तीन दिन के बाद चक्रधर को फिर एक पत्र मिला। लिखा था-
‘माई डियर चक्रधर,
तुम्हारी प्रेम-पत्री मिली। बार-बार पढ़ा। आँखों में लगाया, चुम्मन किया। कितनी मनोहर महक थी। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हमारा प्रेम भी ऐसा ही सुरभि-सिंचित रहे। आपको शिकायत है कि मैं आपसे बातें क्यों नहीं करती। प्रिय, प्रेम बातों में नहीं, हृदय से होता है। जब मैं तुम्हारी ओर से मुंह फेर लेती हूँ तो मेरे दिल पर क्या गुजरती है, यह मैं ही जानती हूँ। एक दबी हुई ज्वाला है, जो अंदर-ही-अंदर मुझे भस्म कर रही है। आपको मालूम नहीं, कितनी आँखें हमारी ओर एकटक ताकती रहती हैं। जरा भी संदेह हुआ, और चिर-वियोग की विपत्ति हमारे सिर पड़ी। इसलिए हमें बहुत ही सावधान रहना चाहिए। तुमसे एक याचना करती हूं, क्षमा करना। मैं तुम्हें अंग्रेजी पोशाक में देखने को बहुत उत्कंठित हो रही हूँ। यों तो तुम चाहे जो वस्त्र धारण करो, मेरी आँखों के तारे हो-विशेषकर तुम्हारा सादा कुरता मुझे बहुत ही सुन्दर मालूम होता है-फिर भी, बाल्यावस्था से जिन वस्त्रों को देखती चली आती हूँ उन पर विशेष अनुराग होना स्वाभाविक है। मुझे आशा है, तुम निराश न करोगे। मैंने तुम्हारे लिए एक वास्कट बनाया है। उसे मेरे प्रेम का तुच्छ उपहार समझकर स्वीकार करो।
तुम्हारी लूसी।
पत्र के साथ एक छोटा-सा पैकेट था। वास्कट उसी में बंद था। यारों ने आपस में चंदा करके बड़ी उदारता से इसका मूलधन एकत्र किया था। उस पर सेट-परसेंट से भी अधिक लाभ होने की संभावना थी। पंडित चक्रधर उक्त उपहार और पत्र पाकर इतने प्रसन्न हुए, जिसका ठिकाना नहीं । उसे लेकर सारे छात्रावास में चक्कर लगा आये। मित्र-बंध देखते थे, उसकी काट-छाँट की सराहना करते थे, तारीफों के पुल बाँधते थे, उसके मूल्य का अतिश्योक्तिपूर्ण अनुमान करते थे। कोई कहता था-यह सीधे पेरिस से सिलकर आया है, इस मुल्क में ऐसे कारीगर कहां, कौन, अगर कोई इस ठक्कर का वास्कट सिलवा दे, तो 100 रु. की बाजी बदता हूँ। पर वास्तव में उसके कपड़े का रंग इतना गहरा था कि कोई सुरुचि रखने वाला मनुष्य उसे पहनना पसन्द न करता। चक्रधर को लोगों ने पूर्व मुख कर के खड़ा किया, और फिर शुभ मुहूर्त में यह वास्कट उन्हें पहनाया। आप फूले न समाते थे। कोई इधर से आकर कहता- भाई तुम तो बिलकुल पहचाने नहीं जाते। चोला ही बदल दिया। अपने वक्त के यूसुफ हो। यार, क्यों न हो, तभी तो यह ठाट है। मुख कैसा दमकने लगा, मानो तपाया हुआ कुंदन है। अजी, एक वास्कट पर यह जीवन है, कहीं पूरा अंग्रेजी सूट पहल लो, तो न जाने क्या गजब हो जाए। सारी मिसें लोट-पोट हो जाएँ। गला छुड़ाना मुश्किल हो जाए।
आखिर सलाह हुई कि उनके लिए एक अंग्रेजी सूट बनवाना चाहिए। इस कला के विशेषज्ञ उनके साथ गुट बाँधकर अच्छा बनवाने चले। पंडितजी घर के सम्पन्न थे। एक अंग्रेजी दुकान से बहुमूल्य सूट लिया गया। रात को इसी उत्सव में गाना- बजाना भी हुआ। दूसरे दिन, दस बजे, लोगों ने पंडितजी को सूट पहनाया। आप अपनी उदासीनता दिखाने के लिए बोले-मुझे तो बिलकुल अच्छा नहीं लगता। आप लोगों को न जाने क्यों ये कपड़े अच्छे लगते हैं?
नईम- जरा आईने में सूरत देखिए, तो मालूम हो। खासे शहजादे मालूम पड़ते हो। तुम्हारे हुस्न पर मुझे तो इश्क है। खुदा ने तो आपको ऐसी सूरत दी, और उसे आप मोटे कपड़ों में छिपाए हुए थे।
चक्रधर को नेकटाई बांधने का ज्ञान न था। बोले- भई, इसे तो ठीक कर दो। गिरिधर सहाय ने नेकटाई इतनी कसकर बाँधी कि पंडितजी को साँस लेना भी मुश्किल हो गया। बोले- यार, बहुत तंग है।
गिरधर- इसका फैशन ही यह है, हम क्या करें। ढीली टाई ऐब में दाखिल है।
नईम- इन्होंने तो भी बहुत ढीली रखी है। मैं तो और भी कसकर बाँधता हूँ।
चक्रधर- अजी, यहाँ तो दम घुट रहा है!
नईम- और टाई की मंशा ही क्या है? इसलिए तो बाँधी जाती है कि आदमी बहुत जोर-जोर से साँस न ले सके।
चक्रधर के प्राण संकट में थे। आँखें सजल हो रही थीं, चेहरा भी सुर्ख हो गया था। मगर टाई को टीला करने की हिम्मत न पड़ती थी। खूब सज-धज से आप कॉलेज चले, तो मित्रों की एक गोल सम्मान का भाव दिखाती आपसे पीछे- पीछे चली, मानो बारातियों का समूह है। एक-दूसरे की तरफ ताकते और रूमाल मुँह में देकर हँसते थे। मगर पंडितजी को क्या खबर है। वह तो अपनी धुन में मस्त थे। अकड़-अकड़कर चलते हुए आकर क्लास में बैठ गए। थोड़ी देर के बाद लूसी भी आयी। पंडित का यह वेष देखा, तो चकित हो गई। उसके अधरों पर मुस्कान की एक अपूर्व रेखा अंकित हो गई। पंडितजी ने समझा, वह उसके उल्लास का चिह्न है। बार-बार मुस्कुराकर उसकी ओर ताकने और रहस्यपूर्ण भाव से देखने लगे, किन्तु वह लेश मात्र भी ध्यान न देती थी।
पंडितजी की जीवनचर्या, धर्मोत्साह और जातीय प्रेम में बड़े परिवर्तन होने लगे। सबसे पहले शिखा पर छुरा फिरा। अंग्रेजी फैशन के बाल कटवाए गए। लोगों ने कहा- यह क्या महाशय! आप तो फरमाते थे कि शिखा द्वारा विद्युतप्रवाह शरीर में प्रवेश करता है। अब वह किस मार्ग से जाएगा?
पंडित ने दार्शनिक भाव से मुस्कराकर कहा- मैं तुम लोगों को उल्लू बनाता था। क्या मैं इतना भी नहीं जानता कि सब पाखंड है। मुझे अंत-करण से इस पर विश्वास ही कब था, आप लोगों को धोखा देना चाहता था।
नईम- वल्लाह, आप एक ही झांसेबाज़ निकले। हम लोग आपको बछिया के ताऊ ही समझते थे, मगर आप तो आठों गाँठ कुम्मैत निकले।
चक्रधर- देखता था कि लोग कहते क्या हैं।
शिखा के साथ-साथ संध्या और हवन की भी इतिश्री हो गई। हवन कुंड कमरे में चारपाई के नीचे फेंक दिया गया। कुछ दिनों के बाद सिगरेट के जले हुए टुकड़े रखने का काम देने लगा। जिस पर बैठकर हवन किया करते थे, वह पायदान बना। अब प्रतिदिन साबुन रगड़ते, बलों में कंघी करते और सिगार पीते। यार लोग उन्हें चंग पर चढ़ाते रहते थे। यह प्रस्ताव हुआ कि इस चंडूल से वास्कट के रुपये वसूल करने चाहिए मय सूद के। फिर क्या था, लूसी का एक पत्र आ गया- ‘आपके रूपान्तर से मुझे जितना आनन्द हुआ, उसे शब्दों में नहीं प्रकट कर सकती। आपसे मुझे ऐसी ही आशा थी। अब आप इस योग्य हो गए हैं कि कोई यूरोपियन लेडी आपके सहवास में अपना अपमान नहीं समझ सकती। अब आपसे प्रार्थना केवल यही है कि मुझे अपने अनन्त और अविरल प्रेम का कोई चिह्न प्रदान कीजिए, जिसे मैं सदैव अपने पास रखूँ। मैं कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं, केवल प्रेमोपहार चाहती हूँ।’
चक्रधर ने मित्रों से आकर पूछा- अपनी पत्नी के लिए कुछ सौगात भेजना चाहता हूँ। क्या भेजना उचित होगा।
नईम- जनाब, यह तो उसकी तालीम और मजाक पर मुनहसर है। अगर वह नए फैशन की लेडी हैं, तो कोई बेशकीमत, सुबुक वजहदार चीज या ऐसी ही कई चीजें भेजिए। मसलन, रूमाल, रिस्टवाच, लवेंडर की शीशी, फैंसी कंघी, आईना, लाकेट, ब्रुश वगैरह। और खुदा-न-खास्ता अगर गंवारु है, तो किसी दूसरे आदमी से पूछिए। मुझे गँवारिनों के मिजाज़ का इल्म नहीं।
चक्रधर- जनाब, अंग्रेजी पढ़ी हुई हैं। बड़े ऊंचे खानदान की हैं।
नईम- तो फिर मेरी सलाह पर अमल कीजिए।
संध्या समय मित्रगण चक्रधर के साथ बाजार गये और ढेर चीजें बटोर लाए। सबकी सब ऊँचे दरजे की कोई 75 रु. खर्च हुए। मगर पंडितजी ने उफ तक न की। हँसते हुए रुपये निकाले। लौटते वक्त नईम ने कहा- अफसोस, हमें ऐसी खुशमजाक बीबी न मिली।
गिरधर- जहर खा लो, जहर!
नईम- भई, दोस्तों के माने तो यही है कि एक बार हमें भी उनकी जियारत हो। क्यों पंडितजी, आप इसमें कोई हर्ज समझते हैं?
चक्रधर- माता-पिता न होते, तो कोई हर्ज न था। अभी तो मैं उन्हीं का मोहताज हूं। इतनी स्वतन्त्रता क्यों कर बरतूं?
नईम- खैर, खुदा उन्हें जल्द दुनिया से नजात दे।
रातों-रात पैकेट बना और प्रातःकाल पंडितजी उसे ले जाकर लाइब्रेरी में रख आये। लाइब्रेरी सवेरे ही खुल जाती थी। कोई अड़चन न हुई। उन्होंने इधर मुँह फेरा, उधर यारों ने माल उड़ाया और चम्पत हुए। नईम के कमरे में चंदे के हिसाब से हिस्सा-बाँट हुआ। किसी ने घड़ी पायी, किसी ने रूमाल, किसी ने कुछ। एक- एक रुपये के बदले पाँच-पाँच रुपये हाथ लगे।
