Hindi Kahani: होटल मोक्ष से बाहर निकलते हुए ‘उसे’ कई बार देखा था।
वह भी यहां मेरी तरह मेडिटेशन के लिए ही आई होगी।
वैसे भी मोक्ष आम पर्यटकों के लिए नहीं था। किसी धनी व्यक्ति ने ध्यान करने वालों के लिए यह होटल नुमा गेस्ट हाउस बनवा दिया था। नाम दे दिया था –मोक्ष।
मैं यहां ध्यान शिविर अटेंड करने के लिए आया हुआ था
वैसे ध्यान करने की यह पहली शर्त होती है अपने मन की गंदगी को ही दूर करना और अपने अंदर की शांति को ढूंढना ।
मगर जब से ‘उसे’ देखा था तब से मेरा मन भटक रहा था उसी के आगे पीछे।
बहुत ही साधारण सी, पतली दुबली, गेहुंआ रंग की एक सामान्य सी व्यक्तित्व के स्वामिनी थी वह ,पर उसपर नजर पड़ते ही ना जाने मेरे भीतर कितने ख्यालातों ने जन्म ले लिया था।
मैं उसी के बारे में जानना चाहता था!
पता नहीं क्या यह मेरा पागलपन था या फिर पहली नजर का प्यार!
यूं तो मेडिटेशन सेंटर के हॉल में किसी को नजर उठाकर देखना मना है।
लेकिन फिर भी आज उसे लेकर मेरा मन उसके प्रति उत्सुकता से भर गया था।
मेडिटेशन सेशन में आज हमारा आखिरी दिन था।
ना जाने क्यों मैंने अपना शील भंग करते हुए मैंने चारों ओर नजर दौड़ाई ।
वहां पहुंचने वालों में मैं सबसे पीछे था ।
सभी लोग अपने आसन में आसन्थ हो चुके थे।
मैं उसे ही ढूंढ रहा था।तभी मेरी नजर उसपर पड़ी।
दोनों आंखें बंद, पद्मासन में दोनों पैर और अपने सीधी बाजुओं में न जाने किन ख्यालों में खोई थी।
क्या उसे परम सत्य को जानने की इतनी ही गहन इच्छा थी या फिर वह अपने किसी पिछले सत्य से भागने की कोशिश कर रही थी…,मेरी तरह!
मैं उसके बारे में जान कर ही रहूंगा।कल तो फिर हम सब लौट जाएंगे।
दोपहर के बाद जब हम सब ध्यान शिविर से बाहर निकल गए तब आचार्य जी ने हम सब से कहा
“दस दिन का शिविर आज खत्म होता है। आप सभी साधक एक दूसरे से परिचय कर लीजिए।
आज दिन के भोजन के बाद आप सब फ्री हैं। चाहें तो यहां के पर्यटन का आनंद ले सकते हैं।
फिर कल तो सब लोग यहां से वापस लौट ही जाएंगे।”
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आचार्य जी के कहते ही सबके बीच खुसर-पुसर शुरू हो गई थी।मुश्किल से 30 35 लोग होंगे। सभी एक दूसरे का परिचय जानने की कोशिश कर रहे थे।
दोपहर का भोजन बना हुआ था। मेरी नजर उसी को तलाश रही थी।
वह एक टेबल में अकेले ही बैठे खा रही थी। ना जाने उसका दिमाग कहां खोया हुआ था।
मैं अपने प्लेट में खाना लेकर उसके पास पहुंचा और उसे धीरे से बोला
“हैलो, मैं निशांत! मैं यहां बैठ सकता हूं?”
उसने भी मुस्कुराते हुए कहा “जी, बिल्कुल बैठिए।
मेरा नाम सारिका है । आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई।”
“थैंक्यू!”अब इससे आगे क्या कहूं समझ ही नहीं आया।
फिर मैंने कहा “आप मोक्ष में ठहरी हैं ना !”
“जी!”
“मुझे तो कल ही निकलना है।”किसी तरह से मैंने बातचीत जारी रखा।
“ मैं भी कल ही निकल रही हूं ।आप कहां जा रहे हैं?”
“ मैं इलाहाबाद जा रहा हूं।”
“ मुझे दिल्ली जाना है ।”
कुछ मेरे अंदर बिखरा हुआ सा महसूस होने लगा था।
न जाने कैसा जुड़ाव महसूस कर रहा था उसके प्रति।
“सारिका जी, आपका नंबर ले सकता हूं?”
“जी हां बिल्कुल ।”
“थैंक्यू सारिका जी, आप यहां कब से जुड़ीं हुईं हैं?”
“ हो गया कुछ अरसा…बस शांति की खोज में, वह मुस्कुराई…यहां मुझे शांति मिलती है।”
मुझे यकीन नहीं था कि वह मेरी बातों का इतनी अच्छी तरह से जवाब देगी।
दूसरे दिन अपने सामान के साथ मैं ट्रेन के इंतजार में था। वहां कई और सहयात्री भी खड़े थे। वह भी थी।
उसे देखकर मैं मुस्कुराया वह भी मुझे देखकर मुस्कुराई।
“पूरी रात भर की जर्नी है। कल सुबह हम दिल्ली पहुंचेंगे ।”वह मुस्कुराते हुए बोली।
“जी।”
यह बात मुझे आश्चर्य चकित कर गई वह मेरे सामने वाले ही बर्थ पर बैठी हुई थी।
देखते ही देखते ट्रेन चल पड़ी और हमारे बीच वार्तालाप के संवाद भी।
“ मैं एक साहित्यिक पत्रिका में काम करती हूं निशांत जी।उसने मुझे लिखने के लिए एक कहानी दिया था -”पहली नजर का प्यार!”
मैं बहुत ही ज्यादा टेंश हो गई थी इस सब्जेक्ट को लेकर। मैंने उन्हें मना किया था कि इस तरह के टाइटल ना दे मगर अभी वैलेंटाइन डे आने वाला है ना तो वे लोग माने नहीं।
कुछ चीजें भूलने की जरूरत पड़ती है…बस मैं वहां से भाग निकली।मुझे ध्यान शिविर में ही अच्छा लगता है…सबकुछ भूल जाती हूं!”सारिका बोलती जा रही थी।
ऐसा लग रहा था कि उसकी आवाज़ गहरी नदी के भीतर से आ रही थी।
उसके चेहरे पर कई भाव आ जा रहे थे। एक दर्द सी टीस जैसे कि उसे चुभो गई हो, वह हताशा और प्रायश्चित से भरी हुई थी।
मैं प्रश्न सूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगा।
मुझे समझ नहीं आया कि मैं कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करूं।
मुझे इस तरह से देखते हुए वह चुप हो गई।
फिर उसने कहा
“इसी पहली नजर के प्यार ने मुझे अपने माता-पिता,परिवार, अपनी नजर सबसे गिरा दिया था। कैसे बताऊं?” उसकी आंखें आंखें भर आई थीं और गला रुंधने लगा था।
“सारिका जी कभी-कभी दिल का गुबार बाहर निकाल ही देना चाहिए। आपका दिल हल्का हो जाएगा।”
“आप बिल्कुल सही कहते हैं निशांत जी, उस पहली नजर के प्यार में मैंने अपने माता पिता के भावनाओं को ठोकर मारकर अपने आप को अंधे कुएं में गिरा दिया।
मैं दिल्ली से ही पत्रकारिता की पढ़ाई की थी।
न जाने वह कैसी मनहूस घड़ी थी। दिल्ली मेट्रो में मुझे केशव मिले थे।हम दोनों एक-दूसरे के प्यार में अंधे हो गए थे।
मेरे माता-पिता मुझे समझाते रहे मगर मैं प्यार में अंधी थी।उनके ही खिलाफ जाकर केशव से कोर्ट मैरिज कर लिया।
कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक रहा। उसके बाद उन्हें मेरी कमियां दिखने लगीं।
उसे दहेज भी चाहिए था मेरे घर वालों से सामान भी।
वह नकाब में छुपा एक लोभी भेड़िया था बस प्यार का ढोंग करता था। यही उसका पार्ट टाइम जॉब था।
ना जाने उसके अंदर कुछ शक्ति थी या फिर किसी प्रकार की सिद्धि वह लड़कियों को अपनी नजरों से फंसा लेता था।
छह महीने बहुत ही मुश्किल और जद्दोजहद के साथ गुजरा। बड़ी मुश्किल से मैंने तलाक ले लिया।
6 महीने भी मेरी शादी नहीं चली। मैं वहां से निकल कर चली आई।
अब घर वापस जाने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि मैं तो अपने घर के दरवाजे तो खुद ही बंद कर लिया था।
इतनी अच्छी पढ़ाई के बावजूद मुझे कहीं काम नहीं मिल रहा था। बड़ी मुश्किल से मैंने यह साहित्यिक पत्रिका ज्वाइन किया। यह पांच साल मैं कैसे बिताया है मैं आपको बता भी नहीं सकती!
मेरे परिवार में सब कोई है मगर मेरे साथ कोई भी नहीं! मैं कितनी अकेली हूं आज आपको देखा तो मेरे मन का गुबार निकल गया!
थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद उसने फिर से कहा,मुझे किसी ने इस मेडिटेशन सेंटर के बारे में बताया था तब से मैं हमेशा ही यहां आया जाया करती हूं। मुझे बहुत ही शांति मिलती है।”
सारिका ने अपनी जिंदगी के सारे पन्ने खोल कर रख दिए थे।
मैं चुप हो गया। ऐसी ही कहानी तो मेरी भी थी मगर मैं एक पुरुष था इसलिए मेरे परिवार मुझे बायकॉट नहीं कर सकते थे।
आज भी हिना को याद कर मेरा दिल रो पड़ता है।
पता नहीं ऐसी फिल्में ही क्यों बनती है जिसमें प्यार की कितनी अहमियत दिखाई जाती है जबकि असल जिंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं होता।
प्यार का मतलब सिर्फ धोखा होता है।
मैंने हिना से सच्ची मोहब्बत की थी और उसने…!
खैर मैंने अपनी भावनाओं को संभालते हुए
सारिका को सांत्वना देते कहा
“ये जीवन है इस जीवन का…! आपने सुना है ना।ऐसा कुछ भी नहीं सारिका जी।आप अपनी बीती बातें भूल जाइए। हमेशा अच्छा तो मिलता नहीं।”
दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो उसने अपना सामान उठाया और अपना हाथ हिलाते हुए बोली
“बहुत अच्छा लगा आपका साथ ।ऐसा लगा सूखे पड़े हुए रेत में बारिश की बूंदे आ गिरी हैं। आई होप हम आगे भी बात करते रहेंगे।”
“बिल्कुल ।”मैं भी उसे हाथ हिलाते हुए कहा।
उसके जाने के बाद मैं बेचैन सा हो गया।
ऐसा तो हिना के साथ भी नहीं था ।जब मैं कॉलेज में पढ़ता था तो वह मेरे साथ ही पढ़ती थी।
घर में सभी लोग मेरे और हिना की दोस्ती के अगेंस्ट थे मगर मैं किसी की सुनने वालों में नहीं था।
जैसे ही मेरी नौकरी लगी मैंने उससे प्रेम विवाह कर लिया था।
मगर यह शादी टिक नहीं पाई । मेरे और हिना दोनों के विचार ही मेल नहीं खाते थे।
अंत में मुझे कोर्ट का ही सहारा लेना पड़ा हम दोनों अलग हो गए।
उसके जाने के बाद मां ने कितनी जोर जबरदस्ती की कि तुम एक अच्छी लड़की से शादी कर लो पर मेरा दिल नहीं मान रहा था।
एक हिना काफी है…!मेरा दिल टूट गया था।
लेकिन आज सारिका को देखकर ना जाने मेरे अंदर कौन सी भावनाएं जन्म ले लीं थीं…! क्या यह प्यार है ? मैंने अपने आप से सवाल किया।
मेरे घर लौटने पर मां ने मेरा खिला हुआ चेहरा देखकर बहुत ही खुशी से प्रतिक्रिया देते हुए कहा
“क्या बात है मुन्ना, इस बार तो तू बहुत ही खुश नजर आ रहा है?”
“अरे कोई बात नहीं है मां।”
“आ जाओ फ्रेश होकर मैं खाना लगाती हूं।”
मैं नहा कर आया, मां खाना लगाकर मेरा इंतजार कर रही थी ।
उन्होंने बहुत ही गंभीरता से कहा
“देखो मुन्ना, अब तुम वयस्क हो चुके हो। अपनी नौकरी कर रहे हो।
मैं ज्यादा तो नहीं कहूंगी बस उम्र का तकाजा ऐसा था। मैं तुम्हें दोष भी नहीं देना चाहती कि तुमने कोई गलती की।
मगर अब हिना को याद कर तुम कितने दिनों तक ऐसे ही रहोगे?”
आज मां की बातें मुझे मेरे कानों में चुभ नहीं रही थीं।
तब तक सारिका का फोन मेरे मोबाइल पर बजने लगा।
“ ताज्जुब है किसी लड़की का फोन आ रहा है? वह भी तेरे मेडिकल सेंटर से लौटने के बाद?”
सारिका से बात करने के बाद मां से मैंने कहा
“ मां यह भी एक साधिका है।मुझे वहां मेडिटेशन सेंटर में मिली थी।बहुत ही अच्छी है।वह भी मेरी तरह ही प्यार में धोखा खाई हुई है।
लगभग सेम ही कहानी है हम दोनों की।
5 साल पहले उसका भी तलाक हो गया था।”
“ओह!”मां के चेहरे पर दर्द साफ नजर आ रहा था।
कुछ दिन यूं ही ही बीत गए। मैं और सारिका बहुत ही करीब आ गए थे।
एक दिन ने उसने मुझसे कहा वह महाराष्ट्र जा रही है वहां के टूरिस्ट प्लेस को कवर करने के लिए।
मैं भी छुट्टी लेकर महाराष्ट्र चला गया।
समुद्र के किनारे हाथों में हाथ डाले हम दोनों देर तक घूमते रहते।भीगे हुए बालू में पैरों के निशान बनाते हुए।
सूर्य ढलान पर थे।मैं ने अचानक ही हिम्मत बटोरा और उससे अपने दिल का हाल कह दिया।
मैंने अपनी हथेली फैला दिया और उससे कहा “समय तो गुजर गया है हमारा, एक बहुत ही जहरीली डंस देकर। मरने से पहले क्यों न हम एक दूसरे को थाम लें?”
वह पहले तो आश्चर्यचकित होकर मेरी तरफ देखने लगी फिर वह शरमा का धीरे से मेरी हथेलियों पर अपनी हथेली रख दी।
मैंने भी उसकी हथेली को कसकर अपनी मुठ्ठियों में जकड़ लिया।
