Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात हैं-राजा नाभाग के अम्बरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे । अम्बरीष बड़े वीर बुद्धिमान और तपस्वी राजा थे । उन्हें पृथ्वी के समस्त ऐश्वर्य और सुख प्राप्त थे । लेकिन विष्णु भक्त अम्बरीष जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं, वह कुछ ही दिनों का सुख होता है । अतः उनका मन सदैव भगवान् विष्णु के चरण-कमलों और उनके भक्तों की सेवा में ही लगा रहता था ।
राज्याभिषेक के बाद राजा अम्बरीष ने अनेक अश्वमेध यज्ञ करके भगवान् विष्णु की पूजा-उपासना की । उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उनकी रक्षा के लिए अपना चक्र नियुक्त कर दिया था । सुदर्शन नामक यह चक्र शत्रुओं का नाश कर भक्तों की रक्षा करने वाला है ।
एक बार राजा अम्बरीष ने अपनी पत्नी के साथ एक वर्ष तक द्वादशी प्रधान एकादशी-व्रत करने का निश्चय किया । उस दिन व्रत के बाद उन्होंने भगवान् विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को भरपूर दान-दक्षिणा दी । तभी वहाँ दुर्वासा आ पहुँचे । अम्बरीष ने उनका स्वागत किया और उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बिठाया । तत्पश्चात् उनकी पूजा करके भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया । दुर्वासा ऋषि ने उनका आग्रह सहर्ष स्वीकार कर लिया । भोजन से पूर्व नित्य कर्मों से निवृत्त होने के लिए वे यमुना के तट पर चले गए । वे परब्रह्म का ध्यान कर स्नान करने लगे ।
इधर द्वादशी केवल कुछ ही क्षण शेष रह गई थी । स्वयं को धर्मसंकट में देख अम्बरीष ब्राह्मणों से परामर्श करते हुए बोले -“मान्यवरों ! ब्राह्मण को बिना भोजन करवाए स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते भोजन न करना-दोनों ही मनुष्य को पाप का भागी बनाते हैं । अतः इस समय आप मुझे ऐसा उपाय बताएँ, जिससे कि मैं पाप का भागी न बन सकूँ ।”
ब्राह्मण बोले -“राजन ! शास्त्रों में कहा गया है कि जल पीना भोजन करने के समान भी है और समान नहीं भी है । इसलिए इस समय आप जल पीकर द्वादशी का नियम पूर्ण कीजिए ।” यह सुनकर अम्बरीष ने जल पी लिया और दुर्वासा ऋषि की प्रतीक्षा करने लगे ।
जब दुर्वासा ऋषि लौटे तो उन्होंने तपोबल से जान लिया कि अम्बरीष भोजन कर चुके हैं । अतः वे क्रोधित हो उठे और कटु स्वर में बोले -“अम्बरीष ! धन के मद में चूर होकर तू स्वयं को बड़ा धर्मात्मा मानता है । लेकिन तुझे ब्राह्मण का आदर करना तक नहीं आता । तूने मुझे भोजन का निमंत्रण दिया और स्वयं पहले खा लिया । अब देख, तेरी इस दुष्टता का दण्ड ।”
यह कहकर दुर्वासा ने अपनी एक जटा उखाड़ी और अम्बरीष को मार डालने के लिए एक भयंकर और विकराल कृत्या (दैवी शक्ति) उत्पन्न की । दुर्वासा के आदेश से वह कृत्या तलवार लेकर उनकी ओर बढ़ी । लेकिन वे बिना विचलित हुए मन-ही-मन भगवान् विष्णु का स्मरण करते रहे । फिर जैसे ही कृत्या ने उन पर तलवार का वार करना चाहा, भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उसे जलाकर भस्म कर दिया । जब दुर्वासा ऋषि ने देखा कि कृत्या को भस्म कर चक्र उनकी ओर बढ़ रहा है तो वे भयभीत होकर वहाँ से भागे ।
दुर्वासा ऋषि आकाश, पाताल, पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, वनादि अनेक स्थानों पर गए, किंतु सुदर्शन चक्र ने उनका पीछा नहीं छोड़ा । जब उन्हें कहीं शरण नहीं मिली तो वे ब्रह्माजी से रक्षा की प्रार्थना करने लगे ।
ब्रह्माजी अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए बोले -“वत्स ! मैं प्रजापति, इन्द्र, सूर्य आदि सभी देवगण भगवान् विष्णु द्वारा बनाएँ नियमों में बँधे हुए हैं । हम उनकी आज्ञा के अनुसार ही सृष्टि का कल्याण करते हैं । इसलिए उनके भक्त के शत्रु की रक्षा करना हमारे वश में नहीं है ।”
ब्रह्माजी द्वारा निराश किए जाने पर दुर्वासा भगवान् महादेव की शरण में गए । महादेव बोले -“ऋषिवर ! यह सुदर्शन चक्र भगवान् विष्णु का शस्त्र है, जो उनके भक्तजन की रक्षा करता है । इसका तेज सभी के लिए असहनीय है । इसलिए आप भगवान् विष्णु की शरण में जाएँ । केवल वे ही सुदर्शन चक्र का निवारण कर आपका मंगल कर सकते हैं ।”
वहाँ से भी निराश होकर दुर्वासा ऋषि भगवान् विष्णु की शरण में पहुँचे और उनके चरणों में गिर कर करुण स्वर में बोले -“भगवन् ! मैं आपका अपराधी हूँ । आपका प्रभाव न जानकर मैंने आपके परम भक्त राजा अम्बरीष को मारने का प्रयास किया । भगवन् ! आप तो दया के सागर हैं । कृपया मेरी धृष्टता को क्षमा कर मेरी रक्षा कीजिए । आपका नाम स्मरण करने से ही प्राणी के सभी संकट दूर हो जाते हैं । अपने इस भक्त पर भी कृपा कीजिए प्रभु ।”
भगवान् विष्णु बोले – “मुनिवर ! मैं सर्वदा भक्तों के अधीन हूँ । मेरे सीधे-सादे भक्तों ने अपने प्रेम से मुझे बाँध रखा है । भक्तों का एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ । इसलिए उनके अतिरिक्त न तो मैं स्वयं को और न ही लक्ष्मी को चाहता हूँ । जो अपने बंधु-बांधवों और समस्त भोगों को त्याग कर मेरी शरण में आ गए हैं, उन्हें छोड़ने का विचार मैं भला कैसे कर सकता हूँ । यदि आप इस विपत्ति से बचना चाहते हैं तो भक्त अम्बरीष की ही शरण में ही जाइए । उसके प्रसन्न होने पर आप स्वयं इस विपत्ति से मुक्त हो जाएँगे ।”
भगवान् विष्णु के परामर्श से दुर्वासा ऋषि पुन: अम्बरीष के पास गए और उनके चरण पकड़कर अपने अपराध की क्षमा माँगने लगे । महर्षि दुर्वासा की दुर्दशा देखकर अम्बरीष अत्यंत दु:खी हो गए । तब उन्होंने चक्र की स्तुति कर उससे लौट जाने की प्रार्थना की । उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर सुदर्शन चक्र लौट गया और दुर्वासा ऋषि के प्राण बच गए ।
इसके बाद अम्बरीष ने दुर्वासा को ससम्मान बिठाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की और प्रेमपूर्वक भोजन करवाया । अम्बरीष के व्यवहार से प्रसन्न होकर दुर्वासा मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया ।
राजा अम्बरीष ने अनेक वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया । वृद्धावस्था में उन्होंने अपना राज्य पुत्रों को सौंपा और तपस्या करने वन में चले गए । उन्होंने सारे सुख त्याग दिए और भगवान् विष्णु का स्मरण करके समाधिलीन हो गए । अंत में भगवान् विष्णु की कृपा से उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
