shikaar by munshi premchand
shikaar by munshi premchand

शोफ़र की आवाज़ सुनते ही कुँवर साहब निकल आये और पूछा-तुम यहाँ कैसे आये जी? कुशल तो है?

शोफ़र ने समीप आकर कहा-रानी साहब आयी हैं हुजूर! रास्ते में बुख़ार हो आया। बेहोश पड़ी हुई हैं।

कुँवर साहब ने वहीं खड़े, कठोर स्वर में पूछा-तो तुम उन्हें वापस क्यों न ले गये? क्या तुम्हें मालूम नहीं था, यहाँ कोई वैद्य-हकीम नहीं है?

शोफ़र ने सिटपिटाकर जवाब दिया-हुजूर वह किसी तरह मानती ही न थीं, तो मैं क्या करता?

कुँवर साहब ने डाँटा-चुप रहो जी, बातें न बनाओ! तुमने समझा होगा, शिकार की बहार देखेंगे और पड़े-पड़े सोयेंगे। तुमने वापस चलने को कहा ही न होगा।

शोफ़र-वह मुझे डाँटती थीं हुजूर!

‘तुमने कहा था?’

‘मैंने कहा तो नहीं हुजूर?’

‘बस तो चुप रहो। मैं तुमको ख़ूब पहचानता हूँ। तुम्हें मोटर लेकर इसी वक्त लौटना पड़ेगा। और कौन-कौन साथ हैं?’

शोफ़र ने दबी हुई आवाज़ में कहा-एक मोटर पर बिस्तर और कपड़े हैं। एक पर ख़ुद रानी साहब हैं।

‘यानी और कोई साथ नहीं है?’

‘हुजूर! मैं तो हुक्म का ताबेदार हूँ।’

‘बस, चुप रहो!’

‘यों झल्लाते हुए कुँवर साहब वसुधा के पास गये और आहिस्ता से पुकारा। जब कोई जवाब न मिला, तो उन्होंने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा। सिर गर्म तवा हो रहा था। उस ताप ने मानो उनकी सारी क्रोध-ज्वाला को खींच लिया। लपककर बँगले में आये, सोये हुए आदमियों को जगाया, पलंग बिछवाया, अचेत वसुधा को गोद में उठाकर कमरे में लाये और लिटा दिया। फिर उसके सिरहाने खड़े होकर उसे व्यथित नेत्रों से देखने लगे। उस धूल से भरे मुख-मंडल और बिखरे हुए रज-रंजित केशों में आज उन्होंने आग्रहमय प्रेम की झलक देखी। अब तक उन्होंने वसुधा को विलासिनी के रूप में देखा था, जिसे उनके प्रेम की परवाह न थी, जो अपने बनाव-सिंगार ही में मगन थी, आज धूल के पाउडर और पोमेड में वह उसके नारीत्व का दर्शन कर रहे थे। उसमें कितना आग्रह था। कितनी लालसा थी, अपनी उड़ान के आनंद में डूबी हुई; अब वह पिंजरे के द्वार पर आकर पंख फड़फड़ा रही थी। पिंजरे का द्वार खुलकर क्या उसका स्वागत न करेगा?

रसोइए ने पूछा-क्या सरकार अकेले आयी हैं?

कुँवर साहब ने कोमल कंठ से कहा-हाँ जी, और क्या। इतने आदमी हैं, किसी को साथ न लिया। आराम से रेलगाड़ी से आ सकती थीं। यहाँ से मोटर भेज दी जाती। मन ही तो है। कितने ज़ोर का बुख़ार है कि हाथ नहीं रखा जाता। ज़रा-सा पानी गर्म करो और देखो, कुछ खाने को बना लो।

रसोइए ने ठकुरसोहाती की-सौ कोस की दौड़ बहुत होती है सरकार! सारा दिन बैठे-बैठे बीत गया।

कुँवर साहब ने वसुधा के सिर के नीचे तकिया सीधा करके कहा-कचूमर तो हम लोगों का निकल जाता है। दो दिन तक कमर नहीं सीधी होती, फिर इनकी क्या बात है। ऐसी बेहूदा सड़क दुनिया में न होगी।

यह कहते हुए उन्होंने एक शीशी से तेल निकाला और वसुधा के सिर में मलने लगे।

वसुधा का ज्वर इक्कीस दिन तक न उतरा। घर के डॉक्टर आये। दोनों बालक, मुनिया, नौकर-चाकर, सभी आ गये। जंगल में मंगल हो गया।

वसुधा खाट पर पड़े-पड़े कुँवर साहब की शुश्रुषा में अलौकिक आनंद और संतोष का अनुभव किया करती। वह दोपहर दिन चढ़े तक सोने के आदी थे, कितने सवेरे उठते, उसके पथ्य और आराम की ज़रा-ज़रा-सी बातों का कितना ख़याल रखते। ज़रा देर के लिए स्नान और भोजन करने जाते, फिर आकर बैठ जाते। एक तपस्या-सी कर रहे थे। उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जाता था, चेहरे पर वह स्वास्थ्य की लाली न थी। कुछ व्यस्त-से रहते थे।

एक दिन वसुधा ने कहा-तुम आजकल शिकार खेलने क्यों नहीं जाते? मैं तो शिकार खेलने ही आयी थी, मगर न जाने किस बुरी साइत से चली कि तुम्हें इतनी तपस्या करनी पड़ गयी। अब मैं बिल्कुल अच्छी हूँ। ज़रा आईने में अपनी सूरत से देखो!

कुँवर साहब को इतने दिनों शिकार का कभी ध्यान ही न आया था। इसकी चर्चा ही न होती थी। शिकारियों का आना-जाना, मिलना-जुलना बंद था। एक बार साथ के एक शिकारी ने किसी शेर का ज़िक्र किया था। कुँवर साहब ने उसकी ओर कुछ ऐसी कड़वी आँखों से देखा कि वह सूख-सा गया। वसुधा के पास बैठने, उससे कुछ बातें करने, उसका मन बहलाने, दवा और पथ्य बनाने में उन्हें आनंद मिलता था। उनका भोग विलास जीवन के इस कठोर व्रत में जैसे बुझ गया। वसुधा की एक हथेली पर अँगुलियों से रेखा ख़ींचने में मग्न थे। शिकार की बात किसी और के मुँह से सुनी होती, तो फिर उन्हीं आग्नेय नेत्रों से देखते। वसुधा के मुँह से यह चर्चा सुनकर उन्हें दु:ख हुआ। वह उन्हें इतना शिकार का आसक्त समझती है! अमर्ष भरे स्वर में बोले-हाँ, शिकार खेलने का इससे अच्छा और कौन अवसर मिलेगा।

वसुधा ने आग्रह किया-मैं तो अब अच्छी हूँ, सच! देखो (आईने की ओर दिखाकर) मेरे चेहरे पर पीलापन नहीं रहा। तुम अलबत्ता बीमार-से होते जा रहे हो। ज़रा मन बहल जायेगा। बीमार के पास बैठने से आदमी सचमुच बीमार हो जाता है।

वसुधा ने तो साधारण-सी बात कही थी; पर कुँवर साहब के हृदय पर वह चिनगारी के सामान लगी। इधर वह अपने शिकार के ख़ब्त पर कई बार पछता चुके थे। अगर वह शिकार के पीछे यों न पड़ते, तो वसुधा यहाँ क्यों आती और क्यों बीमार पड़ती? उन्हें मन-ही-मन इसका बड़ा दु:ख था। इस वक्त कुछ न बोले। शायद कुछ बोला ही न गया। फिर वसुधा की हथेली पर रेखाएँ बनाने लगे।

वसुधा ने उसी सरल भाव से कहा-अब की तुमने क्या-क्या तोहफ़े जमा किये, ज़रा मँगाओ, देखूँ। उनमें से जो सबसे अच्छा होगा, उसे मैं ले लूँगी। अबकी मैं भी तुम्हारे साथ शिकार खेलने चलूँगी। बोलो, मुझे ले चलोगे न? मैं मानूँगी नहीं। बहाने मत करने लगना।

अपने शिकारी तोहफ़े दिखाने का कुँवर साहब को मरज था। सैकड़ों ही खाले ज़मा कर रखी थीं। उनके कई कमरों में फ़र्श, गद्दे, कोच, कुर्सियाँ, मोढ़े सब खालों ही के थे। ओढ़ना और बिछौना भी खालों ही का था। बाघम्बरों के कई सूट बनवा रखे थे। शिकार में वही सूट पहनते थे। अबकी भी बहुत से सींग, सिर, पंजे, खालें जमा कर रखी थीं। वसुधा का इन चीज़ों से अवश्य मनोरंजन होगा। यह न समझे कि वसुधा ने सिंहद्वार से प्रवेश न पाकर चोर दरवाजे से घुसने का प्रयत्न किया है। जाकर वह चीज़ें उठवा लाये; लेकिन आदमियों को परदे की आड़ में खड़ा करके पहले अकेले ही उसके पास गये! डरते थे, कहीं मेरी उत्सुकता वसुधा को बुरी न लगे।

वसुधा ने उत्सुक होकर पूछा-चीज़ें लाये?

‘लाया हूँ, मगर कहीं डॉक्टर साहब न आ जायें?’

‘डॉक्टर ने पढ़ने-लिखने को मना किया था।’

तोहफ़े लाये गये। कुँवर साहब एक-एक चीज़ निकालकर दिखाने लगे। वसुधा के चेहरे पर हर्ष की ऐसी लाली हफ़्तों से न दिखी थी, जैसे कोई बालक तमााशा देखकर मग्न हो रहा है। बीमारी के बाद हम बच्चों की तरह ज़िद्दी, उतने ही आतुर, उतने ही सरल हो जाते हैं। जिन किताबों में कभी मन न लगा हो, वह बीमारी के बाद पढ़ी जाती हैं। वसुधा जैसे उल्लास की गोद में खेलने लगी। शेरें की ख़ालें थीं, बाघों की, मृगों की, शूकरों की। वसुधा हर खाल को नयी उमंग से देखती, जैसे बायस्कोप के एक चित्र के बाद दूसरा आ रहा हो, कुँवर साहब एक-एक तोहफ़े का इतिहास सुनाने लगे। यह जानवर कैसे मारा गया, उसके मारने में क्या-क्या बाधाएँ पड़ीं, क्या-क्या उपाय करने पड़े, पहले कहाँ गोली लगी आदि। वसुधा हरेक की कथा आँखें फाड़-फाड़कर सुन रही थी। इतनी सजीवता, स्फूर्ति, आनन्द उसे आज तक किसी कविता, संगीत या आमोद में भी न मिला था। सबसे सुन्दर एक सिंह की खाल थी। यही उसने छाँटी!

कुँवर साहब की यह सबसे बहुमूल्य वस्तु थी। इसे अपने कमरे में लटकाने को रखे हुए थे। बोले-तुम बाघम्बरों में से कोई ले लो। यह तो कोई अच्छी चीज़ नहीं है।

वसुधा ने खाल को अपनी ओर खींचकर कहा-रहने दीजिए अपनी सलाह। मैं ख़राब ही लूँगी।

कुँवर साहब ने जैसे अपनी आँखों से आँसू पोंछकर कहा-तुम वही ले लो, मैं तुम्हारे ख़याल से कह रहा था। मैं फिर वैसे ही मार लूँगा।

‘तो तुम मुझे चकमा क्यों देते थे?’

‘चकमा कौन देता था?’

‘अच्छा खाओ मेरे सिर की क़सम, कि यह सबसे सुन्दर खाल नहीं है?’ कुँवर साहब ने हार की हँसी हँसकर कहा-क़सम क्यों खाएँ, इस एक खाल के लिए? ऐसी-ऐसी एक लाख खालें हों, तो तुम्हारे ऊपर न्योछावर कर दूँ।

जब शिकारी सब खालें लेकर चला गया, तो कुँवर साहब ने कहा-मैं इस खाल पर काले ऊन से अपना समर्पण लिखूँगा।

वसुधा ने थकान से पलँग पर लेटते हुए कहा-अब मैं भी शिकार खेलने चलूँगी।

फिर वह सोचने लगी, वह भी कोई शेर मारेगी और उसकी खाल पतिदेव को भेंट करेगी। उस पर लाल ऊ से लिखा जायेगा-प्रियतम!

जिस ज्योति के मंद पड़ जाने से हरेक व्यापार, हरेक व्यंजन पर अंधकार-सा छा गया था, वह ज्योति अब प्रदीप्त होने लगी थी।’