऊँ?…मैं तो जी, मूरख बन गया। एकदम समझो, बज्र मूरख!…सब अपनी गलती है जी! उसने मेरी आँखों के सामने मेरी घरवाली लाजवंती के हीरे के सारे गहने माँगे। और आपको हैरानी होगी, उनके बारे में बताया खुद मैंने ही। उसके पूछने पर एक बार तो मैंने चाहा कि उसको न बताऊँ! पर भैया, न जाने क्या जादू हुआ कि मैं तो उसे बताए बगैर रह ही नहीं पाया।…फिर उसने बड़े मजे से मेरे सामने ही लाजवंती के हीरे के सारे गहने समेटे। उन्हें मैरून रंग की मखमल की डिब्बी में बड़े इतमिनान से सँभालकर रखा।…एकदम सच्ची कह रहा हूँ जी! और फिर डिब्बी अपनी जेब में रखते हुए बोला, ‘अच्छा सेठ भोलाभाई जी, अब हम चलते हैं, नमस्कार!’
“मुझे अच्छी तरह पता था, यह नमस्कार करने वाला बंदा मेरे क्या कुछ बेशकीमती गहने उड़ाकर लिए जा रहा है।…पर सच्ची बात है भई, कि मैंने उसे नहीं रोका! मैं चाहता तो उसे पकड़ सकता था। पर नहीं, मैंने उसे बड़े आराम से जाने दिया। मुझे लगा, यह इतना शरीफ सभ्य और भला-भला इनसान है। तो बेकार इसे रोककर या चिल्लाकर मैं अपनी असभ्यता का परिचय क्यों दूँ? सो भैया ले जा रहा है तो ले जा! और मैंने हाथ जोड़ दिए!…मगर भैया, ऐसे कैसे कहूँ कि दुख नहीं हुआ। जब किसी की बीवी के कीमती हीरे के गहने जाते हैं तो कलेजे पर छुरियाँ तो चलती ही हैं, फिर भले ही वह बंदा मेरे जैसा शहर का जाना-माना सेठ भोलाभाई ही क्यों न हो।…क्यों जी, आप क्या कहते हो?”
भोलाभाई की बातें ऐसी थीं कि सुनते हुए देबू सरकार एकदम भौचक्के से रह गए।
मूर्खों की तरह मुँह बाए वे सेठ भोलाराम जी की ओर देख रहे थे, बस, देखते ही जा रहे थे। और साथ ही साथ सोच भी रहे थे, “देखो, इस बंदे ने तो अपना दिल ही निकालकर रख दिया। कैसी मजबूरी है बंदे की। और वह चोर भी कैसा शातिर…! कोई सोच सकता है क्या?”
फिर वे शहर के तीसरे व्यापारी बच्चू भाई लक्कड़वाला से मिले, तो मामले का एक नया पेंच सामने आया। बच्चू भाई लक्कड़वाला ने अपनी टोपी उतारकर सिर पर अच्छी तरह हवा की, जैसे खुद को शांत करने की कोशिश कर रहे हों। फिर दोबारा टोपी लगाते हुए बड़े ही टूटे दिल से बोले—
“अजी जनाब, क्या बताऊँ, हुआ तो मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही था।…जाने क्या बात थी कि उसके सामने तो मैं खूब भला-भला, सभ्य बना रहा और अपना सब कुछ लुट जाने दिया। मगर उसके जाने के बाद मुझे बहुत गुस्सा आया। बहुत ज्यादा।…तो मैंने सोचा कि साले शरीफ चोर की ऐसी-तेसी। इसे छोड़ना नहीं, पकड़वाना ही है!…पर क्या करूँ? जब वह गया तो कमरे में उसका कोई सबूत तक नहीं था। यहाँ तक कि उँगलियों के निशान भी नहीं। राम जाने किस तरह के जूते या दस्ताने पहनकर वह सफाई से अपना काम करता है और काम करके उतनी ही सफाई से चला जाता है। क्या पता चोर है कि कोई जादूगर?…मैं तो जी, खुद ही चक्कर में हूँ, आपको क्या बताऊँ! तो आप जो भी ठीक समझो, अपने अखबार में लिख देना।”
बच्चू भाई लक्कड़वाला की बातों से कुछ नए राज सामने आए, जिन्हें देबू सरकार ने नोट कर लिया।
इसी तरह बैंक में काम करने वाली एक पढ़ी-लिखी युवती शांताबाई से भी वे मिले, जिसके सारे के सारे गहने चले गए थे। देबू सरकार के पूछने पर शांताबाई ने कुछ उदास होकर बताया, “क्या कहूँ जर्नलिस्ट जी, बस इतना कह सकती हूँ कि वह बंदा बुरा तो नहीं लगता, पर काम बुरा करता है।…मेरा तो उसके बारे में यही कहना है कि वह पढ़ा-लिखा, बड़ा ही सभ्य युवक है, जो हमेशा मुसकराता रहता है। यहाँ तक कि चोरी करते समय भी वह मुसकरा रहा होता है! मुझे उसकी यह बात नहीं भूलती, और कभी भूलेगी भी नहीं।…”
‘प्रभात समाचार’ के संवाददाता देबू सरकार को उस युवती की बातों से पता चला कि चोरी का माल साथ लेकर जाते समय उस महाचोर ने बाकायदा हाथ जोड़कर बड़े सभ्य ढंग से उससे विदा ली, और कहा कि “अच्छा मैडम, धन्यवाद। अब मैं चलता हूँ!”
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
