भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
कमरे में टपटप की आवाज। सरगोशी, खामोशी, कैमरों के फ्लैश और सिसकियां भरी हैं। जिनके घर बेटियां है, उनके घरों की दिवारों से बेवजह की बूंदे टपक रही हैं। सांसों में घुटन और आंखों से धुंआ बार बार गर्मा-गर्म बूंदों की शक्ल में रिस रहा है। बाबूजी का हाथ बार-बार छाती पर जाकर दिल को बाहर निकलने से रोकने का यत्न कर रहा है। मां, थी तो पागल, बेहाल, निढाल, जिन्दा लाश बनी हुई, अपनी लाडली के साथ सो रही थी। उसकी आंखें बन्द हैं शरीर ही नहीं, उसकी आत्मा पर भी कई चोटे हैं। जुबान बन्द है, पर कान चेतन्य हैं। वो सुन सकती है, महसूस कर सकती है पर चीख नहीं सकती। पहले ही चिल्ला-चिल्ला कर उसका गला बैठ गया है- बहु की बूंदे उसकी नसों में से बही आंखों में से बह रही थी।
निकुन्ज के मृत शरीर में एक ध्वनि ने हलचल पैदा कर दी। ममता भरी स्पर्श, जीवन को वापस लौट आने की प्रार्थना कर रहा है। खामोशी बोल रही है, “निकुन्ज उठ मेरी रानी, आज तूने ऑफिस नहीं जाना?”
हूं। अन्धेरे उसके करु की काली दिवारों से टकरा कर उसके मन से जवाब दिया, “नहीं मां, मैंने कहीं नहीं जाना, कहीं भी नहीं। तू बस मुझे अपनी चादर में, अपने आंचल में कहीं छुपा ले, कि मुझे कोई देख ना सके, छू ना सके। यह देख, मैं कितनी मैली हो गई हूँ- जितना भी रगड़-रगड़ के धोऊ, मैं इसे पहले की तरह उज्जवल नहीं कर सकती। टूट-फूट गया है मेरा अंग-अंग, सब बिखर गया है, मां और कुछ भी सम्भालना बड़ा मुश्किल हो गया है।”
“न मेरी बच्ची ना, मैं हूँ ना तेरे साथ, तेरे पास।”
मां के हृदय ने हृदय को सहारा देते हुए कहा। दूर पीछे से फिर एक हूक निकली, “कहां से शुरु करने को सिर से लेकर पैर तक कीचड़ ही कीचड़ भरा है। तेरी निकुन्ज से सड़ी हुई दुर्गन्ध उठ रही है, यह देख, गल गया है मेरा जिस्म, यहां से भी।”
आंखे बन्द है, पर पीढा काकपन हर हक अंग को छूकर हवा के हल्के से झोंके के साथ पलकों के ऊपर आकर बैठ गया है। माथे पर बनती, बिगडती लकीरें हाथों की लकीरों को मात दे रही है। रगो में खन नहीं दर्द बह रहा है।
छोटे शहर में रहने वाली निकुन्ज ने बहुत बड़े-बड़े सपने देखे थे। बाबू जी ने भी पूरी लगन और मेहनत के साथ उसे भी उसके भाई की तरह ही पढ़ाया-लिखाया और इस योग्य बनाया कि वह अपने फैसले खुद ले सके। मां ने एक दिन वैसे ही बातों-बातों में उसे तोड़ने की कोशिश, को भी, “देख, मैं चाहती हूँ, तू भी मेरी तरह एक टीचर बने। क्या बुराई हैं इस प्रोफेशन में। तुझे पता है तेरे हाथों की लकीरों में भी साफ-साफ लिखा है कि तुम एक अच्छी प्रवक्ता, लेखक प्रोफेसर, कुछ भी बन सकती हो- सच, देख यह देख मस्तिष्क रेखा” “अच्छा लम्बी मस्तिष्क रेखा का यह अर्थ कब हुआ कि मैं सिर्फ टीचर या प्रोफेसर ही बन सकती हूं। मैं, तो बनाना चाहती हूँ- एक पत्रकार Journalist जानती हो ना Journalist क्या होता है आजाद, आसमान में उड़ने वाला, बेबाक जिसका हर दिन रोमांच भरा, नया ताजा होता है। नये लोग, नई दुनिया, नये विचार, हाय कितना मजा है-” कहते-कहते उसकी आंखें चमक से भर गई थीं और उसने मां के गले में बाहों हार की तरह पिरो ली थी। ‘निकुन्ज’ को अपना नाम- “निकुन्ज को अपना नाम- निकुन्ज बहुत आधा लगता था। कितना कोमल, संगीत भरा और सार्थक। उसे लगता था, उसका जीवन हमेशा रंग-बिरंगे फूलों से लदी बेलों की तरह हरा-भरा ही रहेगा, सुगंध से भरा। यह भी हो सकता था, ऊपर वाले ने उसे धड़ते हुए कोई कसर भी तो नहीं छोड़ी थी। यही नहीं मदद और सराहना भी करते थे यही नहीं लड़ते भी तो थे निज्जा यह किसी रंगीन, सुन्दर, सपनों से भरी दुनिया थी; और वो; कल वाली : अन्धेरी भयंकर दुनिया; इसी धरती पर बसे हुए डरावने चेहरों वाली काली दुनिया। नयी नवेली आशाओं भरे उगते ही सूरज को काला ग्रहण लगाने वाले लोगों की दुनिया वह, छटपटाई, मन से एक गहरी टीस उठी “वो नये लोला भी चार ही थे मां। मैं बहुत चिल्लाई, रोई और गिड़गिड़ाई भी थी और पता है उनमें से एक के पैर भी पकड़े थे। उसे कहा था, तू मेरे भाई जैसा है, उसके जितना पर वो कोई भी नहीं माना। मेरे जिस्म पर एक गिद्ध की तरह झपट रहे थे और मेरे मांस को नोच-नोच कर खा रहे थे। मैं कराह रही थी, उन्हें रोमांच हो रहा था, मैं दर्द और पीड़ा से चिल्ला रही थी वो वहशीपन में आन्नद ले रहे थे। मैं बहुत रोई, बड़ी छटपटाई थी मां। एकालिलामा जैहर मेरे रोम-रोम में समा गया है- इसका शोधन कैसे करूं, मां-मां- कुछ तो बोलो, कुछ तो-जीना चाहती हूं- मां मैं जीना चाहती हूं। मां बेबस, आंखें खाली है। कुछ ढूंढने की कुछ समझने की कोशिश कर रही हैं, पर कोई भी सिरा हाथों में नहीं आ रहा है। यहां दो आंसू, आंखों की कोरों को आकर टपकने को बेकरार हैं कि कोई उन्हें लपक कर अपनी मुट्ठी में बन्द कर ले। मां आगे बढ़ी, मन किया, दर्द की भट्ठी में जलती अपनी बेटी को जोर से गले से लगा ले, और अपनी छाती के दूध की फुहार से उसके अन्दर-बाहर की अग्नि को शांत कर दे, पर कैसे?
आज उसकी लाडली, निढाल, बेबस, आंखें बन्द करके, मृत्युलोक की सीढ़ियां गिन रही है, कभी उतरती और कभी चढ़ती। डाक्टर इलाज कर रहे हैं। पर उनकी आंखों में नाउम्मीदी की झलक अधिक है। सभी की आंखें पथराई है गीली-गीली। अनमना आस है और ना ही आंसू है। मौन की भाषा ही सभी समझ रहे हैं। समाज बोल रहा है-सब सुन रहे हैं गूंगे की भाषा का अर्थ ढूंढ रहे है। बुद्धिजीवी टीवी चैनलों में बैठ कर जिस्म को परत-दर परत और उघाड़ रहे हैं। अखबारों में चटखारे ले-लेकर छप रहा है उसका दर्द और वह तिलतिल कर मर रही है।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
