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एक बार प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य नरेंद्र देव काशी में रिक्शे पर बैठकर कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक परिचित मिले। उन्होंने आचार्य को रिक्शे पर जाते देख उन्हें रुकने का संकेत किया। रिक्शा रुका तो परिचित उनके पास आए और बोले, ‘कैसे हैं आचार्य जी?’ आचार्य बोले’, मैं ठीक हूँ।

आप बताएं? ‘परिचित ने हैरानी से उन्हें देखते हुए पूछा, ‘आचार्य जी, आप इतने बड़े आदमी होकर भी रिक्शे से क्यों जा रहे हैं? परिचित के सवाल पर आचार्य नरेंद्र देव बोले, ‘अरे भैया, मैं बड़ा आदमी कहाँ हूँ? मैं तो साधारण परिवार का व्यक्ति हूँ। रिक्शे से नहीं जाऊँगा, तो भला किस साधन से जाऊँगा?’ उनकी बात सुनकर परिचित बोले, ‘आचार्य जी, आप बीएचयू के वाइस चांसलर हैं। वाइस चांसलर को चलने-फिरने के लिए एक कार तो मिली ही होगी?’ नरेंद्र देव बोले, “भैया, कार तो है, लेकिन मैं उसका खर्च वहन नहीं कर सकता।” यह सुनकर परिचित बोले, “आप यह क्यों कह रहे हैं, कि मैं कार का खर्च नहीं उठा सकता?” यह सुनकर आचार्य मुस्कुराने लगे और बोले, “पहली बात तो यह कि उस कार पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।”

आचार्य नरेंद्र देव बोले, “वह कार सरकारी है और विश्वविद्यालय के काम से आने-जाने के लिए मिली मुझे है। इसलिए उसका उपयोग मैं हमेशा विश्वविद्यालय के काम के लिए ही करता हूँ। आज मैं अपने एक बीमार संबंधी को देखने अस्पताल जा रहा हूँ। यह मेरा निजी कार्य है। ऐसे में मैं अपने निजी कार्य के लिए उस कार का इस्तेमाल कैसे कर सकता हूँ, जो मुझे विश्वविद्यालय के काम से आने-जाने के लिए मिली है?” उनका यह जवाब सुनकर परिचित दंग रह गए। वे उनकी सादगी और उनके आदर्श के कायल हो उठे।

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)