उस दिन कपड़े खरीदने के उद्देश्य से एक दुकान में बैठा था। अभी दुकानदार ने कुछ ही कपड़े दिखाए होंगे कि दुकान के सामने आठ-दस भिखारियों की एक टोली आकर खडी हो गई। दुकानदार झुंझलाता-सा काउंटर तक गया और पाँच पैसे का एक-एक सिक्का सबको दे डाला। टोली आगे बढ चली। अभी वह मुझ तक वापस आने के लिए मुड़ा ही था कि झुकी कमर वाली एक बुढ़िया जिसकी देह पर फटी साड़ी का पर्दा था, लाठी टेके आ धमकी- “भला हो बाबू तेरा…। बीच में ही मुझे आते देख वह बुढ़िया को झाड़ने लगा- “सुबह से क्या तुम्हारे लिए ही दुकान खोल रखी है…।” फिर गुस्से में नाक-भौं सिकोड़कर जेब से रेजगारी निकालने लगा। मैं बैठा चुपचाप बुढ़िया को देख रहा था। वह दुकानदार को घूर-सी रही थी। “चवन्नी खुल्ली है?” दुकानदार ने झल्लाते हुए पूछा। बुढ़िया ने उत्तर में अपने पास का खाली पात्र दिखा दिया तो ना चाहते चवन्नी उसके पात्र में डाल दी। बुढ़िया आगे बढ़ चली।
सामने से एक कृशकाय हुए भी दुकानदार ने कोढ़ी कमर के नीचे तक फटा हुआ अँगोछा लपेटे हुए गुजर रहा था। बुढ़िया एकटक उसे देखने लगी, फिर एकाएक उसने काँपती और निरीह आवाज से उसे पुकारा…। दूसरे ही पल मैंने देखा बुढ़िया ने वही चवन्नी का सिक्का अपने पात्र से निकालकर उसके पात्र में डाल दिया। और अपनी झुकी कमर को सीधा करते हुए आगे बढ़ चली, दस-बीस पैसों की आशा सँजोए! मेरी आँखे उस जाती हुई बुढ़िया को एक भिखारिन के रूप में देख रही थी, परंतु हृदय की आँखे इसे मानने को तैयार नहीं थीं। ऐसा लग रहा था कि ‘स्वार्थ’ के इस संसार में यह कोई सपना हो। उसने एक चवन्नी से मानो समस्त मानव जाति को नंगा कर दिया था। मेरी जागती आँखे उसे तब तक देखती रहीं जब तक वह आँखो से ओझल न हो गई। सोच रहा था- उसे क्या कहूँ? दानी! भरे पेट दान किया जाता है मगर यह तो एक वंचित द्वारा दिया गया दान था, दूसरे वंचित को!
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
