दैत्यों को इस बात का बहुत मलाल था कि उन्हें देवताओं की तुलना में हीन समझा जाता है। एक बार वे इसकी शिकायत लेकर विधाता के पास पहुँचे। उन्होंने दैत्यों से कहा कि वे अगले सप्ताह भोजन के लिए आएं। उन्हें उनके प्रश्न का उत्तर तभी मिल जाएगा। नियत दिन दैत्य भोजन के लिए पहुँचे विधाता ने कहा कि आज भोजन के लिए देवताओं को भी आमंत्रित किया गया है।
लेकिन दोनों को एक शर्त का पालन करना था। उन्हें अपने दोनों हाथों को बांहों से कलाइयों तक सीधी खपच्ची का प्रयोग करते हुए इस तरह से बांधना था कि उनके हाथ बीच से न मुड़ सकें। इसी अवस्था में उन्हें भोजन भी करना था। दोनों पक्षों ने शर्त स्वीकार कर ली। दैत्यों ने पहले भोजन करने की जिद की। हाथों को खपच्चियों से बांधकर वे भोजन करने बैठ गए।
लेकिन हाथ बंधे होने के कारण वे हाथों को मुंह तक नहीं ले जा पा रहे थे और सारा भोजन रास्ते में ही गिरा रहे थे। कुछ देर तक कोशिशें करने के बाद वे शर्मिंदा होकर उठ गए और बिना भोजन किए जाने लगे। इस पर विधाता ने उन्हें रुकने के लिए कहा और फिर देवताओं को भोजन के लिए बुलाया। दैत्यों की भांति देवता भी बंधे हाथों के साथ भोजन करने बैठ गए। दैत्य यह देखकर हैरान हो गए कि भोजन परोसे जाते ही देवताओं ने दो-दो की जोड़ियां बना लीं और हर जोड़ी एक दूसरे को खाना खिलाने लगी। दैत्यों को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
सारः परस्पर सहयोग से हर चुनौती का मुकाबला किया जा सकता है।
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