unmaad by munshi premchand
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मनहर बूढ़ों की भांति हँसा- ‘मैं विलायत क्या करने जाता?’

‘अजी, तुमको वज़ीफ़ा नहीं मिला था? यहाँ से तुम विलायत गए थे। तुम्हारे पत्र बराबर आते थे। अब तुम कहते हो, मैं विलायत गया ही नहीं। होश में हो या हम लोगों को उल्लू बना रहे हो?’

मनहर ने उन लोगों की ओर आंखें फाड़कर देखा और बोला- ‘मैं तो कहीं नहीं गया था। आप लोग जाने क्या कह रहे हैं।’

अब इस सन्देह की गुँजाइश न रही कि वह अपने होश-हवास में नहीं है। विलायत जाने के पहले की सारी बातें याद थीं। गाँव और घर के हरेक आदमी को पहचानता था, सबसे नम्रता और प्रेम से बातें करता था, लेकिन जब इंग्लैंड, अंग्रेज बीवी और ऊँचे पद का जिक्र आता तो भौचक्का होकर ताकने लगता। वागेश्वरी को अब उसके प्रेम में एक अस्वाभाविक अनुराग दिखता था, जो बनावटी मालूम होता था। वह चाहती थी कि उसके व्यवहार और आचरण में पहले की-सी बेतकल्लुफ़ हो। वह प्रेम का स्वांग नहीं, प्रेम चाहती थी। पांच- दस ही दिनों में उसे ज्ञात हो गया कि इस विशेष अनुराग का कारण बनावट या दिखावा नहीं, कोई मानसिक विकार है। मनहर ने माँ-बाप का इतना अदब पहले कभी न किया था। उसे अब मोटे-से-मोटा काम करने में भी संकोच न था। वह, जो बाजार से साग-भाजी लाने में अपना अनादर समझता था, अब कुएँ से पानी खींचता, लकड़ियाँ फाड़ता और घर में झाडू लगाता था और अपने ही घर में नहीं, सारे मुहल्ले में उसकी सेवा और नम्रता की चर्चा होती थी।

एक बार मुहल्ले में चोरी हुई। पुलिस ने बहुत दौड़-धूप की, पर चोरों का पता न चला। मनहर ने चोरों का पता ही नहीं लगा दिया, बल्कि माल भी बरामद करा लिया। इससे आसपास के गाँवों और मुहल्लों में उसका यश फैल गया। कोई चोरी हो जाती, तो लोग उसके पास दौड़े आते और अधिकाँश उसके उद्योग सफल होते थे। इस तरह उसकी जीविका की एक व्यवस्था हो गई। अब वह वागेश्वरी के इशारों का गुलाम था। उसी की दिलजोई और सेवा में उसके दिन कटते थे। अगर उसमें विकार या बीमारी का कोई लक्षण था, तो इतना ही। यही सनक उसे सवार हो गई थी।

वागेश्वरी को उसकी दशा पर दुःख होता था, पर उसकी यह बीमारी उस स्वास्थ्य से उसे कहीं प्रिय थी, जब वह उसकी बात भी न पूछता था। छह महीनों के बाद एक दिन जेनी मनहर का पता लगाती हुई आ पहुँची। हाथ में जो कुछ था, वह सब उड़ा चुकने के बाद अब उसे किसी आश्रय की खोज थी। उसके चाहने वालों में कोई ऐसा न था, जो उसकी आर्थिक सहायता करता। शायद अब जेनी को कुछ ग्लानि भी होती थी। वह अपने किए पर लज्जित थी।

द्वार पर हॉर्न की आवाज सुनकर मनहर बाहर निकला और इस प्रकार जेनी को देखने लगा, मानो उसे कभी देखा ही नहीं।

जेनी ने मोटर से उतरकर उससे हाथ मिलाया और अपनी बीती सुनाने लगी- ‘तुम इस तरह मुझसे छिपकर क्यों चले आए? और फिर आकर एक पत्र भी नहीं लिखा। आखिर, मैंने तुम्हारे साथ क्या बुराई की थी? फिर मुझमें कोई बुराई देखी थी, तो तुम्हें चाहिए था कि मुझे सावधान कर देते। छिपकर चले आने से क्या फायदा हुआ? ऐसी अच्छी जगह मिल गई थी, वह हाथ से निकल गयी।’ मनहर काठ के उल्लू की भांति खड़ा रहा।

जेनी ने फिर कहा- ‘तुम्हारे चले आने के बाद मेरे ऊपर जो संकट आए, वह सुनाऊँ, तो तुम घबरा जाओगे। मैं इसी चिन्ता और दुःख से बीमार हो गई। तुम्हारे बगैर मेरा जीवन निरर्थक हो गया है। तुम्हारा चित्र देखकर मन को ढाढस देती थी। तुम्हारे पत्रों को आदि से अंत तक पढ़ना मेरे लिए सबसे मनोरंजक विषय था। तुम मेरे साथ चलो, मैंने एक डॉक्टर से बातचीत की है, वह मस्तिष्क के विकारों का डॉक्टर है। मुझे आशा है, उसके उपचार से तुम्हें लाभ होगा।’

मनहर चुपचाप विरक्त भाव से खड़ा रहा, मानो वह न कुछ देख रहा है, न सुन रहा है।

सहसा वागेश्वारी निकल आई। जेनी को देखते ही वह ताड़ गई कि यही मेरी यूरोपियन सौत है। वह उसे बड़े आदर-सत्कार के साथ भीतर ले गयी। मनहर भी उनके पीछे-पीछे चला गया।

जेनी ने टूटी खाट पर बैठते हुए कहा- ‘इन्होंने मेरा जिक्र तो तुमसे किया ही होगा। मेरी इनसे लंदन में शादी हुई है।’

वागेश्वरी बोली- ‘यह तो मैं आपको देखते ही समझ गई थी।’

जेनी- ‘इन्होंने कभी मेरा जिक्र नहीं किया?’

वागेश्वरी- ‘कभी नहीं। इन्हें तो कुछ याद ही नहीं। आपको तो यहाँ आने में बड़ा कष्ट हुआ होगा?’

जेनी- ‘महीनों के बाद इनके घर का पता चला। वहाँ से बिना कुछ कहे-सुने चल दिये।’

‘आपको कुछ मालूम है, इन्हें क्या शिकायत है?’

‘शराब बहुत पीने लगे थे। आपने किसी डॉक्टर को नहीं दिखाया?’

‘हमने तो किसी को नहीं दिखाया।’

‘जेनी ने तिरस्कार करके कहा- ‘क्यों? क्या आप इन्हें बीमार रखना चाहती हैं।’

वागेश्वरी ने बेपरवाही से जवाब दिया- ‘मेरे लिए इनका बीमार रहना, इनके स्वस्थ रहने से कहीं अच्छा है। तब वह अपनी आत्मा को भूल गए थे, अब उसे पा गए।’

फिर उसने निर्दय कटाक्ष करके कहा- ‘मेरे विचार में तो वह तब बीमार थे, अब स्वस्थ हैं।’

जेनी ने चिढ़ कर कहा- ‘नाननेंस! इनकी किसी विशेषज्ञ से चिकित्सा करानी होगी। यह जासूसी में बड़े कुशल हैं। इनके सभी अफसर इनसे प्रसन्न थे। यह चाहें तो अब भी इन्हें वह जगह मिल सकती है। अपने विभाग में ऊँचे-से-ऊँचे पद तक पहुँच सकते हैं। मुझे विश्वास है कि इनका रोग असाध्य नहीं है, हां विचित्र अवश्य है। आप क्या इनकी बहन हैं?’

वागेश्वरी ने मुस्कुराकर कहा- ‘आप तो गाली दे रही हैं। वह मेरे स्वामी हैं।’ जेनी पर मानो वज्रपात-सा हुआ। उसके मुख पर से नम्रता का आवरण हट गया और मन में छिपा क्रोध जैसे दाँत पीसने लगा। उसकी गर्दन की नसें तन गईं, दोनों मुट्ठियाँ बँध गईं। उन्मत्त होकर बोली- ‘बड़ा दगाबाज आदमी है। इसने मुझे बड़ा धोखा दिया। मुझसे इसने कहा था, मेरी स्त्री मर गई है। कितना बड़ा धूर्त है। यह पागल नहीं है। इसने पागलपन का स्वाँग भरा है। मैं अदालत से जाँच कराऊंगी।’

क्रोधावेश के कारण वह काँप उठी। फिर रोती हुई बोली- ‘इस दगाबाजी का मैं इसे मजा चखाऊंगी। इसने मेरा कितना घोर अपमान किया है। ऐसा विश्वासघात करने वाले को जो दण्ड दिया जाए, वह थोड़ा है। इसने कैसी मीठी-मीठी बातें करके मुझे फंसाया। मैंने ही इसे जगह दिलाई, मेरे ही प्रयत्नों से यह बड़ा आदमी बना। इसके लिए मैंने अपना घर छोड़ा, अपना देश छोड़ा और इसने मेरे साथ ऐसा कपट किया।’

जेनी सिर पर हाथ रखकर बैठ गई। फिर तैश में उठी और मनहर के पास जाकर उसको अपनी ओर खींचती हुई बोली- ‘मैं तुझे खराब करके छोडूंगी। तूने मुझे समझा क्या है।’

मनहर इस तरह शांत भाव से खड़ा रहा, मानो उससे कोई प्रयोजन नहीं।

फिर वह सिंहनी की भांति मनहर पर टूट पड़ी और उसे जमीन पर गिराकर उसकी छाती पर चढ़ बैठी। वागेश्वरी ने उसका हाथ पकड़कर अलग कर दिया और बोली- ‘तुम ऐसी डायन न होतीं, तो उनकी यह दशा ही क्यों होती?’

जेनी ने तैश में आकर जेब से पिस्तौल निकाला और वागेश्वरी की तरफ बढ़ी। सहसा मनहर तड़प कर उठा, उसके हाथ से भरा हुआ पिस्तौल छीनकर फेंक दिया और वागेश्वरी के सामने खड़ा हो गया। फिर ऐसा मुँह बना लिया, मानो कुछ हुआ ही नहीं।

उसी वक्त मनहर की माता दोपहरी की नींद सोकर उठीं और जेनी को देखकर वागेश्वरी की ओर प्रश्न की आंखों से ताका।

वागेश्वरी ने उपहास के भाव से कहा- ‘यह आपकी बहू है।’

बुढ़िया निकलकर बोली- ‘कैसी मेरी बहू? यह मेरी बहू बनने योग्य है बंदरिया? लड़के पर न जाने क्या कर-करा दिया, अब छाती पर मूँग दलने आई है?’ जेनी एक क्षण तक खून भरी आँखों से मनहर की ओर देखती रही। फिर बिजली की भांति-कूदकर उसने आंगन में पड़ा पिस्तौल उठा लिया और वागेश्वरी पर छोड़ना चाहती थी कि मनहर सामने आ गया। वह बेधड़क जेनी के सामने चला गया, उसके हाथ से पिस्तौल छीन लिया और अपनी छाती में गोली मार ली।