एक हलवाई था। एक बार उसे कुछ दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा।। वह अपनी दुकान अपने एक दूर के रिश्तेदार को सुपुर्द करके चला गया। जब वह लौटकर आया तो उसने देखा कि उसका रिश्तेदार, नौकर और वहाँ गश्त लगा रहा एक सिपाही बड़े मजे से उसकी मिठाइयां खा रहे थे। दिक्कत यह थी कि वह तीनों में से किसी को भी मिठाई खाने से मना नहीं कर सकता था।
उसने नौकर को किसी काम से भेजा और अपने रिश्तेदार व सिपाही से कहा कि तुममें से एक मेरा रिश्तेदार है, दूसरा रक्षक, तुम दोनों का तो हक बनता है कि मिठाई खाओ, लेकिन नौकर को उसके काम का पूरा वेतन मिलता है। तुम्हें उसे मिठाई खाने में शरीक नहीं करना चाहिए। बात दोनों की समझ में आ गई और जब नौकर वापस लौटा तो उन्होंने उसे डंडे मार-मारकर वहाँ से भगा दिया।
कुछ देर बाद हलवाई ने अपने रिश्तेदार को बुलाया और उससे कहा कि तू तो घर का आदमी है, जितना चाहे मिठाई खा। लेकिन, इस मुफ्तखोर सिपाही को मिठाईयां खिलाने की क्या जरूरत है। अगले दिन जब सिपाही मिठाई खाने आया तो रिश्तेदार ने उसे भगा दिया। सिपाही के जाते ही उसने रिश्तेदार के हाथ का डंडा छीनकर उसे यह कहते हुए पीटना शुरू कर दिया कि तू बड़ा नमकहराम है रे। जिस थाली में खाता है, उसी में छेद करता है। कुछ देर मार खाने के बाद वह रिश्तेदार भी वहाँ से भाग गया।
सारः जब समस्या बड़ी हो तो उससे टुकड़ों-टुकड़ों में निपटने में ही समझदारी है।
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