भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
पूरे घर में हंगामा-सा बरपा था और गुम हुई चवन्नी की ढुँढ़ाई हो रही थी। आज से कोई पचास बरस पहले का यह किस्सा है। तब का जमाना कुछ और था। तब चवन्नी के भी मायने थे और पूरी एक चवन्नी गुम हो जाना तो बड़ी बात थी, जिसकी ढुँढ़ाई होना जरूरी था। नहीं तो मन में खुद-बुद मची रहती और दिमाग कभी यहाँ, कभी वहाँ भागता।
तो ढुँढ़ाई हो रही थी और पूरा घर उसमें लगा था। सब के चेहरे पर एक ही सवाल, “कहाँ गई चवन्नी…? चवन्नी आखिर जा कहाँ सकती है? चवन्नी के पैर तो नहीं होते, जो वह खुद-ब-खुद कहीं घूमने चली जाए! या कि वह हमारे घर से चले और सीधे हलवाई की दुकान पर पहुँच जाए, या फिर किराने वाले की दुकान पर, या…या फिर…?”
इस घर में पहले कभी ऐसी बात नहीं हुई थी। नुकसान तो हो जाते थे, पर चीज कभी कोई गायब नहीं हुई थी। एक निक्का पैसा भी नहीं।
आखिर हम पाँच भाई-बहन ही तो थे। बहन मैं अकेली और भाई चार। सभी मुझसे छोटे। और हम सभी पढ़ने में ऐसे डूबे रहते कि बाकी सारी चीजें फिजूल लगतीं। हमें बस अपने इम्तिहान नजर आते और किताब-कापियाँ। माँ-बाप बड़ी मुश्किल से हमें पढ़ा रहे थे। इसलिए हम अच्छे नंबर लाकर उनका दिल खुश करने की फिराक में रहते। तो भला चवन्नी का हम करते भी क्या?
मगर फिर चवन्नी गई तो कहाँ गई?
पिताजी ने तीसरी बार पूछा था, “सच-सच बताओ, तुममें से तो किसी ने नहीं ली चवन्नी?”
और सारे भाई-बहनों का एक ही जवाब, “नहीं पिताजी, नहीं… नहीं…!”
तब मैं शायद नौवीं या दसवीं कक्षा में होऊँगी और मेरा सबसे छोटा भाई संजू दूसरी कक्षा में था। स्कूल हम दोनों का एक ही था।
आधी छुट्टी में मैं रोज उसकी क्लास में जाकर देख लेती कि उसने खाना खाया है या नहीं? उसकी अध्यापिका जानकी मैडम बड़ी सुंदर और कर्मठ थीं। खूब मेहनत कराती थीं बच्चों को। मैं जब कभी संजू की पढ़ाई के बारे में पूछती तो वे हमेशा तारीफ करतीं। एक खुशनुमा मुस्कराहट के साथ कहतीं, “सुधा, यह तो बहुत होशियार बच्चा है।”
सुनकर मुझे बड़ा गर्व महसूस होता। मन ही मन कहती, “क्यों न होगा होशियार? आखिर तो वह मेरा भाई है।”
हमारा घर मध्यवर्गीय घर था। जैसे-तैसे एक महीना खींच-खाँचकर निकला तो दूसरा हाजिर। खर्चे, खर्चे और खर्चे। पाँच-पाँच भाई-बहन हम पढ़ रहे थे। कमाने वाले एक पिता। सरकारी नौकरी थी और पिता ईमानदार ऐसे कि उनकी ईमानदारी की मिसाल दी जाती थी। उस समय तनख्वाह मामूली थी। उस मामूली तनख्वाह में पाँच बच्चों वाले घर की गाड़ी आगे खींच ले जाना खुद में कोई मामूली कमाल नहीं था।
ऐसे में जेबखर्च का तो हम सोच भी नहीं सकते थे। यानी घर में ‘जेबखर्च’ जैसी परंपरा शुरू से ही नदारद थी। कभी किसी बहन-भाई को जेबखर्च नहीं मिलता था और न कभी हमारी माँगने की आदत थी। हाँ, इतवार के दिन घर में हमेशा कुछ न कुछ स्पेशल जरूर बनता था। उसके बाद कुछ इधर-उधर का खाने की इच्छा होती ही नहीं थी। जेबखर्च में मिले पैसों से बाजार की चाट-पकौड़ी खाकर गला खराब कर लेने से यह कहीं अच्छा था कि घर में बनी चीजें खाएँ। यही हम सबको पसंद भी था।
तो बात जेबखर्च की चल रही थी। किसी भी बहन-भाई को अलग से पैसे की जरूरत ही नहीं थी इसलिए हममें से कोई घर में पड़े पैसों को हाथ नहीं लगाता था। पैसे घर में बने एक छोटे से आले में रखे रहते थे। या पर्स में हों, तो वह भी वहीं रखे रहते थे। उसे कभी कोई छेड़ता नहीं था। हाँ, कोई चीज मँगवानी होती तो माँ खुद पैसे निकालकर देती थीं। या कभी-कभी कह देती थीं, “जाओ सुधा, पर्स में से छ: आने लेकर चली जाओ। झटपट चायपत्ती या चीनी ले आओ।”
घर में एक विश्वास भरा माहौल था। हममें से किसी ने इसे कभी तोड़ा नहीं। जब माँ-बाप बच्चों पर यकीन करते हैं तो बच्चों पर भी कुछ असर तो पड़ता ही है। हम भाई-बहन कम उम्र में ही काफी समझदार हो गए थे और माँ-बाप की मजबूरियाँ समझने लगे थे। सोचते थे, “माँ-बाप पर वैसे ही चिंताओं का इतना बोझ है। हमें उसे और बढ़ाना तो नहीं चाहिए।”
पर एक बार चक्कर पड़ गया। ऐसा चक्कर कि हम बहन-भाइयों की हालत खराब हो गई। घटना छोटी-सी थी, पर कुछ ऐसी कि हम सब भाई-बहन हक्के-बक्के थे, माँ उदास और पिताजी आगबबूला।
हुआ यह कि एक बार पिताजी को अचानक खुले पैसों की जरूरत पड़ी। पर जब उन्होंने आले में रखे पैसे देखे तो वे कम थे। घर में गिने पिताजी उधेड़बुन में थे। पर फिर सोचा, “घर में किसी की फिजूलखर्ची की तो आदत है नहीं। हो सकता है, घर में कोई जरूरी चीज आई हो और इस समय किसी को याद न आ रहा हो। शायद बाद में याद आ जाए।” उन्होंने जैसे-तैसे खुद को समझाया और बात को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
माँ इतनी हिसाब-किताब की पक्की नहीं थीं। सोच रही थीं, शायद पिता से ही भूल हुई है। चार को पाँच चवन्नियाँ समझ गए। अच्छा है कि उन्होंने अपनी भूल सुधार ली। और पिता सोच रहे थे, अभी इन्हें याद नहीं आ रहा कि एक चवन्नी कहाँ खर्च हुई है। याद आएगा तो खुद-ब-खुद बता देंगी और यों हिसाब मिल जाएगा।
घर बँधे-बँधाए बजट की जिन पटरियों पर चल रहा था, उसमें हिसाब मिलना जरूरी था। वरना मन में खुद-बुद, खुद-बुद चलती रहती।
खैर, इसी द्वंद्व और संदेह में वह दिन निकला। पर अगले दिन तो मामला और बढ़ गया। पहले से सवाया-ड्योढ़ा…! तो हंगामा होना ही था।
देखते ही देखते हमारा घर नाटक की चपेट में आ गया। वह भी सुबह-सुबह।…हुआ यह कि अगले दिन सुबह पिताजी ने फिर आले से पर्स उठाया, बगल की रामधन पंसारी की दुकान से कोई सामान लाने के लिए। पैसे गिने तो चकरा गए। अरे, आज फिर एक अठन्नी गायब। यह क्या? ऐसा तो इस घर में कभी नहीं हुआ।
तो क्या बच्चे बिगड़ने लगे हैं? उन्हें पता ही नहीं चला और उनके बच्चों में से कोई…! सोच-सोचकर पिताजी का दिमाग खराब हो रहा था।
इसका मतलब कल भी कोई भूल नहीं थी। कल चवन्नी गायब हुई थी और आज अठन्नी…! यह तो गंभीर मामला है।
कौन गायब कर रहा है पैसे…और इन पैसों को खर्च कहाँ किया जा रहा है? पिताजी का माथा ठनका। तो यानी, इन बच्चों में से कोई बिगड़ गया है और बुरे रास्ते पर चल निकला है।
अब तो पिताजी का शक यकीन में बदल गया। सोचने लगे, ‘जरूर इन पाँचों में से कोई है जिसने चोरी की है। पर वह है कौन, यह कैसे पता चले?
उन्होंने एक-एक कर हम पाँचों बहन-भाइयों के बारे में सोचा, ‘यह किस का काम हो सकता है, किस का…? किस के पैर गलत रास्ते पर चल पड़े हैं?’
माँ को भी हैरानी हुई। वे कल की तरह नहीं कह पाई कि आपने चवन्नी यहाँ नहीं, कहीं और रख दी होगी। पिताजी को साफ लग रहा था कि घर में किसी न किसी को चोरी की आदत पड़ गई है और वही रोज यहाँ से पैसे चुराता है। अब तो पानी सिर से ऊपर निकल गया।
हम पाँचों बहन-भाई एक-दूसरे की आँखों में उस चोर को ढूँढ़ने लगे। मैं सोच रही थी, “मुझसे छोटा भाई जित्तन तो यह काम करेगा नहीं। वह काफी समझदार है। उससे छोटा बिंदा हो सकता है, नहीं भी। उससे छोटे आशु और संजू तो अभी बहुत छोटे हैं।”
इतने में पिताजी ने गुस्से में पास रखा डंडा उठाया और हम पाँचों को लाइन में खड़ा कर दिया। एक-एक से पुलिसिया अंदाज में पूछने के लिए। मैं सबसे बड़ी थी, चारों भाई छोटे थे। लिहाजा, सबसे पहला नंबर मेरा था। पिताजी ने कहा, “सुधा, हाथ आगे कर, बता तूने पैसे उठाए कि नहीं?” इतने में तड़ाक हथेली पर डंडा! मैं तिलमिला गई, पर शांत ढंग से बोली कि नहीं पिताजी, मैंने नहीं उठाए।
मुझे रोना आ गया। मैं पिता की सबसे अधिक लाड़ली। ‘सुधा हमारी सबसे लायक है,’ कहकर दिन भर वे मेरा गुणगान करते रहते थे। पर आज वे जिस मिशन पर थे, उसमें लाड़ पीछे छूट गया और वे बगैर वर्दी के दरोगा लग रहे थे, जिसे आज चोर की खोज करनी ही थी।
फिर मेरे बाद एक-एक कर ऐसे ही सब भाइयों को डंडे की मार पड़ी। पर मुझसे छोटे तीन भाइयों जित्तन, बिंदा और आशु ने एकदम साफ-साफ कहा कि उन्होंने पैसे नहीं चुराए हैं। हालाँकि पिताजी का क्रोध खुद उनके काबू में नहीं रहा था, इसलिए दो-दो डंडे तो उन्हें भी पड़ चुके थे।
हम सभी आतंकित थे। डरे और घबराए हुए। इसलिए कि हम लोगों ने हमेशा एक विश्वास भरा माहौल देखा था। एक-दूसरे पर भरोसा करने वाला। ऐसा विचित्र नाटक हम लोगों ने कभी नहीं देखा था, जैसा इस समय हमारी आँखों के सामने था। हम सभी के लिए यह कल्पना से परे की चीज थी।
अंत में सबसे छोटे संजू की बारी आई तो डर के मारे उसने डंडा खाने से पहले ही उगल दिया कि उसने पैसे उठाए हैं!
सुनकर सब अवाक!…संजू चोर? हम सबका प्यारा, छोटा भाई संजू, जो हर वक्त पढ़ाई-लिखाई में डूबा रहता था और छोटा होकर भी बड़ा गंभीर था। इस संजू को भला चोरी की क्या जरूरत पड़ गई?
खैर, अब चोर तो पकड़ में आ गया। लेकिन यह पता लगाना जरूरी था कि हममें से सबसे छोटे भाई को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि उसे घर से पैसे चोरी करने पड़े। पिताजी ने पहले धमकाकर पूछा, कान खींचते हुए, “बता, क्यों उठाए पैसे? किसको दिए? क्या किया उनका?”
पर संजू चुप, एकदम चुप। हम सब यही सोच रहे थे कि घर में किताबों-कापियों की तो कोई कमी नहीं है। खाने-पीने को भी पर्याप्त मिल जाता है। फिर ऐसी क्या जरूरत पड़ गई इसे पैसे चुराने की? पर संजू एकदम चुप था। कुछ नहीं बोला। आखिर पिताजी ने डाँटकर कहा, “अगर तूने दो मिनट में नहीं बताया तो फिर पिटाई के लिए तैयार हो जा!”
कहकर पिताजी ने पास पड़ा डंडा उठाया ही था कि संजू डर के मारे पलंग के नीचे घुस गया। कातर स्वर में बोला, “नहीं, पिताजी, मत मारो… मत मारो!”
“तो फिर बता, तूने क्या किया उन पैसों का…!” पिताजी सख्त स्वर में पूछ रहे थे।
“मैंने जग्गू को पैसे दिए हैं।” आखिर संजू ने बता ही दिया।
हम सब हैरान। जग्गू…? यह नाटक में कौन-सा नया पात्र शामिल हो गया? पिताजी भी अचंभे में थे। पर इस जग्गू की कैफियत पता करना जरूरी था।
“क्यों? जग्गू को क्यों दिए?” पिताजी ने अब थोड़ा शांत होकर पूछा।
“उसने मुझे डोबा दिया था।” संजू ने सहमते हुए कहा।
“डोबा…?” पिताजी चकराए। हम सब भी, “डोबा…! कैसा डोबा?”
वह तख्ती पर लिखने वाला जमाना था। तब काली स्याही से लिखा जाता था और दूसरे की दवात से स्याही की एक बूँद लेना ‘डोबा’ लेना कहलाता था।
“मेरी स्याही खत्म हो गई थी इसलिए डोबा लिया था उससे।” संजू ने बात और स्पष्ट की।
“फिर…?”
“उसने कहा, तूने आज डोबा लिया है तो कल एक चवन्नी मुझे लाकर देना, नहीं तो बहुत मारूँगा। इसलिए मैं ले गया था।”
पता चला, वह लड़का जग्गू बड़ा धाँसू किस्म का है। खुद संजू को स्याही देता और फिर उसके बदले में पैसे भी माँग लेता है। हम सब हैरान, ऐसा भी होता है कहीं!
“तू कितने दिन ले गया चवन्नी?” पिताजी ने पूछा।
“तीन दिन।” संजू ने डरते-डरते बताया।
“क्यों…?” पिताजी ने गंभीर होकर पूछा।
“क्योंकि वह रोज ज़बरदस्ती मुझे डोबा लेने पर मजबूर करता था।”
“तूने घर पर क्यों नहीं बताया?” पिताजी का स्वर अब बदला हुआ था। गहरी सहानुभूति से भरा।
“उसने बताने से मना किया था।” कहते हुए संजू की शक्ल देखने वाली थी। वह पीले पत्ते की तरह काँप रहा था और लग रहा था, अभी गिर पड़ेगा। पिताजी ने झट संजू को छाती से लगा लिया। बोले, “अगर तू पहले ही दिन बता देता तो यह नौबत न आती।…कल ही मैं तेरे स्कूल जाकर प्रिंसिपल से शिकायत करता हूँ।”
इतने में ही मुझसे छोटा वाला जित्तन बोल उठा, “पिताजी, आपको स्कूल जाने की जरूरत नहीं है। उसे तो मैं ही सीधा कर दूँगा।”
अगले दिन सोमवार था। हम सब स्कूल गए। आज फिर जग्गू ने संजू को डोबा लेने को मजबूर किया और बदले में घर से चवन्नी लाने के लिए कहा। संजू ने चुपचाप डोबा ले लिया। आधी छुट्टी के समय जित्तन जो कि उसी स्कूल में सातवीं कक्षा में था, संजू की कक्षा में गया। पूछा, “जग्गू कहाँ है?” संजू ने इशारे से बताया कि जो लड़का नल पर पानी पी रहा है, वही जग्गू है।
जित्तन वहाँ पहुँचा और जाते ही दोनों बाँहें पकड़कर उसे इस तरह झिंझोड़ दिया कि उसको नानी याद आ गई। जग्गू की सारी अकड़ अब हवा हो चुकी थी।
जित्तन ने फिर सख़्त लहजे में कहा, “कितने डोबे दिए थे?”
जग्गू चुप।
“कितनी चवन्नियाँ ली हैं तूने?”
“सात।”
“अब और भी लेगा न!” कहकर जित्तन ने आँखें तरेरीं, तो जग्गू गिड़गिड़ाकर माफी माँगने लगा कि आगे से ऐसा नहीं करूँगा।
जित्तन ने उसे धमकाते हुए कहा, “आगे से कभी संजू को कुछ कहा, तो फिर देखियो। मैं सीधा प्रिंसिपल साहब से शिकायत करूँगा। हो सकता है, तेरी इस स्कूल से ही छुट्टी हो जाए।…फिर दूसरों से भीख माँग-माँगकर चवन्नियाँ ही इकट्ठी करते रहना जिंदगी भर।”
“नहीं, नहीं, मैं…मैं कुछ नहीं कहूँगा!” जग्गू लगातार गिड़गिड़ा रहा था। उसका साथ देने वाले दो-तीन दोस्त भी डरे हुए थे और उनके पैर काँप रहे थे। लेकिन बाकी बच्चों के चेहरे पर परम संतुष्टि का भाव था। कारण यह था कि जग्गू से हर कोई आतंकित रहता था, पर उसे कोई कुछ कह नहीं सकता था। आज मानो उन सभी को बड़ी राहत मिल गई।
इसके बाद जग्गू पहले वाला जग्गू नहीं रहा। अब वह पहले की तरह गरदन अकड़ाकर नहीं, बल्कि जमीन की ओर देखता हुआ चलता था। फिर कभी उसने संजू या क्लास के किसी दूसरे बच्चे को तंग नहीं किया। दादागीरी छोड़कर अब वह पढ़ाई-लिखाई में मन लगाने की कोशिश कर रहा था।
क्लास के और बच्चों के साथ-साथ संजू के चेहरे पर भी अब खुशियों भरी रौनक थी। बल्कि सभी संजू को धन्यवाद दे रहे थे, जिसके कारण सबके सिर से जग्गू के डर का भूत गायब हो गया था। यहाँ तक कि खुद जग्गू भी बदल गया था।
और हमारा घर भी तो खरामा-खरामा, भरोसे और विश्वास की उसी पटरी पर चल पड़ा था, जिसे मैं शुरू से देखती आई थी।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
