किन्तु शोक, महाशोक, इस भोज का परिणाम अभागे चक्रधर के लिए कल्याणकारी न हुआ। चलते-चलाते लज्जित और अपमानित होना बदा था। मित्रों की तो दिल्लगी थी और उस बेचारे की जान पर बन रही थी। सोचा, अब तो विदा होते ही हैं, फिर मुलाकात हो या न हो। अब किस दिन के लिए सब्र करें । मन के प्रेमोद्गारों को निकाल क्यों न लें। कलेजा चीरकर दिखा क्यों न दें। और लोग तो दावत खाने में जुटे हुए थे, और वह मदनबाण-पीड़ित युवक बैठा सोच रहा था कि यह अभिलाषा क्यों कर पूरी हो? अब यह आत्म-दमन क्यों? लज्जा क्यों। विरक्ति क्यों? गुप्त रोदन क्यों? मौन-मुखापेक्षा क्यों? अन्तर्वेदना क्यों? बैठे-बैठे प्रेम को क्रियाशील बनाने के लिए मन में बल का संचार करते रहे। देवताओं का स्मरण करते, कभी ईश्वर को अपनी भक्ति की याद दिलाते। अवसर की ताक में इस भांति बैठे थे, जैसे बगुला मेंढक की ताक में बैठता है। भोज समाप्त हो गया। पान-इलायची बँट चुकी, वियोग-वार्ता हो चुकी। मिस लूसी अपनी श्रवण मधुर वाणी से हृदय में हाहाकार मचा चुकीं, और भोजशाला से निकलकर बाइसिकिल पर बैठीं। उधर कवि-सम्मेलन में इस तरह मिसरा पढ़ा गया-
कोई दीवाना बनाए कोई दीवाना बने।
इधर चक्रधर चुपके से लूसी के पीछे हो लिये और साइकिल को भयंकर वेग से दौड़ाते हुए उसे आधे रास्ते में जा पकड़ा। वह उन्हें इस व्यग्रता से दौड़े आते देखकर सहम उठी कि कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई। बोली- वेल पंडितजी। क्या बात है? आप इतने बदहवास क्यों हैं? कुशल तो है?
चक्रधर का गला भर आया। कम्पित स्वर से बोले- अब आपसे सदैव के लिए बिछुड़ ही जाऊंगा। यह कठिन विरह-पीड़ा कैसे सही जाएगा। मुझे तो शंका है, कहीं पागल न हो जाऊँ।
लूसी ने विस्मित होकर पूछा- आपकी मंशा क्या है? आप बीमार हैं क्या?
चक्रधर- आह डियर डार्लिंग, तुम पूछती हो, मैं बीमार हूँ? मैं मर रहा हूँ प्राण निकल चुके हैं, केवल प्रेमाभिलाषा का अवलम्ब है।
यह कहकर आपने उसका हाथ पकड़ना चाहा। यह उनका उन्माद देखकर भयभीत हो गई। क्रोध में आकर बोली- आप मुझे यहाँ रोकर मेरा अपमान कर रहे हैं। इसके लिए आपको पछताना पड़ेगा।
चक्रधर- लूसी, देखो चलते-चलाते इतनी निष्ठुरता न करो। मैंने ये विरह के दिन किस तरह काटे हैं, सो मेरा दिल ही जानता है। मैं ही ऐसा बेहया हूँ कि अब तक जीता हूँ। दूसरा होता, तो अब तक चल बसा होता। बस, केवल तुम्हारी सुधामयी पत्रिकाएँ ही मेरे जीवन का एकमात्र आधार थीं।
लूसी- मेरी पत्रिकाएँ! कैसी? मैंने आपको कब पत्र लिखे! आप कोई नशा तो नहीं कर आये हैं?
चक्रधर-डियर डार्लिंग, रानी इतनी जल्द न भूल जाओ, इतनी निर्दयता न दिखाओ। तुम्हारे वे प्रेम-पत्र, जो तुमने मुझे लिखे हैं, मेरे जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति रहेंगे। तुम्हारे अनुरोध से मैंने यह वेष धारण किया, अपना संध्या-हवन छोड़ा, यह आचार-व्यवहार ग्रहण किया। देखो तो जरा, मेरे हृदय पर हाथ रखकर, कैसी धड़कन हो रही है। मालूम होता है, बाहर निकल पड़ेगा। तुम्हारा यह कुटिल हास्य मेरे प्राण ही लेकर छोड़ेगा। मेरी अभिलाषाओं …
लूसी- तुम भंग तो नहीं खा गए हो या किसी ने तुम्हें चकमा तो नहीं दिया है? मैं तुमको प्रेम-पत्र लिखती! ह-ह: जरा अपनी सूरत तो देखो, खासे बनैले सुअर मालूम होते हो।
किन्तु पंडितजी अभी तक यही समझ रहे थे कि यह मुझसे विनोद कर रही है। उसका हाथ पकड़ने की चेष्टा करके बोले- प्रिय, बहुत दिनों के बाद यह सुअवसर मिला है। अब न भागने पाओगी?
लूसी को अब क्रोध आ गया। उसने जोर से एक चाँटा उनको लगाया, और सिंहनी की भांति गरज कर बोली- यू व्लाड़ी, हट जा रास्ते से नहीं तो, अभी पुलिस को बुलाती हूँ। रास्केल।
पंडितजी चांटा खाकर चौंधिया गए। आँखों के सामने अँधेरा छा गया। मानसिक आघात पर यह शारीरिक वज्रपात। यह दुहरी विपत्ति! वह तो चाँटा मारकर हवा हो गई और वह वहीं जमीन पर बैठकर इस सम्पूर्ण वृत्तान्त की मन-ही-मन आलोचना करने लगे। चोट ने बाहर की आँखें आँसुओं से भर दी थीं, पर अंदर की आँखें खोल दी थीं। कहीं कॉलेज के लौंडों ने तो यह शरारत नहीं की? अवश्य यही बात है। आह! पाजियों ने बड़ा चकमा दिया! तभी सब-के-सब मुझे देख-देखकर हँसा करते थे। मैं भी कुछ कम-अक्लमंद हूँ, नहीं तो इनके हाथों टेसू क्यों बनता। बड़ा झाँसा दिया। उम्र-भर याद रहेगा। वहाँ से झल्लाए हुए आये और नईम से बोले- तुम बड़े दगाबाज हो, परले सिरे के धूर्त, पाजी, उल्लू, गधे, शैतान।
नईम- आखिर कोई बात भी कहिए, या गालियाँ ही देते जाइएगा?
गिरिधर- क्या बात हुई, कहीं लूसी से आपने कुछ कहा तो नहीं?
चक्रधर- उसी के पास से आ रहा हूँ चाँटा खाकर और मुँह पर कालिख लगवा कर। तुम दोनों ने मिलकर मुझे खूब उल्लू बनाया। इसकी कसर न लूँ तो मेरा नाम नहीं। मैं नहीं जानता था कि तुम लोग मित्र बनकर मेरी गर्दन पर छुरी चला रहे हो! अच्छा, जो वह गुस्से में आकर पिस्तौल चला देती, तो?
नईम- अरे यार, माशूका की घातें निराली होती हैं।
चक्रधर- तुम्हारा सिर! माशूक चाटें लगाया करते हैं। वे आँखों से तीर चलाते हैं, कटारी मारते हैं, या हाथों से मुष्ठि प्रहार करते हैं?
गिरिधर- उससे आपने क्या कहा?
चक्रधर- कहा क्या, अपनी विरह-व्यथा की गाथा सुनाता रहा। इस पर उसने ऐसा चाँटा रसीद किया कि कान भन्ना उठे। हाथ हैं उसके कि पत्थर।
गिरिधर- गजब ही हो गया। आप हैं निरे चोंच! भले आदमी, इतनी मोटी बुद्धि है तुम्हारी। हम क्या जानते थे कि आप ऐसे छिछोरे हैं, नहीं तो मजाक ही क्यों करते? अब आपके साथ हम लोगों पर भी आफत आयी। कहीं उसने प्रिंसिपल से शिकायत कर दी, तो न इधर के हुए, न उधर के। और जो कहीं अपने किसी अंग्रेज आशना से कहा, तो जान के लाले पड़ जाएँगे। बड़े बेवकूफ हो यार, निरे चोंच हो। इतना भी नहीं समझे कि यह सब दिल्लगी थी। ऐसे बड़े खूबसूरत भी तो नहीं हो।
चक्रधर- दिल्लगी तुम्हारे लिए थी, मेरी तो मौत हो गई। चिड़िया जान से गई, लड़कों का खेल हुआ। अब चुपके से मेरे पाँच सौ रुपये लौटा दीजिए, नहीं तो गर्दन ही तोड़ दूंगा।
नईम- रुपयों के बदले जो खिदमत चाहे ले तो। कहो तुम्हारी हजामत बना दें, जूते साफ कर दें, सिर सहला दें। बस, खाना देते जाना। कसम ले लो, जो जिन्दगी- भर कहीं जाऊँ या तरक्की के लिए कहूँ। माँ-बाप के सिर से तो बोझ हट जाएगा।
चक्रधर- मत जले पर नमक छिड़को जी! आप-के-आप गये, मुझे भी ले डूबे। तुम्हारी तो अँग्रेजी अच्छी है, नोट-पीटकर निकल जाओगे। मैं तो पास भी न हूंगा। बदनाम हुआ, वह अलग। पाँच सौ की चपत भी पड़ी। यह दिल्लगी है कि गला काटना? खैर, समझूंगा, और चाहे मैं न समझूँ पर ईश्वर जरूर समझेंगे।
नईम- गलती हुई भाई, मुझे अब खुद इसका अफसोस है।
गिरिधर- खैर, रोने-धोने का अभी बहुत मौका है। अब यह बतलाइए कि लूसी ने प्रिंसिपल से कह दिया तो क्या नतीजा होगा। तीनों आदमी निकाल दिये जाएँगे। नौकरी से भी हाथ धोना पड़ेगा। फिर?
चक्रधर- मैं तो प्रिंसिपल से तुम लोगों की सारी कलाई खोल दूँगा।
बईम- क्यों यार, दोस्ती के यही माने हैं?
चक्रधर- जी हां, आप जैसे दोस्तों की यही सजा है।
उधर तो रात-भर मुशायरे का बाजार गरम रहा और इधर यह त्रिमूर्ति बैठी प्राण-रक्षा के उपाय सोच रही थी। प्रिंसिपल के कानों तक बात पहुँची और आफत आयी। अंग्रेज वाली बात है, न जाने क्या कर बैठे। आखिर बहुत वाद-विवाद के पश्चात यह निश्चित हुआ कि नईम और गिरिधर प्रातःकाल मिस लूसी के बँगले पर जा, उससे क्षमा-याचना करें और इस अपमान के लिए वह जो प्रायश्चित्त कहे, उसे स्वीकार करें।
चक्रधर- मैं एक कौड़ी न दूँगा।
नईम- न देना भाई, हमारी जान तो है न?
गिरिधर- जान लेकर वह चाटेगी। पहले रुपये की फिक्र कर लो। वह बिना तावान लिये न मानेगी।
नईम- भाई चक्रधर, खुदा के लिए इस वक्त दिल न छोटा करो, नहीं तो हम तीनों की मिट्टी खराब होगी। जो कुछ हुआ उसे मुआफ़ करो, अब फिर ऐसी खता न होगी।
चक्रधर- हूँ यही न होगा कि निकाल दिया जाऊंगा। दुकान खोल लूंगा। तुम्हारी मिट्टी खराब होगी। इस शरारत का मजा चखोगे। ओह! कैसा चकमा दिया है!
बहुत खुशामद और चिरौरी के बाद देवता सीधे हुए। प्रातःकाल नईम लूसी के बँगले पर पहुँचे। वहाँ मालूम हुआ कि वह प्रिंसिपल के बँगले पर गयी है। अब काटो, तो बदन में लहू नहीं। या अली, तुम्हीं मुश्किल को आसान करने वाले हो, अब जान की खैर नहीं। प्रिंसिपल ने सुना तो कच्चा ही खा जाएगा, नमक तक न माँगेगा। इस कमबख्त पंडित की बदौलत अजाब में जान फंसी, इस बेहूदे को सूझी क्या? चला नाजनीन से इश्क जताने! बनविलाव की-सी तो आपकी सूरत है और ख्ब्त यह कि यह माहरू मुझ पर रीझ गई। हमें भी अपने साथ डुबोए देता है। कहीं लूसी से रास्ते में मुलाकात हो गई, तो शायद आरजू-मिन्नत करने से मान जाए, लेकिन जो वहाँ पहुँच चुकी है, तो फिर कोई उम्मीद नहीं।
वह फिर पैरगाड़ी पर बैठे और बेतहाशा प्रिंसिपल के बँगले की तरफ भागे। ऐसे तेज जा रहे थे, मानो पीछे मौत आ रही है। जरा-सी ठोकर लगती, तो हड्डी-पसली चूर-चूर हो जाती। पर शोक! कहीं लूसी का पता नहीं। आधा रास्ता निकल गया और लूसी की गर्दन तक न नजर आई। नैराश्य ने गति को मन्द कर दिया। फिर हिम्मत करके चले। बँगले के द्वार पर भी मिल गई, तो जान बच जाएगी।
सहसा लूसी दिखाई दी। नईम ने पैरों को और भी तेज चलाना शुरू किया। वह प्रिंसिपल के बँगले के दरवाजे पर पहुँच चुकी थी। एक सेकंड में वारा-न्यारा होता था, नाव डूबती थी या पार जाती थी। हृदय उछल-उछलकर कंठ तक आ रहा था। जोर से पुकारा-मिस टरनर, हेलो मिस टरबर, जरा ठहर जाओ।
लूसी ने पीछे फिरकर देखा, नईम को पहचान कर ठहर गई और बोली- मुझसे उस पंडित की सिफारिश करने तो नहीं आये हो। मैं प्रिंसिपल से उसका शिकायत करने जा रही हूँ।
नईम- तो पहले मुझे और गिरिधर-दोनों को गोली मार दो, फिर जाना।
लूसी- बेहया लोगों पर गोली का असर नहीं होता। उसने मुझे बहुत इंसल्ट किया है।
नईम- लूसी, तुम्हारे कुसूरवार हमीं दोनों हैं। वह बेचारा पंडित तो हमारे हाथ का खिलौना था। सारी शरारत हम. लोगों की थी। कसम तुम्हारे सिर की।
लूसी- You naughty boy…
नईम- हम दोनों उसे दिल-बहलाव का एक स्वाँग बनाए हुए थे। इसकी हमें जरा भी खबर न थी कि वह तुम्हें छेड़ने लगेगा। हम तो समझते थे कि उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं है। खुदा के लिए माफ करो, वरना हम तीनों का खून तुम्हारी गर्दन पर होगा।
लूसी- खैर, तुम कहते हो तो प्रिंसिपल से न कहूंगी, लेकिन शर्त यह है कि पंडित मेरे सामने बीस मर्तबा कान पकड़ कर उठे-बैठे और मुझे कम से कम 200 रु. तावान दे।
नईम- लूसी, इतनी बेरहमी न करो। यह समझो, उस गरीब के दिल पर क्या गुजर रही होगी। काश, अगर तुम इतनी हसीन न होतीं।
लूसी मुस्कुराकर बोली- खुशामद करना कोई तुमसे सीख ले।
