Mulla Nasruddin ki kahaniya: तीसरे पहर का सन्नाटा चारों ओर फैला हुआ था। उमस बहुत ज़्यादा थी। धूल से भरी सड़क के दोनों ओर के मकानों की कच्ची दीवारों और बाड़ों से अलसायी-सी गर्मी उठ रही थी। पोंछने से पहले ही पसीना मुल्ला नसरुद्दीन के चेहरे पर फैल जाता था ।
बुखारा की चिरपरिचित सड़कों, मस्जिदों की मीनारों और कहवाख़ानों को उसने बड़े प्यार से पहचाना। पिछले दस वर्षों में बुखारा में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया था। हमेशा की तरह आज भी कुछ मरघिल्ले कुत्ते तालाब के किनारे पड़े सो रहे थे। रँगे हुए नाखूनवाले हाथों से बुर्का उठाए एक औरत बड़े सजीले ढंग से झुककर गहरे रंग के पानी में पतली सी सुराही डुबो रही थी ।
मुल्ला के सामने सवाल यह था कि खाना कहाँ से और कैसे मिले? उसने पिछले दिन से तीसरी बार पटका अपने पेट पर कसकर बाँध लिया था।
‘कोई-न-कोई उपाय तो करना ही पड़ेगा मेरे वफ़ादार गधे ।’ उसने कहा, ‘हम यहीं रुककर कोई उपाय सोचते हैं। सौभाग्य से यहाँ एक कहवाखाना भी है। ‘
लगाम ढीली करके उसने गधे को एक खूँटे के आसपास पड़े तिपतिया घास के टुकड़ों को चरने के लिए छोड़ दिया और अपनी खिलअत का दामन सिकोड़कर एक नहर के किनारे बैठ गया। गदला पानी मोड़ से टकराते हुए उफन-उफन कर बुलबुले छोड़ रहा था ।
अपने विचारों में डूबा मुल्ला नसरुद्दीन सोच रहा था – ‘मैं बुखारा क्यों आया? खाना ख़रीदने के लिए मुझे आधे तके का सिक्का भी कहाँ से मिलेगा? क्या मैं भूखा ही रहूँगा? उस कमबख्त टैक्स वसूल करने वाले अफसर ने मेरी सारी रक़म साफ़ कर दी। डाकुओं के बारे में मुझसे बात करना कितनी बड़ी गुस्ताख़ी थी । ‘
तभी उसे वह टैक्स अफसर दिखाई दे गया, जो उसकी बर्बादी का कारण था। वह घोड़े पर सवार कहवाख़ाने की ओर आ रहा था। दो सिपाही उसके अरबी घोड़े की लगाम थामे आगे-आगे चल रहे थे। उसके पास कत्थई – भूरे रंग का बहुत ही खूबसूरत घोड़ा था। उसकी गहरे रंग की आँखों में बहुत ही शानदार चमक थी। गर्दन सुराहीदार थी। जब वह अपनी खूबसूरत टाँगों को बड़े अंदाज़ से आगे बढ़ाकर रखता था तो पता चल जाता था कि वह अपने ऊपर भारी भरकम थुलथुल लाश को ढोने से नाराज़ है।
सिपाहियों ने बड़े अदब से अपने मालिक को उतरने में मदद दी। वह घोड़े से उतरकर कहवाख़ाने में चला गया। कहवाखाने का मालिक उसे देखते ही घबरा उठा । फिर स्वागत करते हुए उसे रेशमी गद्दों की ओर ले गया।
उसके बैठ जाने के बाद मालिक ने बेहतरीन कहवे का एक बढ़िया प्याला बनाया और चीनी कारीगरी के एक नाजुक गिलास में डालकर अपने मेहमान को दे दिया।
‘ज़रा देखो तो, मेरी कमाई पर इसकी कितनी शानदार ख़ातिरदारी हो रही है!’ मुल्ला नसरुद्दीन सोच रहा था ।
टैक्स अफसर ने डटकर कहवा पिया और वहीं गद्दों पर लुढ़क कर सो गया। उसके खर्राटों से कहवाख़ाना भर गया। अफसर की नींद में खलल न पड़े, इस डर से कहवाख़ाने में बैठे लोग फुस – फुसाकर बातें करने लगे। दोनों सिपाही उसके दोनों ओर बैठ गए और पत्तियों के चौरों से मक्खियाँ उड़ाने लगे।
कुछ देर बाद, जब उन्हें विश्वास हो गया कि उनका मालिक गहरी नींद में सो गया है तो उन्होंने आँखों से इशारा किया। उठकर घोड़े की लगाम खोल दी और उसके सामने घास का एक गट्ठर डाल दिया। वे नारियल का हुक्का लेकर कहवाख़ाने के अँधेरे हिस्से की ओर चले गए। थोड़ी देर बाद मुल्ला नसरुद्दीन की नाक के नथुनों से गाँजे की मीठी-मीठी गंध टकराई। सिपाही गाँजा पीकर मदहोश हो चुके थे।
सुबह शहर के फाटक की घटनाओं की याद आते ही वह भयभीत होकर सोचने लगा कि कहीं ये सिपाही उसे पहचान न लें। उसने वहाँ से जाने का इरादा किया, लेकिन भूख से उसका बुरा हाल था । वह मन ही मन कहने लगा, ऐ तकदीर लिखने वाले मुल्ला नसरुद्दीन की मदद कर । जाने कितनी बार तूने उसकी मदद की है। आज फिर उस पर करम की नज़र कर। किसी तरह आधा तंका दिलवा दे, ताकि वह अपने पेट की आग बुझा सके।’
तभी किसी ने उसे पुकारा, ‘अरे तुम ! हाँ, हाँ तुम ही जो वहाँ बैठे हो । ‘ मुल्ला नसरुद्दीन ने पलटकर देखा । सड़क पर एक सजी हुई गाड़ी खड़ी थी। बड़ा-सा साफा बाँधे और क़ीमती खिलअत पहने एक आदमी गाड़ी के पर्दों से बाहर झाँक रहा था ।
इससे पहले कि वह अजनबी कुछ कहता, मुल्ला नसरुद्दीन समझ गया कि खुदा ने उसकी दुआ सुन ली है और हमेशा की तरह उसे मुसीबत में देखकर उस पर करम की नज़र की है।
अजनबी ने खूबसूरत अरबी घोड़े को देखते हुए उसकी प्रशंसा करते हुए अकड़कर कहा, ‘मुझे यह घोड़ा पसंद है। बोल, क्या यह घोड़ा बिकाऊ है?’
मुल्ला नसरुद्दीन ने बात बनाते हुए कहा, ‘दुनिया में कोई भी ऐसा घोड़ा नहीं, जिसे बेचा न जा सके। ‘
‘शायद तुम्हारी जेब बिल्कुल ख़ाली है, ‘ अजनबी ने कहा, ‘ध्यान से मेरी बात सुनो। मैं नहीं जानता कि यह घोड़ा किसका है, कहाँ से आया है और इसका मालिक कहाँ है? मैं तुमसे पूछ भी नहीं रहा । तुम्हारे धूल से अटे कपड़ों को देखकर ऐसा लगता है कि तुम कहीं बहुत दूर से बुखारा आए हो । मेरे लिए यही बहुत काफ़ी है। तुम समझ रहे हो ना?’
मुल्ला नसरुद्दीन ने हाँ में सिर हिला दिया। वह तुरंत भाँप गया था कि यह रईस क्या कहना चाहता है। वह इससे आगे की बात भी समझ चुका था। अब वह खुदा से यही दुआ कर रहा था कि कोई बेवकूफ़ मक्खी टैक्स अफसर की गर्दन या नाक पर कूदकर उसे जगा न दे। सिपाहियों की उसे अधिक चिंता नहीं थी। कहवाख़ाने के अँधेरे हिस्से से आने वाले गहरे अँधेरे से स्पष्ट था कि वे दोनों नशे में धुत पड़े होंगे।
अजनबी रईस ने बुजुर्गों जैसे गंभीर लहजे में कहा, ‘तुम्हें यह पता होना चाहिए कि इस फटी खिलअत को पहनकर ऐसे शानदार घोड़े पर सवार होना तुम्हें शोभा नहीं देता। यह बात तुम्हारे लिए ख़तरनाक भी साबित हो सकती है, क्योंकि हर कोई यही सोचेगा कि इस भिखमंगे को इतना शानदार घोड़ा कहाँ से मिला? यह भी हो सकता है कि तुम्हें जेल में डाल दिया जाए’
मुल्ला नसरुद्दीन ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘आप सही फरमा रहे हैं, मेरे आका। सचमुच यह घोड़ा मेरे जैसों के लिए ज़रूरत से ज़्यादा बढ़िया है। इस फटी खिअलत में मैं ज़िंदगी भर गधे पर ही चढ़ता रहा हूँ। मैं इस शानदार घोड़े पर सवारी करने की हिम्मत ही नहीं कर सकता। ‘
उत्तर सुनकर अजनबी बहुत खुश हुआ।
‘यह ठीक है कि तुम ग़रीब हो। लेकिन घमंड ने तुम्हें अंधा नहीं बनाया है। नाचीज़ ग़रीब को विनम्रता ही शोभा देती है, क्योंकि खूबसूरत फूल बादाम के शानदार पेड़ों पर ही अच्छे लगते हैं, मैदान की कटीली झाड़ियों पर नहीं। बताओ, क्या तुम्हें यह थैली चाहिए? इसमें चाँदी के पूरे तीन सौ तंके हैं।’
‘चाहिए।’ मुल्ला नसरुद्दीन चौंक पड़ा। क्योंकि उसी समय एक बेवकूफ़ मक्खी टैक्स अफसर की नाक में घुस गई थी, जिससे वह छींक रहा था और भुनभुना रहा था।
मुल्ला नसरुद्दीन चिल्लाया, ‘चाहिए। ज़रूर चाहिए। चाँदी के तीन सौ तंके लेने से भला कौन इनकार करेगा ? अरे, यह तो ऐसे ही हुआ जैसे किसी को थैली सड़क पर पड़ी मिल गई हो। ‘
अजनबी ने जानकारों की तरह मुस्कुराते हुए कहा, ‘लगता है तुम्हें सड़क पर कोई दूसरी चीज़ मिली है। मैं यह रक़म उस चीज़ से बदलने को तैयार हूँ, जो तुम्हें सड़क पर मिली है। यह लो तीन सौ तंके । ‘
उसने थैली मुल्ला नसरुद्दीन को सौंप दी और अपने नौकर को इशारा किया। उसके चेचक के दागों से भरे चेहरे की मुस्कान और आँखों के काइयाँपन को देखते ही मुल्ला नसरुद्दीन समझ गया कि यह नौकर भी उतना ही बड़ा मक्कार है, जितना बड़ा मक्कार इसका मालिक है।
एक ही सड़क पर तीन-तीन मक्कारों का एक साथ होना ठीक नहीं है, उसने मन-ही-मन निश्चय किया। इनमें से कम-से-कम एक ज़रूर ही फालतू है । समय आ गया है कि यहाँ से नौ-दो ग्यारह हो जाऊँ ।
अजनबी की उदारता की प्रशंसा करते हुए मुल्ला नसरुद्दीन झपटकर अपने गधे पर सवार हो गया और उसे इतने ज़ोर से एड़ लगाई कि आलसी होते हुए भी गधा दुलकी मारने लगा।
थोड़ी दूर जाकर मुल्ला नसरुद्दीन ने मुड़कर देखा । नौकर अरबी घोड़े को गाड़ी से बाँध रहा था। वह तेज़ी से आगे बढ़ गया ।
लेकिन थोड़ी दूर जाकर उसने फिर पीछे मुड़कर देखा । वह अजनबी रईस और टैक्स अफसर एक-दूसरे से गुथे हुए थे और एक-दूसरे की दाढ़ियाँ नोच रहे थे। सिपाही उन्हें अलग करने की बेकार कोशिश कर रहे थे।
अकलमंद लोग दूसरों के झगड़ों में दिलचस्पी नहीं लेते। ‘ मुल्ला नसरुद्दीन ने मन-ही-मन कहा और गली-कूचों में चक्कर काटता हुआ काफ़ी दूर निकल गया। जब उसे विश्वास हो गया कि अब वह पीछा करने वालों से बच गया है,
उसने गधे की लगाम खींची, ‘ठहर जा, अब कोई जल्दी नहीं है । ‘
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। एक घुड़सवार तेज़ी से सड़क पर आ गया था।
यह वही चेचक के दागों से भरे चेहरे वाला नौकर था। वह उसी घोड़े पर सवार था। अपने पैर झुलाते हुए वह तेज़ी से मुल्ला नसरुद्दीन की बगल से गुज़र गया लेकिन अचानक घोड़े को सड़क पर आड़ा खड़ा करके रुक गया।
मुल्ला नसरुद्दीन ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘ओ भले मानस, मुझे आगे जाने दे। ऐसी तंग सड़कों पर लोगों को सीधे-सीधे सवारी करनी चाहिए। आड़े आड़े नहीं। ‘
नौकर ने हँसी के साथ कहा, ‘अब तुम जेल जाने से नहीं बच सकते। तुम्हें मालूम है, घोड़े के मालिक उस अफसर ने मेरे मालिक की आधी दाढ़ी नोच डाली है। मेरे मालिक ने उसकी नाक से खून निकाल दिया है। कल तुम्हें अमीर की अदालत में पेश किया जाएगा। सच यह है दोस्त, तुम्हारी क़िस्मत बहुत ख़राब है ।
‘ मुल्ला नसरुद्दीन ने आश्चर्य से पूछा, ‘क्या कह रहे हो तुम? ऐसे इज़्ज़तदार लोगों की इस तरह झगड़ने की वजह क्या है ? तुमने मुझे रोका क्यों है?
मैं तो उनके झगड़े का फ़ैसला कर नहीं सकता। अपने आप करने दो उन्हें फ़ैसला । ‘ ‘ख़ामोश ! ‘ नौकर चिल्लाया, ‘वापस चल । तुझे उस घोड़े के लिए जवाब देना होगा। ‘
‘कौन-सा घोड़ा?’
‘तेरी यह पूछने की मजाल? अरे वही घोड़ा, जिसके बदले में मेरे मालिक ने तुझे चाँदी के सिक्कों से भरी थैली दी है। ‘
‘तुम गलत कह रहे हो’, मुल्ला नसरुद्दीन बोला, ‘खुदा गवाह है, इस मामले का घोड़े से कोई सरोकार नहीं है। तुमने तो पूरी बातचीत सुनी थी। तुम्हारे दरियादिल मालिक ने एक ग़रीब आदमी की मदद करने के इरादे से मुझसे पूछा क्या मैं चाँदी के तीन सौ तके लेना पसंद करूंगा? मैंने उत्तर दिया, ‘हाँ, मैं यह रकम लेना पसंद करूंगा। तब उसने मुझे तीन सौ तके दे दिए। अल्लाह उसे लंबी ज़िंदगी दे। रुपया देने से पहले उसने यह देखने के लिए कि मैं इस इनाम का हकदार हूँ भी या नहीं, मुझ नाचीज़ में विनम्रता है या नहीं, उसने कहा था- ‘मैं नहीं जानना चाहता कि यह घोड़ा किसका है और कहाँ से आया है?’
चाबुक से अपनी पीठ खुजाते हुए नौकर सुनता रहा ।
‘देखा तुमने, वह यह जानना चाहता था कि कहीं मैं झूठे घमंड में अपने को घोड़े का मालिक तो नहीं बता बैठा। लेकिन मैं चुप रहा। वह दानी और उदार रईस मेरे जवाब से बहुत खुश हुआ। कहने लगा, ‘मेरे जैसों के लिए यह थोड़ा ज़रूरत से ज़्यादा बढ़िया है।’ मैंने उसकी बात मान ली। इससे वह और भी खुश होकर बोला, ‘मैं सड़क पर ऐसी चीज़ पा गया हूँ, जिसके बदले में मुझे चाँदी के सिक्के मिल सकते हैं।’ इसका इशारा मेरे इस्लाम में मेरे विश्वास की ओर था। यह विश्वास मुझे पवित्र स्थानों की यात्रा करने से प्राप्त हुआ है। इसके बाद उसने मुझे इनाम दिया। इस नेक काम से वह कुरान शरीफ़ में बताए गए बहिश्त के रास्ते में पड़ने वाले उस पुल पर से अपनी यात्रा और अधिक आसान बनाना चाहता था, जो बाल से भी अधिक बारीक़ है। तलवार की धर से भी ज़्यादा तेज़ है। इबादत करते समय मैं अल्लाह से तुम्हारे मालिक के इस नेक काम का हवाला देते हुए दुआ करूँगा कि वह उस पुल पर बाड़ लगवा दे। ‘
मुल्ला नसरुद्दीन के भाषण के समाप्त हो जाने पर परेशान कर डालने वाली काइयाँ हँसी के साथ नौकर ने कहा, ‘तुम ठीक कहते हो। मेरे मालिक के साथ तुम्हारी जो बातचीत हुई थी उसका मतलब इतना नेक है, मैं पहले समझ नहीं पाया था। लेकिन, क्योंकि उस दूसरी दुनिया के रास्ते के पुल को पार करने में तुमने मेरे मालिक की मदद करने का निश्चय कर लिया है तो अधिक हिफ़ाजत तभी होगी जब पुल के दोनों ओर बाड़ लग जाए। मैं भी बड़ी खुशी से अल्लाह से दुआ करूँगा कि मेरे मालिक के लिए दूसरी ओर की बाड़ लगा दे। ‘
‘तो माँगो दुआ। तुम्हें रोकता कौन है?’ मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, ऐसा करना तो तुम्हारा फ़र्ज़ है। क्या कुरान में हिदायत नहीं है कि गुलामों और नौकरों को अपने मालिकों के लिए रोज़ाना दुआ माँगनी चाहिए और इसके लिए कोई ख़ास इनाम अलग से नहीं माँगना चाहिए?’
घोड़े को एड़ लगाकर मुल्ला नसरुद्दीन को दीवार की ओर दबाते हुए नौकर ने सख्ती से कहा, ‘अपना गधा वापस लौटा। चल, जल्दी कर । मेरा ज़्यादा वक्त बर्बाद मत कर। ‘
मुल्ला नसरुद्दीन ने उसे बीच में ही टोककर कहा, ‘ठहरो, मुझे बात तो ख़त्म कर लेने दो मेरे भाई । मैं तीन सौ तंकों के हिसाब से उतने ही लफ्जों की दुआ करने वाला था। लेकिन अब मैं सोचता हूँ कि ढाई सौ लफ्जों की दुआ काफ़ी रहेगी। मेरी ओर की बाड़ कुछ छोटी और पतली हो जाएगी । जहाँ तुम्हारा संबंध है तुम पचास लफ्जों की दुआ माँगना । सब कुछ जानने वाला अल्लाह इतनी ही लकड़ी से तुम्हारी ओर भी बाड़ लगा देगा । ‘
‘क्यों? मेरी ओर की बाड़ तुम्हारी बाड़ का पाँचवाँ हिस्सा ही क्यों हो?’
‘वह सबसे ज़्यादा ख़तरनाक जगह पर जो बनेगी । ‘
‘नहीं, मैं ऐसी छोटी बाड़ों के लायक नहीं हूँ। इसका मतलब तो यह हुआ कि पुल का कुछ हिस्सा बिना बाड़ का रह जाएगा। मेरे मालिक के लिए इससे जो ख़तरा पैदा होगा, मैं तो उसे सोचकर ही काँप जाता हूँ। मेरी राय में तो हम दोनों ही डेढ़-डेढ़ सौ लफ्जों की दुआ माँगें ताकि पुल के दोनों ओर एक ही लंबाई की बाड़ हो। अगर तुम राज़ी नहीं होते तो इसका मतलब यह होगा कि तुम मेरे मालिक कां बुरा चाहते हो। यह चाहते हो कि वह पुल पर से गिर जाएँ । तब मैं मदद माँगूँगा और तुम जेलखाने का सबसे पास का रास्ता पकड़ोगे । ‘
‘तुम जो कुछ कह रहे हो उससे लगता है कि पतली टहनियों की बाड़ लगा देना ही तुम्हारे लिए काफ़ी रहेगा। क्या तुम समझ नहीं रहे कि बाड़ एक ओर मोटी और मजबूत होनी चाहिए, ताकि अगर तुम्हारे मालिक के पैर डगमगाएँ तो पकड़ने के लिए कुछ तो रहे । ‘ मुल्ला नसरुद्दीन ने गुस्से से कहा। उसे लग रहा था कि रुपयों की थैली पटके से खिसक रही है।
नौकर ने खुशी से चिल्लाते हुए कहा, ‘सचमुच तुमने ईमान और इंसाफ़ की बात कही है। बाड़ को मेरी ओर से मजबूत होने दो। मैं दो सौ लफ्जों की दुआ माँगने में आनाकानी नहीं करूँगा । ‘
‘तुम शायद तीन सौ लफ्जों की दुआ माँगना चाहोगे?’ मुल्ला नसरुद्दीन ने ज़हरीली आवाज़ में कहा।
वे दोनों अलग हुए तो मुल्ला नसरुद्दीन की थैली का आधा वजन कम हो चुका था। उन लोगों ने तय किया था कि मालिक के लिए बहिश्त के रास्ते वाले
पुल के दोनों ओर बराबर-बराबर मजबूत और मोटी बाड़ लगायी जाए।
‘अलविदा, मुसाफ़िर। हम दोनों ने आज बड़े पुण्य का काम किया है। ‘ नौकर ने कहा ।
अलविदा, वफ़ादार और भले नौकर। अपने मालिक की बाड़ के लिए तुम्हें कितनी चिंता है! साथ ही मैं यह और कहे देता हूँ कि तुम बहुत जल्द मुल्ला नसरुद्दीन की टक्कर के हो जाओगे । ‘
नौकर के कान खड़े हो गए, ‘तुमने उसका जिक्र क्यों किया?’
कुछ नहीं, यों ही। बस मुझे ऐसा लगा, मुल्ला नसरुद्दीन बोला और सोचने लगा, ‘यह आदमी बिल्कुल सीधा-सादा नहीं है । ‘
‘शायद उससे तुम्हारा कोई दूर का रिश्ता है। शायद तुम उसके ख़ानदान के किसी आदमी को जानते हो?”
‘नहीं, मैं उससे कभी नहीं मिला। और न मैं उसके किसी रिश्तेदार को ही जानता हूँ।’
नौकर ने ज़ीन पर बैठे-बैठे थोड़ा सा झुककर कहा, ‘सुनो, मैं तुम्हें एक राज़ की बात बताऊँ। मैं उसका रिश्तेदार हूँ। असल में मैं उसका चचेरा भाई हूँ। हम दोनों बचपन में साथ-साथ रहे थे।’
नौकर उसकी ओर और ज़्यादा झुककर बोला, ‘उसके पिता, दो भाई और एक चाचा मर चुके हैं। तुमने शायद सुना ही होगा । ‘
लेकिन मुल्ला नसरुद्दीन ख़ामोश ही रहा ।
चालबाज़ नौकर ने कहा, ‘अमीर भी कितना बेरहम है। बुखारा के सब वज़ीर बेवकूफ़ हैं। और हमारे शहरवाले अमीर भी उल्लू हैं। यह तो पूरे यक़ीन के साथ नहीं कहा जा सकता कि अल्लाह है भी या नहीं। ‘
मुल्ला नसरुद्दीन की जुबान पर एक करारा उत्तर आया, लेकिन उसने मुँह नहीं खोला।
नौकर ने अत्यधिक निराश होकर एक गाली दी और घोड़े के एड़ लगाकर दो छलांग में ही गली का मोड़ पार करके गायब हो गया।
अच्छा तो मुझे एक रिश्तेदार मिल गया । ‘ मुल्ला नसरुद्दीन मुस्कुराया ।
उस बूढ़े ने झूठ नहीं कहा था। बुखारा में जासूस मक्खी-मच्छरों की तरह भरे पड़े हैं। यहाँ चालाकी से काम लेना ही ठीक रहेगा । पुरानी कहावत है- कुसूरवार जबान सिर के साथ काटी जाती है।
