izzat ki roti kamao izzat ki roti khao
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Hindi Motivational Story: एक माँ अपने बच्चे को गरीबी में भी जीने के लिए मजबूर नहीं करती थी। जीने का ढंग सिखाती थी। माँ अपने बेटे को देखती है। शादी हुई, बहु लेकर घर में आया। बहु रोज़ अपने पति से कह रही है, आप घूमने के लिए बाहर नहीं जा रहे हैं। सारी जि़न्दगी आप इस झंझट में लगे रहोगे, यही तो हम लोगों के थोड़े से दिन हैं घूमने के, हम लोगों को कहीं जाना चाहिए, सैर के लिए जाना चाहिए। किसी हिल स्टेशन पर जाना चाहिए। पति समझा रहा है कि तुम नहीं जानती हमारे घर की स्थिति कैसी है। मैं छोटा था तब मेरे पिताजी मर गए थे। मेरी माँ ने कपड़े सिल-सिलकर मुझे पढ़ाया। मेरी माँ ने बहुत मेहनत की है। अब शादी हो गई है। अब तुम्हारी कोशिश होनी चाहिए कि मेरी माँ की सेवा करो। मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं है। मैं तुम्हारा तन ढक सकता हूँ पेट भर सकता हूँ। बस, इतना ही मेरे पास है। अगर हम सैर करने के लिए जाएँगे तो कर्ज़ा लेना पड़ेगा। कर्ज़ा लेकर हम कहीं घूमने जाते भी हैं तो हमारी घर गृहस्थी कर्जे़ से शुरु होगी और अगर हमारी जि़न्दगी कर्जे़ से ही शुरु हो गई तो सारी जि़न्दगी हम कर्ज़ा ही ढोते रहेंगे। अच्छा है थोड़ा खा लेंगे लेकिन ठीक रहेंगे। पत्नी फिर जि़द करती है कि मैं मायके से पैसे मंगा लेती हूँ। पति कहता है मायके से पैसे मँगवाओगी यह मेरे लिए लानत वाली बात होगी।

इधर उस बेटे की माँ, उस बहू की सास, खड़ी हुई सुन रही है जिसने कपड़े सिल-सिलकर रात दिन बेटे को पढ़ाया, लायक बनाया और उसकी शादी की और आज बहु जि़द कर रही है बाहर घूमने के लिए। उसके मन में आया, मेरे बच्चे घूमने के लिए जाना चाहते हैं, थोड़ा-सा त्याग मुझे करना पड़ेगा। उसने इशारा करके बेटे को प्यार से अपने पास बुला लिया। धीरे से कान में कहती है बेटा, बेटा! बहू जो कह रही है ठीक कह रही है, सारी जि़न्दगी तुम इसी पचड़े में रहोगे, इसी घेरे में घूमते रहोगे, घर की समस्याओं से बाहर निकल नहीं पाओगे। ये थोड़े से दिन ही तो होते हैं घूमने के। जो तुम बाहर घूमने जाओगे तो एक दूसरे को समझोगे। तुम्हें बहु को समझने का मौका भी मिल जाएगा कि हमारे घर के तौर-तरीके क्या हैं? हमारे संस्कार क्या हैं? हमारी रिश्तेदारी क्या है? हम लोग किस तरह से जीते हैं। ऐसा करो, तुम लोग घूमने चले जाओ। अब बेटा कहता है माँ जाना तो चाहता हूँ लेकिन पैसे कहाँ हैं? अब माँ अपने हाथ के कंगन निकालकर देती है। बेटा! यह मेरे पति की निशानी, तेरे पिता की निशानी है। मैंने सोचा था, किसी आड़े वक्त पर इन्हें बेच दूँगी, पर भगवान ने कोई आड़ा वक्त नहीं आने दिया। जैसे तैसे हमारी गृहस्थी चलती रही, दुःख में तो ये नहीं बिके, चलो ख़ुशी के लिए बिक जाएँ। मैं क्या करुँगी? मेरे जाने के बाद तुम्हारे ही तो काम आएँगे। तुम्हारे ही तो कंगन हैं। अगर इन्हें बेचकर तुम घूम-फिर आओगे तो कोई बुरी बात तो नहीं है। अपनी सम्पत्ति है, सम्पत्ति कहीं ना कहीं तो काम आती है। ये केवल सजाने के लिए तो हैं नहीं, इन्हें बेच देते हैं, तुम घूमने के लिए चले जाओ। माँ बड़ा त्याग करने को तैयार है और बार-बार कह रही है, बहू इधर खिड़की से कान लगाकर कोने से सुन रही है। माँ कह रही है, ‘देखो बहू अच्छे घर की है, हमारे घर की स्थिति ठीक नहीं है। आगे चलकर ठीक हो जाएगा, बेटा अभी तुम घूमने के लिए चले जाओ। अगर अभी से सुख के दिन देखेंगे, शुरुआत में सुख के दिन शुरु हो जाएँगे। भगवान चाहेंगे तो आगे भी अच्छे दिन आ जाएँगे। तू उसे कहीं घूमाने लेकर जा। बेटा किसी तरह से माँ की जि़द मानकर वह कंगन अपनी जेब में डाल लेता है। चुपचाप जाकर सो गया। लेकिन इधर पत्नी ने देखा कि उसके पति ने जेब में कुछ रखा है तो उसे बाहर निकाल लिया। सवेरे उठकर पति के आगे हाथ जोड़कर कहा कि हमें कहीं घूमने की, आवाराग़र्दी करने की और फिज़ूलख़र्ची करने की जरुरत नहीं है। हमारा घूमना-फिरना और हमारा हिल स्टेशन तो हमारा घर है। हम फिज़ूलख़र्ची क्यों करें और बाहर जाने की क्या ज़रुरत है? जहाँ ऐसी माँ हो और ऐसे मेरे पति हों तो मेरा यह छोटा सा घर सही, एक-डेढ़ कमरे का घर सही, पर स्वर्ग का टूकड़ा है। मुझे और क्या चाहिए। परिणाम देखिए, एक दिन वह आया कि माता के घुटने में दर्द रहता है और बहू बैठ कर घुटने दबाती है।

एक दिन पत्नी पति से कहती है कि माँ से चला नहीं जाता, सासू माँ काफी वृद्ध हो गई हैं। पता नहीं कब जि़न्दगी की साँझ हो जाए, पता नहीं कब ये प्राण निकल जाएँ, उनकी तीर्थयात्रा करने की इच्छा है। आप माँ जी को लेकर चले जाओ। एक बार तीर्थयात्रा करा लाओ। तीर्थयात्रा पर जाएँगी तो इनके मन को तसल्ली हो जाएगी, सारी जि़न्दगी हमारे लिए अपना शरीर गलाती रहीं। अब हम लोगों का भी तो फर्ज़ है, कुछ हम करें। पति कहने लगे, मैं चाहता तो हूँ लेकिर मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि माँ को लेकर जा सकूँ और अगर ले जाना चाहूँगा तो आराम से ले जाना चाहूँगा। धक्के खाते हुए हम यहाँ से जाएँ वह भी ठीक नहीं लगता। अब बहू ने वही काम किया जो माँ ने किया था। उसने भी अपने कंगन उतारे। कंगन उतार कर अपने पति के हाथ में देते हुए बोली की यह सम्पत्ति कब काम आएगी? आपने कंगन पहनाए और इन कंगनों का अगर प्रयोग कर माँ को तीर्थ यात्रा करा देते हैं, माँ की भी कामना पूरी हो जाएगी और किस्मत वाले होंगे हम लोग कि हमारी सम्पत्ति धर्म के काम आई। इधर सास बाहर बैठी छोटे से पोते को खिला रही है। उसने जैसे ही सुना, ये दोनों अन्दर क्या बातें कर रहे हैं, तो आवाज़ देकर दोनों को डाँटते हुए बाहर बुलाती है। बुलाकर कहती है कि तुम कहते हो मैं जाकर कहीं पहाड़ पर भगवान के दर्शन करुँ। अरे मेरे कृष्ण भगवान तो यह बैठे हैं ना मेरी गोद में, मेरे लिए इससे बड़ा कृष्ण कौन होगा। मेरे भगवान मेरे गोद में बैठे हैं। मैं तो इसका पूजा यहीं कर लूँगी। मेरा तीर्थ मेरा घर है, बेटा! मैं बाहर जाकर क्या करुँगी?

आप सोचिए, उनके पास क्या होगा, क्या दौलत होगी। त्याग की दौलत होगी। करोड़ों कमाने वाले व्यक्ति के घर में भी इतना प्यार नहीं हो सकता, इतना सामंजस्य नहीं हो सकता। जीने का अन्दाज जिस व्यक्ति के पास है, वह व्यक्ति दुनिया का सबसे बड़ा अमीर आदमी है। लेकिन आज जिस तरह से पैसे को लेकर प्रचार किया गया है कि पैसा ही सब कुछ है। उसका परिणाम देखिए कि चारों तरफ पाप भरा पड़ा है। जैसे जैसे हम लोगों ने नियन्त्रण करना शुरु कर दिया, धर्म को अपनाना शुरु कर दिया, भक्ति अपनानी शुरु कर दी, अपने मन को ठीक करना शुरु कर दिया, हमारे जीवन की धारा बदल जाएगी। जीवन प्रसन्नता और आनंद से भर जाएगा।

ये कहानी ‘नए दौर की प्रेरक कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंNaye Dore ki Prerak Kahaniyan(नए दौर की प्रेरक कहानियाँ)