भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
बगावत का कीड़ा दिमाग में बहुत पहले से मौजूद था, जो कभी-कभी कुलबुलाने लगता।
“नजर अंदाज करना सीखो… वरना जिंदगी मुश्किल हो जाएगी।”
कानों में उभरती एक कमजोर-सी सरगोशी (फुसफुसाहट) उस कुलबुलाहट को दबा देती और मैं अपना ध्यान रोजमर्रा के काम में लगाने की कोशिश करती। कुलबुलाहट और सरगोशी के बीच का फासला कभी बढ़ जाता तो कभी घट जाता। फिर तवाजुन (संतुलन) डगमगाने लगा। आवाज घट गई… कुलबुलाहट बाहर निकलने के लिए मचल गई। क्यों…? कभी-कभी बेहद मामूली बात भी हमारी सोच को, हमारे अमल को और सबसे बढ़कर हमारे रद्देअमल (प्रतिक्रिया) को अपनी गिरफ्त में लेकर उसे गैर मामूली बना देती है। ऐसा क्यों होता है…? यह सवाल हमें माजी (भूतकाल) से जोड़कर हमारे हाल (वर्तमान) पर असर-अंदाज होते हुए हमारे मुस्तकबिल (भविष्य) की जड़ों को हिला देता है और हम एक तमाशाई की तरह खड़े रह जाते हैं। क्यों…? दिमाग में बहुत-से सवाल पनपते और जहन ही अपने दलाइल (तर्कों) से उसे मुतमईन (संतुष्ट) कर देता। कभी-कभी इस सवाल-जवाब पर मुझे हँसी भी आती। शायद मेरे दिमाग की बनावट में ही कुछ नुक्स (विकार) होगा, जो हर वक्त उलझा रहता है। हालाँकि मेरा बचपन एक खुले माहौल में गुजरा था, जहाँ ना तो सोचने पर पाबंदी थी और ना ही अमल करने पर। मैं खानदान की पहली लड़की थी, जिसने एम.बी.ए. किया था और घर से दूर एक बड़े शहर में नौकरी कर रही थी। मेरा अकेले रहना एक मुश्किल फैसला था। मगर आज हम उस दौर में आ गए हैं. जहाँ मर्दो की गैरत (स्वाभिमान) के पैमाने बदल गए हैं और बेटी और बीवी की कमाई को ना सिर्फ कुबूल कर लिया गया है, बल्कि सराहा भी जा रहा है। बावर्चीखाने में कबाब तलती औरतों को अपनी कम-माएगी (हीनता) का एहसास शिद्दत से होने लगा था। घर में उनकी हैसियत कोने में रखी सिलाई मशीन से ज्यादा नहीं रह गई थी, जैसे बुटीक ने उनको बे-वकत (अस्तित्वहीन) कर दिया था। वैसे ही बर्गर और चाऊमीन ने उनके हुनर को घुन लगा दिया था।
‘शादी कैसे होगी…? कहाँ होगी…?’ अम्मा का सोच-सोचकर बुरा हाल था।
“जमाना बदल गया है। आजकल सब कामकाजी औरतों को पसंद करते हैं। हमारे जैसी लड़कियों को तो हर वक्त बेकारी का ताना सुनने को मिलता है।” आपा ने समरा को फ्राक पहनाते हुए जोर से उसका हाथ खींचा, वह चीखी।
“अरे, अरे, अब बच्ची पर गुस्सा क्यों निकाल रही हो?”
दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने का अपना ही मजा था। हम तीन लड़कियों ने मिलकर एक फ्लैट ले लिया। मगर औरत की आजादी की कायल आपा उस वक्त खामोश हो गई, जब मुझे कंपनी की तरफ से लंदन में पंद्रह दिन की ट्रेनिंग पर जाने का मौका मिला।
“कुल पंद्रह दिन की तो बात है, आपा।” पंद्रह दिन पर जोर देते हुए मैंने बात को हल्का किया।
“मगर असमा इतनी दूर… अकेले..!”
मैं कुछ सुनने-समझने के मूड में नहीं थी। अम्मी और अब्बा को आपा ने ही कायल किया… और वह पंद्रह दिन मेरी जिंदगी के यादगार दिन बन गए। नया मुल्क…नई-नई जगह… नए लोग…उनकी बातें…उनके तजुर्बे… जिंदगी को देखने का उनका नजरिया। आपा को मैंने तफ्सील से बताया।
“बस बहुत हो गया। अकेले घूमना-फिरना अब बंद।” मेरे जोश को कंट्रोल करते हुए उन्होंने अपनी बातों का सिलसिला शुरू किया। फिर अशहर की तस्वीर दिखाते हुए उसकी खूबियों की लंबी फेहरिस्त सुनाई…। अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने कहा, “अरे, इसे तुम्हारे नौकरी करने पर कोई एतराज नहीं है।”
“यह क्या खूबी हुई भला…” मैं बहस शुरू ही करने वाली थी कि आपा ने अपने मजबूत दलाइल से मुझे खामोश कर दिया।
“शादी तो होनी है ना…? और अशहर से बेहतर लड़का हम नहीं तलाश कर सकते।”
उन्होंने तल्ख लहजा अपनाते हुए अपनी बात मुकम्मल की। मैंने सिर झुका कर हामी भर ली।
शादीशुदा जिंदगी का कोई खाका मेरे पास नहीं था, या शायद किसी के पास भी नहीं होता। अलबत्ता शादी के जिक्र पर ऑफिस में होनेवाली गुफ्तगू याद आ गई। मैंने पूनम और नादिरा के साथ ऑफिस ज्वाइन किया था। पहली बार नौकरी करने का और अपने पैरों पर खड़ा होने का नशा ही अलग होता है। ऑफिस में अनुराधा मैडम सबसे सीनियर थीं। बेवा थीं और दो बच्चों को अकेले संभाल रही थीं। मरियम थी, जिसकी शादी को पाँच साल हो गए थे। उसके शब-ओ-रोज का पता उसका हुलिया बता देता। कभी तो खूब सजधज के साथ ऑफिस में दाखिल होती, तो कभी बेहद खामोशी से अपनी सीट पर आकर बैठ जाती। बात-बात में साथियों से उलझ पड़ती। लंच पर अनुराधा मैडम के साथ देर तक बातें करने के बाद कुछ नॉर्मल होती। नादिरा के पास उसके आँसुओं का एक ही हल होता।
“बस सब कुछ छोड़-छाड़-कर हमारे साथ आ जाओ। बहुत हो चुका यह तमाशा।”
वह हाथ हिलाते हुए मर्दो के खिलाफ जिहाद का ऐलान कर देती। अनुराधा मैडम संजीदा हो जातीं।
“औरत इतनी आसानी से सब कुछ छोड़ नहीं सकती। उसके अंदर एक माँ होती है जो हर वक्त उसके सिर पर सवार रहती है। मर्द में एक जिद्दी बच्चा हमेशा जिंदा रहता है, जिसे काबू में करने के लिए भरपूर तवज्जो और प्यार की जरूरत होती है।”
“मगर औरत को औरत भी तो होना चाहिए।”
“औरत बनकर वह सिर्फ एक ब्रांड बन जाती है, जो सिर्फ इश्तिहारों में नजर आती है। घर बनाने के लिए औरत को बीवी भी बनना होता है और माँ भी।”
“..ताकि उम्र भर शौहर को थपकियाँ देती रहे।”
नादिरा की बात याद आते ही आज भी मेरी हँसी छूट गई। अशहर नए जमाने का पढ़ा-लिखा जिम्मेदार शख्स है। शायद उसे थपकियों की जरूरत न पड़े। मैंने खुद को तसल्ली दी।
शादी की थका देने वाली रस्मों से फारिग होकर हम दोनों वापस दिल्ली आ गए। अशहर का अपना फ्लैट था, जिसे उसके इंटीरियर डिजाइनर दोस्त ने सजाया था। बेडरूम में बेहद शोख रंग इस्तेमाल किए गए थे। मुझे अजीब-सा लगा और उसका इजहार भी कर दिया।
“अपना कमरा ऐसा हो जहाँ आते ही दिल और दिमाग दोनों ही पुरसुकून हो जाएँ और इंसान रिलैक्स महसूस करे।”
“रिलैक्स करने के लिए और भी बहुत कुछ है। अपना कमरा ऐसा होना चाहिए जहाँ जाते ही जज्बात में उबाल आ जाए और दिल शरारत से भर जाए।”
उसने एक आँख बंद करते हुए मुझे किसी शय की तरह बिस्तर पर खींचा और बेहद शोख अंदाज में अपने प्यार का इजहार करने लगा। मुझे यह उम्मीद नहीं थी। जब तक जहन किसी बात के लिए राजी ना हो, वह सिर्फ एक तकलीफ दे जाता है। मुझे भी यह वक्त किसी बोझ की तरह ही महसूस हुआ… और फिर मैं बोझ उठाने की आदी होती गई। पता नहीं अशहर की ख्वाहिश के आगे मैं बेबस थी, या फिर कभी ना कहा ही नहीं। अगर कहती तो क्या अशहर मान लेता। यह पहला सवाल था, जिसने मेरे दिमाग पर दस्तक दी। दर खुला तो सवालात का खत्म ना होनेवाला सिलसिला एक के बाद एक शुरू होता गया।
अशहर को तेज ड्राइविंग का शौक था। मैंने कहा, “रफ्तार काबू में रहे तो सफर आसान होता है।”
“जब तक एडवेंचर ना हो, जीने का क्या मजा… बदमजा रेंगती हुई जिंदगी… शायद इसीलिए रेप्टाइल्स किसी को पसंद नहीं होते।”
“तेज भागने वाले जानवर अमूमन गोलियों का शिकार होते हैं। उनको काबू में करने की कोशिश सिर्फ एक धोखा है।”
“भागने की क्या जरूरत..? उड़ जाओ। दिनों का सफर घंटों में खत्म।”
मेरी तरफ झुकते हुए उसने चुटकी बजाई और सामने से आती गाड़ी से बचने के लिए झटके से ब्रेक लगाया। मैं लुढ़ककर उसके कंधे से आ लगी।
“यह है एडवेंचर… बंदा खुद ही गले पड़ जाता है। अपने अंदर की पुरानी रूह को बाहर फेंको और नए जमाने और रफ्तार से हाथ मिलाओ।”
गाड़ी एक बार फिर ट्रैक पर आ गई। मगर हमारी जिंदगी का सफर डगमगाता रहा…। या शायद मुझे ही ऐसा महसूस होता। अशहर नए जमाने का परवरदा (पोषित) था। कामकाजी औरतों से उसे कोई परेशानी नहीं थी। मगर घर में दाखिल होते ही एक रिवायती मर्द उसके अंदर पता नहीं कहाँ से दाखिल हो जाता, जिनके लिए औरत का वजूद सिर्फ एक चाबी की गुड़िया होती है और उनके इशारों पर घूमती है।
ऑफिस में काम ज्यादा था, मुझे लौटने में देर हो गई। अमूमन मैं ऑफिस से पहले आ जाती और घर का काम निपटाकर हम साथ चाय पीते थे। मगर उस दिन मैं लेट हो गई। घर में घुसते ही अशहर ने चाय की फरमाइश की और पहला पूँट लेते ही पूछा, “आज खाने में क्या है..?”
“सब्जी बनी हुई है, बस रोटी बनानी है।”
“ऐसा करो दाल-चावल भी बना लो,” चैनल बदलते हुए बगैर किसी हिचकिचाहट के वह बोले।
मैं खामोशी से उठ गई। मशीन में कपड़े डाले, फिर किचन में आई। वहाँ से फारिग होकर कपड़े प्रेस किए। खाने का वक्त हो गया। अशहर के यहाँ दाल देसी घी में बघारी जाती थी। मैंने वही कोशिश की और शुक्र था कि उन्हें अच्छी भी लगी।
“हमारे यहाँ दाल-चावल के साथ हरे धनिए की चटनी जरूर बनती थी,” उन्हें याद आया।
“हमारे यहाँ भी बनती है, मगर वे औरतें सुबह से शाम तक ऑफिस में काम नहीं करतीं।”
“मैं तो बस एक बात बता रहा था। अब खाने की मेज पर तो खाने की ही बात होगी।”
खाना खत्म करते हुए उन्होंने जोर से कुर्सी खिसकाई।
पुरानी रूह मेरे अंदर नहीं अशहर बल्कि तुम्हारे अंदर है। आज भी जेहन में वही औरत सवार है जो पंखा झलते हुए गरम-गरम खाना परोसे… खुद बाद में खाए और मिजाज देखकर अपनी बात कहे। यह कैसे हो सकता है? मेरी आँखों में आँसू आ गए… फिर अचानक अम्मा का जुमला याद आ गया, जो उन्होंने आपा को समझाते हुए कहा था-
“कौन गलत है और कौन सही, रिश्तों में तराजू नहीं हुआ करते। एक बात याद रखना मर्दी में अना (अहं) बहुत होती है। अना उन्हें फख से जीने का रास्ता दिखाती है और उसे बरकरार रखने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। अपनी पूरी कमाई घरवालों पर खर्च कर देता है और उसके बदले में उसे सिर्फ इज्जत दरकार होती है। सवाल के बदले सवाल नहीं।”
“यही अना अगर औरत में बेदार हो जाए तो…? इज्जत से जिंदगी गुजारने की, सिर उठाकर जीने की…”
“पुराने दौर के लोग इसीलिए लड़कियों की तालीम के खिलाफ थे, पढ़-लिख जाएँगी तो सवाल करेंगी। सिर्फ सवाल ही नहीं, बल्कि बहस करने के लिए भी खड़ी हो जाएँगी।” अम्मा ने मुझे घूरते हुए कहा। आपा को अम्मा की बात समझ में आ चुकी थी और उन्होंने खामोशी से अपना सामान बाँध लिया।
आज एक बार फिर मैं उसी सवाल पर लौट आई थी। सही कहा था अम्मा ने बहस करनेवाली लड़कियों को कुबूल करने के लिए हमारा मर्दाना समाज अभी भी तैयार नहीं है। जहनी तौर पर वह आज भी खद को जीने की उसी ऊँचाई पर खड़ा पाता है, जहाँ से औरत बौनी दिखाई देती है। उसे चुमकारो या फिर अजीयत (यातना) दो… सीने से लगाओ या धिक्कार दो… यह फैसला सिर्फ उनका होता है। औरत क्या चाहती है, यह तो कभी सोचा ही नहीं गया। मैंने भी सब कुछ भला कर अशहर की ख्वाहिश को अपना लिया। ऑफिस से आकर उनकी मर्जी का खाना मेज पर लगाती। उनकी बातों पर ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाती और बेडरूम में उनकी पसंद की नाइटी पहनकर आती तो परफ्यूम स्प्रे करते हुए वह मेरे बाल बिखेर देते। हम दोनों की हँसी देर तक माहौल में गर्दिश करती (चक्कर काटती) रहती।
कितनी आसान है यह जिंदगी। अपनी ख्वाहिशों का गला घोटकर खुश रहने की अदाकारी करते जाओ।
अशहर सो गए। गहरी नींद में भी मुस्कराहट उनके होठों पर रक्स कर रही थी, मुझे अपना प्रोजेक्ट मुकम्मल करना था। मैं लैपटॉप लेकर बैठ गई। मगर ना दिमाग ने साथ दिया और ना ही उँगलियों ने। क्या दुनिया में मर्द के लिए औरत का वजूद सिर्फ माद्दी (भौतिक) और जिस्मानी तस्कीन के लिए है? उसकी अपनी ख्वाहिश और रजामंदी की कोई अहमियत नहीं? मैं नए जमाने की पढ़ी-लिखी लड़की हूँ। नौकरी करती हूँ। मैं किसी चाबी की गुड़िया की तरह कैसे रह सकती हूँ? कुछ दिन से यह सवाल मेरे अंदर कुलबुलाने लगा था। मगर अम्मा के रिवायती जुमले कानों में सरगोशी करते… घर सिर्फ औरतों की कुर्बानी से चलता है। यह छोटा-सा जुमला अम्मा के तजुर्बो का निचोड़ था, जिसमें उनका दौर पोशीदा (गुप्त) होते हुए भी अयाँ (प्रकट) था। मगर सवाल करना तो औरत की फितरत है। जुस्तजू (जिज्ञासा) उसकी खासियत है जिसकी पादाश (प्रतिकार) में उसने जन्नत की आसाइशों (विलासिता) को भी दाँव पर लगा दिया था और नेकी और बदी की पहचान करने वाले फल को खुद भी खाया था और आदम को भी खिलाया। वह अर्श से फर्श पर आई तो सिर्फ इसलिए कि वह सोचती थी। उसने सवाल उठाया और एक मुश्किल जिंदगी को अपना मुकद्दर बनाया। मगर जमीन पर आते-आते उसकी अहमियत, हैसियत और इनफिरादियत (अस्तित्व) को पामाल (कुचल) करके सिर झुकाकर जीना उसकी किस्मत में होगा, यह गुमान शायद उसे नहीं था, वरना आदम की बात मानकर जिंदगी आराम से जन्नत में गुजार रही होती।
खाने के वकफे में चारों उसी मौजू (विषय) पर बात कर रही थीं।
“वे औरतें घर की चहारदीवारी में कैद थीं। ना तालीम ना नौकरी। जबकि आज की औरत सवाल भी करेगी और बहस भी।”
“जिंदगी में कुछ मोड़ आते हैं जहाँ ऐसे सवाल सिर उठाते हैं। मगर उन मुश्किल सवालात का जवाब इतनी आसानी से कहाँ मिलता है!” अनुराधा मैडम संजीदा हो गईं।
मेरे पास है, सब छोड़-छाड़कर मेरे साथ आ जाओ, ऐश करेंगे सब मिलकर।” नादिरा के पास हर मसले का एक ही हल था।
“सब कुछ छोड़ देना किसी भी मसले का हल नहीं है। तन्हा जिंदगी गुजारना आसान नहीं होता। अकेले रहते-रहते आदमी की शख्सियत सपाट हो जाती है, मेरी तरह। बस जिए जाओ। पता ही नहीं चलता किस काम में हमारी खुशी है और कौन-सा काम हमारी जिम्मेदारी। घड़ी के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते-लगाते सुबह से शाम करते जाओ।”
हमेशा बेहद लिए-दिए रहने वाली अनुराधा मैडम का दुख पहली बार हमारे सामने आया था। औरत की जिंदगी में क्या अहम है और क्या गैर अहम… इसका यकीन भला कोई कैसे करे? मर्द औरत के लिए सब कुछ कर सकता है। धन-दौलत लुटा देता है। यहाँ तक कि किसी का कत्ल भी कर सकता है? तारीख गवाह है, दुनिया का पहला कत्ल औरत के लिए ही हुआ था। वह इतनी अहम है तो फिर उसके बाजुओं में आते ही वह उसे कमजोर साबित करने पर क्यों तुल जाता है? उसकी तज्लील (अपमान) क्यों करता है? वह टूटती है, बिखरती है मगर खामोश रहने के लिए मजबूर होती है। और मर्द इसी मजबूरी का फायदा ताउम्र उठाता रहता है। सही कहा है मैडम ने, जिंदगी से जुड़े सवालों का जवाब किताबों में नहीं मिलता। यह वह सवाल है जिनसे औरत का साबिका (सामना) रोज पडता है और अपना जवाब भी उसे खुद तलाश करना पड़ता है। आज हमारे पास सहूलत का हर सामान है…मगर जहनी तौर पर हम एक इंतेशार (उद्विग्नता) का शिकार हैं। अपने वजूद को मनवाने की जद्दोजहद में हम खुद से भी दूर होते जा रहे हैं। रोज ऐसा होता है। अशहर को खुश रखने की कोशिश एक नया सवाल लेकर आती। ऐसा ही कुछ उनकी सालगिरह के मौके पर हुआ। इतवार का दिन था। मैंने कछ दोस्तों के साथ होटल में पार्टी का इहतेमाम किया। बहत दिनों से वह नया लैपटॉप खरीदने का प्लान बना रहे थे। ऑफिस के लिए बड़ी तादाद में लैपटॉप की खरीदारी हो रही थी। मैंने भी ऑर्डर कर दिया और घर पहुँचकर अशहर को तोहफे में दिया।
“इतनी महँगी चीज तुमने अकेले खुद खरीद ली…?” उनके जुमले ने मेरी खुशी को फीका और एतमाद (विश्वास) को हिला दिया।
“अकेले नहीं… ऑफिस में खरीदारी हुई है, इसलिए इतना अच्छा, इतनी कम कीमत पर मिल गया। नया विंडो है। यह देखो ऑफिस में इसी पर काम हो रहा है।”
“तुम्हारे ऑफिस में होता होगा। मेरे लिए यह नया सॉफ्टवेयर किसी काम का नहीं,” उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था, “हफ्ते में एक दिन छटी का मिलता है। अब बाहर जाओ खाने के लिए।”
अशहर का मूड अचानक इतना खराब हो जाएगा, मुझे अंदाजा नहीं था। वह सारे रास्ते बड़बड़ाते रहे और मैं मुस्कराते हुए ‘सब ठीक है’ का सिग्नल देती रही। कई दिन ऐसे ही गुजर गए। ऑफिस में तीन दिन के ट्रेनिंग प्रोग्राम ने जहनी तौर पर मुझे मसरूफ कर दिया। सुबह जल्दी जाना होता। शाम को देर होने पर ड्राइवर हम सबको घर पहुँचा देता।
आखिरी दिन ड्राइवर मेहमानों को छोड़ने एयरपोर्ट चला गया। क्या करूँ…? अशहर को बुलाऊँ..? या अकेली ही चली जाऊँ..? मैं सोच ही रही थी कि मेहरा जी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ते नजर आए। मेरा घर उनके रास्ते में था। उन्होंने लिफ्ट दी और हम प्रोग्राम पर तब्सिरा (समीक्षा) करते हुए घर आ गए। अशहर बालकनी में खड़े थे।
“यह मेहरा जी ड्राइवर कब से हो गए हैं?” दरवाजा खोलते हुए बेहद तहकीर आमेज (तिरस्कारपूर्ण) लहजे में वह बोले।
“आज ड्राइवर मसरूफ था इसलिए मेहरा जी…”
“आज या रोज, मैंने पूछा क्या?”
अब इस फिजूल बात का मैं क्या जवाब दूं, अशहर। मेरी आँखों में आँसू आ गए। खाने के बाद अशहर अकेले ही टहलने के लिए निकल गए। नादिरा का फोन आ गया। मेरे लहजे में बसी खामोशी को उसने भाँप लिया। मेरे लिए भी छुपाना मुश्किल था।
“तुम्हें कुछ दिन का ब्रेक चाहिए।”
“मतलब…”
“तुम खुद को घसीट रही हो। अपनी अहमियत को मनवाने के लिए कभी-कभी कुछ कड़े फैसले भी लेने चाहिए। मेरे साथ आ जाओ, जिंदगी इतनी भी फिजूल नहीं।”
वह बहुत देर तक अपने दलाइल देती रही। यही ठीक है मैंने उसकी बात पर सिर हिलाया।
अशहर वापस आकर सो गए, करवट बदलते-बदलते मैं भी सो गई। रात के किसी वक्त अशहर ने मुझे जगाया, उन्हें तेज बुखार था।
“अरे, कब से…क्या हुआ?” मैं घबराकर उठी, उन्हें दवा दी और उनका सिर सहलाती रही। बुखार कम हुआ तो उन्हें नींद आ गई। सुबह उठते ही मैंने उनकी पेशानी पर हाथ रखा। बुखार नहीं था। मैं नाश्ता बनाने के लिए उठने लगी।
“तुम कहीं मत जाओ, प्लीज! मेरे पास रहो,” वह मेरा हाथ पकड़कर बोले।
“मैं कहीं नहीं जा रही हूँ, नाश्ता है तैयार करके दवा खाइए…फिर डॉक्टर के पास चलते हैं।” उन्हें उठाते हुए मैंने कहा। वह मेरी हर बात मान रहे थे। नाश्ता करते हुए हम इधर-उधर की ढेरों बातें करते रहे। आगे के प्रोग्राम बनाते रहे। अशहर अच्छा महसूस कर रहे थे।
“शाम तक देख लेते हैं,” हम दोनों का ही ख्याल था। डॉक्टर के यहाँ जाने का इरादा मुल्तवी (टालते) करते हुए हम खाना खाकर सो गए। मैं उठी तो नादिरा की कई कॉल थीं और उसका पैगाम भी- ‘तुम खुद आओगी, या मैं लेने आऊँ?’ उसके छोटे से जुमले में पता नहीं क्या था कि मेरा पूरा वजूद लड़खड़ा गया। मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई, अशहर सो रहे थे, मैं जवाब सोच रही थी कि अचानक मेरे अंदर की माँ मुझ पर हावी हो गई।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
