samarpan mein hee sukh
samarpan mein hee sukh

राम के चरणों में समर्पित नहीं होगा कि मंदिरों में समर्पण का भाव उन कुछ भावों में शामिल है जो आदमी को सफलता ही नहीं दिलाते बल्कि उसके जीवन को संपूर्णता प्रदान करते हैं। समर्पण करने को कई लोग छोटापन मान लेते हैं। यह ठीक नहीं है। दरअसल समर्पण में एक विराट तत्व शामिल होता है।

भक्त का भगवान के लिए हनुमान जैसा समर्पण होना चाहिए। हनुमान ने अपने आपको कर दिया था। शायद लोगों को इस बात का पता हनुमान की मूर्ति पूरी की पूरी सिन्दूरमयी क्यों होती है? एक दिन की बात है। सीता मैया श्रृंगार कर रही थीं। हनुमान ने देखा कि सीता मैया श्रृंगार कर अपने माथे पर माँग के अन्दर लाल-लाल कुछ लगा रही हैं। उन्होंने पूछा-मैया! आप लाल-लाल क्या लगा रही हो? सीता ने कहा-हनुमान! राम को हरदम के लिए अपना बनाने के लिए मैं माथे पर सिन्दूर लगा रही हूँ।

हनुमान ने सुना और अपने पूरे शरीर पर सिन्दूर लगाकर सीधे रामजी के सामने जाकर खड़े हो गए। राम हनुमान को पूरी तरह सिन्दूर से रंगा देखकर पहले तो हंसे, फिर बोले तुमने यह क्या कर रखा है? हनुमान बोले-भगवान, मैंने विचार किया कि जब माँ सीता थोड़ा-सा सिन्दूर लगाती हैं तो आप उनके हो जाते हैं, तो मैंने पूरे शरीर पर सिन्दूर लगा लिया है ताकि आप मेरे भी हो जाएं। मेरे बन जाएं। जब इस प्रकार का समर्पण आता है, तब जाकर परमात्मा हमारा हो पाता है। जो परमात्मा के रंग में नख से शिख तक रंगने को तैयार हो जाता है, वह कभी कोई हनुमान ही हो पाता है। ऐसा कोई भक्त मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को प्राप्त कर पाता है।

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)