Shaap by Munshi Premchand
Shaap by Munshi Premchand

ऐ मुसाफिर यह शुभकामना विद्याधरी के अंतःस्थल से निकली थी। मैं उसके मुँह से यह आशीर्वाद सुन कर फूली न समायी। मुझे विश्वास हो गया कि अबकी बार जब मैं अपने मकान पर पहुँचूँगी तो पतिदेव मुस्कराते हुए मुझसे गले मिलने के लिए द्वार पर आयेंगे। इस विचार से मेरे हृदय में गुदगुदी-सी होने लगी। मैं शीघ्र ही स्वदेश को चल पड़ी। उत्कंठा मेरे कदम बढ़ाये जाती थी। मैं दिन में भी चलती और रात को भी चलती मगर पैर थकना ही न जानते थे। यह आशा कि वह मोहिनी मूर्ति द्वार पर मेरा स्वागत करने के लिए खड़ी होगी मेरे पैरों में पर-से लगाये हुए थी। एक महीने की मंजिल मैंने एक सप्ताह में तय की। पर शोक ! जब मकान के पास पहुँची तो उस घर को देख कर दिल बैठ गया और हिम्मत न पड़ी कि अंदर कदम रखूँ। मैं चौखट पर बैठ कर देर तक विलाप करती रही। न किसी नौकर का पता न कहीं पाले हुए पशु ही दिखायी देते थे। द्वार पर धूल उड़ रही थी। जान पड़ता था कि पक्षी घोंसले से उड़ गया है कलेजे पर पत्थर की सिल रख कर भीतर गयी तो क्या देखती हूँ कि मेरा प्यारा सिंह आँगन में मोटी-मोटी जंजीरों से बँधा हुआ है। इतना दुर्बल हो गया है कि उसके कूल्हों की हड्डियाँ दिखायी दे रही हैं। ऊपर-नीचे जिधर देखती थी उजाड़-सा मालूम होता था। मुझे देखते ही शेरसिंह ने पूँछ हिलायी और सहसा उनकी आँखें दीपक की भाँति चमक उठीं। मैं दौड़कर उनके गले से लिपट गयी समझ गयी कि नौकरों ने दगा की। घर की सामग्रियों का कहीं पता न था। सोने-चाँदी के बहुमूल्य पात्र फर्श आदि सब गायब थे। हाय ! हत्यारे मेरे आभूषणों का संदूक भी उठा ले गये। इस अपहरण ने मुसीबत का प्याला भर दिया। शायद पहले उन्होंने शेरसिंह को जकड़ कर बाँध दिया होगा फिर खूब दिल खोल कर नोच-खसोट की होगी। कैसी विडम्बना थी कि धर्म लूटने गयी थी और धन लुटा बैठी। दरिद्रता ने पहली बार अपना भयंकर रूप दिखाया।

ऐ मुसाफिर! इस प्रकार लुट जाने के बाद वह स्थान आंखों में कांटे की तरह खटकने लगा। यही वह स्थान था, जहां हमने आनंद के दिन काटे थे। इन्हीं क्यारियों में हमने सूर्यों की भांति कलोल किये थे। प्रत्येक वस्तु से कोई-न-कोई स्मृति संबंधित थी। उन दिनों की याद करके आंखों से रक्त के आंसू बहने लगे थे।। बसंत की ऋतु थी, बौर की महक से वायु सुगंधित हो रही थी। महुआ के वृक्षों के नीचे परियों के शयन करने के लिए मोतियों की शय्या बिछाई हुई थी, करौंदा और नींबू के फूलों की सुगंध से चित्त प्रसन्न हो जाता था। मैंने अपने जन्म-भूमि को सदैव के लिए त्याग दिया। मेरी आंखों से आंसुओं की एक बूंद भी न गिरी। जिस जन्म-भूमि की याद यावज्जीवन हृदय को व्यथित करती है उससे मैंने यूं मुंह मोड़ लिया, मानों कोई बंदी कारागार से मुक्त हो जाये। एक सप्ताह तक मैं चारों ओर भ्रमण करके अपने भावी निवास-स्थान का निश्चय करती रही। अन्त में सिंधु बदी के किनारे एक निर्जन स्थान मुझे पसंद आया। यहाँ एक प्राचीन मंदिर था। शायद किसी समय वहाँ देवताओं का वास था पर इस समय वह बिलकुल उजाड़ था। देवताओं ने काल को विजय किया हो पर समय चक्र को नहीं। शनैः-शनैः मुझे इस स्थान से प्रेम हो गया और वह स्थान पथिकों के लिए धर्मशाला बन गया।

मुझे यहाँ रहते तीन वर्ष व्यतीत हो चुके थे। वर्षा ऋतु में एक दिन संध्या के समय मुझे मंदिर के सामने से एक पुरुष घोड़े पर सवार जाता दिखायी दिया। मंदिर से प्रायः दो सौ गज की दूरी पर एक रमणीक सागर था उसके किनारे कचनार वृक्षों के झुरमुट थे। वह सवार उस झुरमुट में जा कर अदृश्य हो गया। अंधकार बढ़ता जाता था। एक क्षण के बाद मुझे उस ओर किसी मनुष्य का चीत्कार सुनायी दिया फिर बंदूकों के शब्द सुनायी दिये और उनकी ध्वनि से पहाड़ गूँज उठा।

ऐ मुसाफिर- यह दृश्य देखकर मुझे किसी भीषण घटना का संदेह हुआ। मैं तुरन्त उठ खड़ी हुई। एक कटार हाथ में ली और उस सागर की ओर चल दी।

अब मूसलाधार वर्षा होने लगी थी, मानों आज के बाद फिर न बरसेंगे। रह-रहकर गर्जन की ऐसी भयंकर ध्वनि उठती थी, मानों सारे पहाड़ आपस में टकरा गये हों। अंधकार का ऐसा हाल हुआ था मानों सहस्रों अमावस्या की रातें गले मिल रही हों। मैं कमर तब पानी में चलते दिल को सम्हाले हुए आगे बढ़ी जाती थी। अन्त में सागर के समीप आ पहुंची। बिजली की चमक ने दीपक का काम किया। सागर के किनारे एक बड़ी सी गुफा थी। इस समय उस गुफा में से प्रकाश-ज्योति बाहर आती हुई दिखायी देती थी। मैंने भीतर की ओर झांका तो क्या देखती हूं कि एक स्त्री आग्नेय नेत्रों से घूर-घूर कर कह रही है, मैं अपने पति के साथ उसे भी जलाकर भस्म कर दूंगी। मेरे कौतूहल की कोई सीमा न रही। मैंने सांस बंद कर ली और हतबुद्धि की भांति यह कौतुक देखने लगी। उस स्त्री के सामने एक रक्त से लिपटी हुई लाश पड़ी थी और लाश के समीप ही मनुष्य रस्सियों से बंधा हुआ सिर झुकाये बैठा था। मैंने अनुमान किया कि यह वही अश्वारोही पथिक है, जिस पर इन डाकुओं ने आघात किया था। यह शव डाकू सरदार का है और यह स्त्री डाकू की पत्नी है। उसके सिर के बाल बिखरे हुए थे और आंखों से अंगारे निकल रहे थे। हमारे चित्रकारों ने क्रोध को पुरुष कल्पित किया है। मेरे विचार में स्त्री का क्रोध इससे कहीं अधिक घातक, कहीं, विध्वंसकारी होता है। क्रोधोन्मत्त होकर वह कोमलांगी सुन्दरी ज्वाला शिखर बन जाती है।

उस स्त्री ने दांत पीसकर कहा, मैं अपने पति के साथ इसे भी जला कर भस्म कर दूंगी। कहकर उसने उस रस्सियों से बंधे हुए पुरुष को घसीटा और दहकती हुई चिता में डाल दिया। आह! कितना भयंकर! कितना रोमांचकारी दृश्य था। स्त्री भी अपने द्वेष की अग्नि शांत करने में इतनी पिशाचिनी हो सकती है। मेरा रक्त खौलने लगा। अब एक क्षण भी विलम्ब करने का अवसर न था। मैंने कटार खींच ली, डाकू चौंक कर तितर-बितर हो गये। समझे मेरे साथ और लोग भी होंगे। मैं बेधड़क चिता में घुस गयी और क्षणमात्र में उस अभागे पुरूष को आग के मुख से निकाल लायी। अभी केवल उसके वस्त्र ही जले थे। जैसे सर्प अपना शिकार छिन जाने से फुफकारता हुआ लपकता है? उसी प्रकार गरजती हुई लपटें मेरे पीछे दौड़ी। ऐसा प्रतीत होता था अग्नि भी उसके रक्त की प्यासी हो रही थी।

इतने में डाकू संभल गये और आहत सरदार की पत्नी पिशाचिनी की भांति मुंह खोले मुझ पर झपटी। संभव था कि ये हत्यारे मेरी बोटियां न कर दें कि इतने में गुफा के द्वार पर पर मेघ गर्जन की-सी आवाज सुनाई दी और शेरसिंह रौद्र रूप धारण किये हुए भीतर पहुंचे। उनका भयंकर रूप देखते ही डाकू अपनी-अपनी जान लेकर भागे। केवल डाकू सरदार की पत्नी स्तम्भित-सी अपने स्थान पर खड़ी रही। एकाएक उसने अपने पति का शव उठाया और उसे लेकर चिता में बैठ गयी। देखते-देखते उसका भयंकर रूप अग्निज्वाला में विलीन हो गया। अब मैंने उस बंधे हुए मनुष्य की ओर देखा तो मेरा हृदय उछल पड़ा। यह पंडित श्रीधर थे। मुझे देखते ही सिर झुका लिया और रोने लगे। मैं उनसे समाचार पूछ ही रही थी कि उसी गुफा के एक कोने से किसी के कराहने का शब्द सुनायी दिया जाकर देखा तो एक सुंदर युवक रक्त से लथपथ पड़ा था। मैंने उसे देखते ही पहचान लिया। उसका पुरुष-वेश उसे छिपा न सका। यह विद्याधरी थी। मर्दों के वस्त्र उस पर खूब जंचते थे। वह लज्जा और ग्लानि की मूर्ति बनी हुई थी। वह पैरों पर गिर पड़ी, पर मुंह से कुछ न बोली।

उस गुफा में पल भर ही ठहरना अत्यंत शंकाप्रद था। न जाने कब डाकू फिर सशस्त्र होकर आ जायें। उधर चिताग्नि भी शांत होने लगी और उस सती की भी भीषण काया अत्यंत तेज रूप धारण करके हमारे नेत्रों के सामने तांडव क्रीड़ा करने लगी। मैं बड़ी चिंता में पड़ी कि इन दोनों प्राणियों को कैसे यहां से निकालें। दोनों ही रक्त से चूर थे। शेरसिंह ने मेरा असमंजस ताड़ लिया। रूपांतर हो जाने के बाद उनकी बुद्धि तीव्र हो गयी थी। उन्होंने मुझे संकेत किया कि दोनों को हमारी पीठ पर बिठा दो। पहले तो मैं उनका आशय न समझी, पर जब उन्होंने संकेत को बार-बार दुहराया तो मैं समझ गयी। गूंगों के घरवाले गूंगों की बातें खूब समझते हैं। मैंने पंडित श्रीधर को गोद में उठाकर शेरसिंह की पीठ पर बिठा दिया। उसके पीछे विद्याधरी को थी बिठाया। नन्हा बालक भालू की पीठ पर बैठकर जितना डरता है, उससे कहीं ज्यादा यह दोनों प्राणी भयभीत हो रहे थे। चिताग्नि के क्षीण प्रकाश में उनके भय-विकृत मुख देखकर करुण विनोद होता था। अस्तु मैं इन दोनों प्राणियों को साथ लेकर गुफा से निकली और फिर उसी तिमिर-सागर को पार करके मंदिर आ पहुंची।

मैंने एक सप्ताह तक उनका यहां यथाशक्ति सेवा-सत्कार किया। जब वह भली-भांति स्वस्थ हो गये तो मैंने उन्हें विदा किया। ये स्त्री-पुरुष कई आदमियों के साथ टेढ़ी जा रहे थे, यहां के राजा पंडित श्रीधर के शिष्य है। पंक्ति श्रीधर का घोड़ा आगे था। विद्याधरी अभ्यास न होने के कारण पीछे थी, उनके दोनों रक्षक भी उनके साथ थे। जब डाकुओं ने पंडित श्रीधर को घेरा और पंडित ने पिस्तौल से डाकू सरदार को मार गिराया तो कोलाहल सुनकर विद्याधरी ने घोड़ा बढ़ाया। दोनों रक्षक तो जान लेकर भागे, विद्याधरी को डाकुओं ने पुरुष समझकर घायल कर दिया और तब दोनों प्राणियों को बांधकर गुफा में डाल दिया। शेष बातें मैंने अपनी आंखों देखी। यद्यपि यहां से विदा होते समय विद्याधरी का रोम-रोम मुझे आशीर्वाद दे रहा था। पर हां! अभी प्रायश्चित्त पूरा न हुआ था। इतना आत्म-समर्पण करके भी मैं सफल मनोरथ न हुई थी।

ऐ मुसाफिर! उस प्रांत में अब मेरा रहना कठिन हो गया। डाकू बंदूकें लिए हुए शेरसिंह की तलाश में घूमने लगे। विवश होकर एक दिन मैं वहां से चल खड़ी हुई और दुर्गम पर्वतों को पार करती हुई यहां आ निकली। यह स्थान मुझे ऐसा पसंद आया कि मैंने इस मुकाम को अपना घर बना लिया है। आज पूरे तीन वर्ष गुजरे जब मैंने पहले-पहल ज्ञानसरोवर के दर्शन किये। उस समय भी यही ऋतु थी। मैं ज्ञानसरोवर में पानी भरने गयी हुई थी, सहसा क्या देखती हूं कि एक युवक मुश्की घोड़े पर सवार रत्न जटिल आभूषण पहने हाथ में चमकती हुआ माला लिए चला आता है। शेरसिंह को देखकर वह ठिठका और भाला सम्भाल कर उन पर वार कर बैठा। शेरसिंह को क्रोध आया। उनके गरज की ऐसी गगनभेदी ध्वनि उठी कि ज्ञानसरोवर का जल आंदोलित हो गया और तुरन्त घोड़े से खींचकर उसकी छाती पर पंजे रख दिये। मैं घड़ा छोड़कर दौड़ी। युवक का प्राणांत होने वाला ही था कि मैंने शेरसिंह के गले में हाथ डाल दिये और उनका सिर सहला कर क्रोध शांत किया। मैंने उनका ऐसा भयंकर रूप कभी नहीं देखा था। मुझे स्वयं उनके पास जाते हुए डर लगता था, पर मेरे मृदु वचनों ने अंत में उन्हें वशीभूत कर लिया, वह अलग खड़े हो गये। युवक की छाती में गहरा घाव लगा था। उसे मैंने इसी गुफा में लाकर रखा और उसकी मरहम-पट्टी करने लगी। एक दिन मैं कुछ आवश्यक वस्तुएं लेने के लिए उस कस्बे में गयी जिसके मंदिर के कलश यहां से दिखायी दे रहे हैं, मगर वहां सब दुकानें बंद थी। बाजारों में खाक उड़ रही थी। चारों ओर सियापा छाया हुआ था। मैं बहुत देर तक इधर-उधर घूमती रही, किसी मनुष्य की सूरत भी न दिखायी देती थी कि उससे वहां का सब समाचार पूछूं। ऐसा विदित होता था, मानो यह अदृश्य जीवों की बस्ती है। सोच रही थी कि वापस चलूं कि घोड़ों की टापों की ध्वनि कानों में आयी और एक क्षण में एक स्त्री सिर से पैर तक काले वस्त्र धारण किये, एक काले घोड़े पर सवार आती हुई दिखायी दी। उसके पीछे कई सवार और प्यादे काली वर्दियां पहने आ रहे थे। अकस्मात् उस सवार स्त्री की दृष्टि मुझ पर पड़ी। उसने घोड़े को ऐड़ लगायी और मेरे निकट आकर कर्कश स्वर में बोली, ‘तू कौन है?’ मैंने निर्भीक स्वर से उत्तर दिया, ‘मैं झानसरोवर के तट पर रहती हूं। यहां बाजार में कुछ सामग्रियां लेने आयी थी, किंतु शहर में किसी का पता नहीं। उस स्त्री ने पीछे की ओर देखकर कुछ संकेत किया और दो सवारों ने आगे बढ़कर मुझे पकड़ लिया और मेरी बांहों में रस्सियां डाल दीं। मेरे समझ में न आता था कि मुझे किस अपराध का दंड दिया जा रहा है। बहुत पूछने पर भी किसी ने मेरे प्रश्नों का उत्तर न दिया। हां, अनुमान से यह प्रकट हुआ कि वह स्त्री यहां की रानी है। मुझे अपने विषय में तो कोई चिंता न थी। पर चिंता थी। शेरसिंह की वह अकेले घबरा रहे होंगे। भोजन का समय आ पहुँचा कौन खिलावेगा। किस विपत्ति में फँसी। नहीं मालूम विधाता अब मेरी क्या दुर्गति करेंगे। मुझ अभागिन को इस दशा में भी शांति नहीं। इन्हीं मलिन विचारों में मग्न मैं सवारों के साथ आध घंटे तक चलती रही कि सामने एक ऊँची पहाड़ी पर एक विशाल भवन दिखायी दिया। ऊपर चढ़ने के लिए पत्थर काट कर चौड़े जीने बनाये गये थे। हम लोग ऊपर चढ़े। वहाँ सैकड़ों ही आदमी दिखायी दिये किंतु सब-के-सब काले वस्त्र धारण किए हुए थे। मैं जिस कमरे में ला कर रखी गयी वहाँ एक कुशासन के अतिरिक्त सजावट का और सामान न था। मैं जमीन पर बैठ कर अपने नसीब को रोने लगी। जो कोई यहाँ आता था मुझ पर करुण दृष्टिपात करके चुपचाप चला जाता था। थोड़ी देर में रानी साहब आ कर उसी कुशासन पर बैठ गयीं। यद्यपि उनकी अवस्था पचास वर्ष से अधिक थी परन्तु मुख पर अद्भुत कांति थी। मैंने अपने स्थान से उठ कर उनका सम्मान किया और हाथ बाँध कर अपनी किस्मत का फैसला सुनने के लिए खड़ी हो गयी।

ऐ मुसाफिर! रानी महोदया के तेवर देखकर पहले तो मेरे प्राण सूख गये, किंतु जिस प्रकार चंदन जैसी कठोर वस्तु में मनोहर सुगंध छिपी होती है, उसी प्रकार उनकी कर्कशता और कठोरता के पीछे मोम के सदृश हृदय छिपा हुआ था। उनका प्यारा पुत्र थोड़े ही दिन पहले युवावस्था ही में दगा दे गया था। उसी के शोक में सारा शहर मातम मना रहा था। मेरे पकड़े जाने का कारण यह था कि मैंने काले वस्त्र क्यों न धारण किए थे। यह वृत्तांत सुनकर मैं समझ गई कि जिस राजकुमार का शोक मनाया जा रहा है, यह वही युवक है जो मेरी गुफा में पड़ा हुआ है। मैंने उनसे पूछा, ‘राजकुमार मुश्की घोड़े पर तो सवार नहीं थे?’

रानी – ‘हां, हां मुश्की घोड़ा था। उसे मैंने उनके लिए अरब देश से मंगवा दिया था। क्या तूने उन्हें देखा है?’

मैंने – ‘हां देखा है।’

रानी ने पूछा – ‘कब?’

मैंने – ‘जिस दिन वह शेर का शिकार खेलने गए थे।’

रानी – ‘क्या तेरे सामने ही शेर ने उन पर चोट की थी?’

मैंने – ‘हां, मेरी आंखों के सामने?’

रानी उत्सुक होकर खड़ी हो गई और बड़े दीन भाव से बोली – ‘तू उनकी लाश का पता लगा सकती है?’

मैंने – ‘ऐसा न कहिए, वह अमर हों। वह दो सप्ताह से मेरे यहां मेहमान हैं।’

रानी हर्षमय आश्चर्य से बोली – ‘मेरा रणधीर जीवित है।’

मैंने – ‘हां, अब उनमें चलते-फिरने की शक्ति आ गई है।’

रानी मेरे पैरों पर गिर पड़ी।

तीसरे दिन अर्जुन नगर की कुछ और ही शोभा थी। वायु आनंद के मधुर स्वर में गूंजती थी दुकानों ने फूलों का हार पहना था, बाजारों में आनंद के उत्सव मनाए जा रहे थे। शोक के काले वस्त्रों की जगह केसर का सुहावना रंग बधाई दे का था। इधर सूर्य ने उषा-सागर से सिर निकाला, उधर सलामियां दगना आरम्भ हुईं। आगे-आगे मैं एक सब्जा घोड़े पर सवार आ रही थी और पीछे राजकुमार का हाथी सुनहरे झूलों से सजा चला आता था। स्त्रियां अटारियों पर मंगल गीत गाती थी और पुष्पों की वृष्टि करती थीं। राज भवन के द्वार पर रानी मोतियों से आंचल-भरे खड़ी थी, ज्यों ही राजकुमार हाथी से उतरे, वह उसे गोद में लेने के लिए दौड़ी और छाती से लगा लिया।

ऐ मुसाफिर! आनंदोत्सव समाप्त होने पर जब मैं विदा होने लगी, तो रानी महोदया ने सजल नयन होकर कहा, ‘बेटी तूने मेरे साथ जो उपकार किया है उसका फल तुझे भगवान देंगे। तूने मेरे राज-वंश का उद्धार कर दिया, नहीं तो कोई पितरों को जल देने वाला भी न रहता। मैं तुझे कुछ विदाई देना चाहती हूं, वह तुझे स्वीकार करनी पड़ेगी। अगर रणधीर मेरा पुत्र है, तू मेरी पुत्री है। तूने ही रणधीर को प्राणदान दिया है, तूने ही इस राज्य का पुनरुद्धार किया है। इसलिए इस माया-बंधन से तेरा गला नहीं छूटेगा। मैं अर्जुन नगर का प्रान्त उपहार-स्वरूप तेरी भेंट करती हूं।’

रानी की यह असीम उदारता देखकर मैं दंग रह गई। कलियुग में भी कोई ऐसा दानी हो सकता है, इसकी मुझे आशा न थी। यद्यपि मुझे धन-भोग की लालसा न थी, पर केवल इस विचार से, कदाचित् यह सम्पत्ति मुझे अपने भाइयों की सेवा करने में सामर्थ्य दे, मैंने एक जागीरदार की जिम्मेदारियां अपने सिर ली। तब से दो वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, पर भोग-विलास ने मेरे मन को एक क्षण के लिए भी चंचल नहीं किया। मैं कभी पलंग पर नहीं सोयी। रूखी-सूखी वस्तुओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं खाया। पति-वियोग की दशा में स्त्री तपस्विनी हो जाती है, उसकी वासनाओं का अन्त हो जाता है, मेरे पास कई विशाल भवन हैं, कई रमणीक वाटिकाएं है, विषय-वासना में ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो प्रचुर मात्रा में उपस्थित न हो, पर मेरे लिए वह सब त्याज्य है। भवन सूने पड़े हैं और वाटिकाओं में खोजने से ही हरियाली न मिलेगी। मैंने उनकी ओर कभी आंखें उठाकर भी नहीं देखा। अपने प्राणाधार के चरणों से लगे हुए मुझे अन्य किसी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं नित्य प्रति अर्जुन-नगर जाती हूं और रियासत के आवश्यक काम-काज करके लौट आती हूं। मैं उसकी कौड़ी भी अपने खर्च में नहीं लाती। आपको अवकाश हो तो आप मेरी रियासत का प्रबन्ध देखकर प्रसन्न होंगे। मैंने इन दो वर्षों में बीस बड़े-बड़े तालाब बनवा दिए हैं और चालीस गोशाला बनवा दी हैं। मेरा विचार है कि अपनी रियासत में नहरों का ऐसा जाल बिछा दूं जैसे शरीर में नाड़ियों का। मैंने एक सौ कुशल वैद्य नियुक्त कर दिए हैं जो रोग की निवृत्ति करें। मेरा कोई ग्राम नहीं है जहां मेरी ओर से सफाई का प्रबंध न हो। छोटे-छोटे गांवों में भी आपको लालटेन जलती हुई मिलेंगी। दिन का प्रकाश ईश्वर देता है, रात के प्रकाश की व्यवस्था करना राजा का कर्तव्य है। मैंने सारा प्रबंध पण्डित श्रीधर के हाथों में दे दिया है। सबसे प्रथम कार्य जो मैंने किया, वह था कि उन्हें ढूंढ निकालूं, और यह भार सिर रख दूं। इस विचार से नहीं उनका सामना करना मेरा अभीष्ट था, बल्कि मेरी दृष्टि में कोई अन्य पुरुष ऐसा कर्त्तव्य-परायण, ऐसा निस्पृह, ऐसा सच्चरित्र न था। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह यावज्जीवन रियासत की बागडोर अपने हाथ में रखेंगे। विद्याधरी भी उनके साथ है। वही शांति और संतोष की मूर्ति, वहीं धर्म और सत की देवी। उसका पतिव्रत अब भी ज्ञानसरोवर की भांति अपार और अथाह है। यद्यपि उसका सौंदर्य-सूर्य मध्याह्न पर नहीं है, पर अब भी वह रनिवास की रानी जान पड़ती है। चिन्ताओं ने उसके मुख पर शिकन डाल दिए हैं। हम दोनों कभी-कभी मिल जाती हैं। किंतु बातचीत की नौबत नहीं आती। उसकी आंखें झुक जाती हैं। मुझे देखते ही उसके ऊपर घड़ों पानी पड़ जाता है और उसके माथे के जलबिंदु दिखाई देने लगते हैं। मैं आपसे सत्य कहती हूं कि मुझे विद्याधरी से कोई शिकायत नहीं है। उसके प्रति मेरे मन में दिनोंदिन श्रद्धा-भक्ति बढ़ती जाती है। मैं उसे देखती हूं तो मुझे प्रबल उत्कंठा होती है कि उसके पैरों पर पड़ू। पतिव्रता स्त्री के दर्शन बड़े सौभाग्य से मिलते हैं। पर केवल इस भय से कि कदाचित वह इसे मेरी खुशामद समझे, रुक जाती हूं। अब मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अपने स्वामी के चरणों में पड़ी रहूं और जब इस संसार से प्रस्थान करने का समय आए तो मेरा मस्तक उनके चरणों पर हो और अन्तिम जो शब्द मेरे मुंह से निकले वह यही कि, ईश्वर, दूसरे जन्म में भी मुझे इनकी चेरी बनाना।’

पाठक, उस सुन्दरी का जीवन-वृत्तांत सुनकर मुझे जितना कुतूहल हुआ वह अकथनीय है। खेद है कि जिस जाति में ऐसी प्रतिभाशाली देवियां उत्पन्न हों उस पर पाश्चात्य के कल्पनाहीन, विश्वासहीन, पुरुष उंगलियां उठाएं? समस्त यूरोप में एक ऐसी सुंदरी न होगी जिससे इसकी तुलना की जा सके। हमने स्त्री-पुरुष के संबंध को सांसारिक संबंध समझ रखा है। उसका आध्यात्मिक रूप हमारे विचार से कोसों दूर है। यही कारण है कि हमारे देश में शताब्दियों की उन्नति के पश्चात् भी पतिव्रता का ऐसा उज्ज्वल और अलौकिक उदाहरण नहीं मिल सकता और दुर्भाग्य से हमारी सभ्यता ने ऐसा मार्ग ग्रहण किया। है कि कदाचित् दूर भविष्य में ऐसी देवियों के जन्म लेने की संभावना नहीं है। जर्मनी को यदि अपनी सेना पर, फ्रांस को अपनी विलासिता पर और इंग्लैंड को अपने वाणिज्य पर गर्व है तो भारतवर्ष को अपने पतिव्रत का घमण्ड है। क्या यूरोप निवासियों के लिए यह लज्जा की बात नहीं है कि होमर और वर्जित डंटे और गटे, शेक्सपियर और ह्यूगो जैसे उच्चकोटि के कवि एक भी सीता या सावित्री की रचना न कर सकें। वास्तव में यूरोपीय समाज ऐसे आदर्शों से वंचित है।

मैंने दूसरे दिन ज्ञानसरोवर से बड़ी अनिच्छा के साथ विदा मांगी और यूरोप को चला। मेरे लौटने का समाचार पूर्व ही प्रकाशित हो चुका था। अब मेरा जहाज हैम्पवर्ग के बन्दरगाह में पहुंचा तो सहस्रों नर-नारी, सैकड़ों विद्वान और राज कर्मचारी मेरा अभिवादन करने के लिए खड़े थे। मुझे देखते ही तालियां बजने लगी, रूमाल और टोपी हवा में उछलने लगे और यहां से मेरे घर तक जिस समारोह से जुलूस निकला उस पर किसी राष्ट्रपति को भी गर्व हो सकता है। संध्या समय मुझे कैसर की मेज़ पर भोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कई दिनों तक अभिनंदन पत्रों का तांता लगा रहा और महीनों क्लब और यूनिवर्सिटी की फरमाइशों से दम मारने का अवकाश न मिला। यात्रा-वृत्तांत देश के प्रायः सभी पत्रों में छपा। कई देशों से भी बधाई के तार और पत्र मिले। फ्रांस और रूस आदि देशों की कितनी ही सभाओं ने मुझे व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया। एक-एक वक्तृता के लिए मुझे कई-कई हजार पौंड दिए जाते थे। कई विद्यालयों ने मुझे उपाधियां दी। जार ने अपना ऑटोग्राफ भेज कर सम्मानित किया, किंतु इन आदर-सम्मान की उपाधियों से मेरे चित्त को शांति न मिलती थी और ज्ञानसरोवर का सुरम्य तट और वह गहरी गुफा और वह मृदुभाषणी रमणी सदैव आंखों के सामने फिरती रहती। उसके मधुर शब्द कानों में गूंजा कराते। मैं थियेटरों में जाता और स्पेन जार्जिया की सुन्दरियों को देखता, किंतु हिमालय की अप्सरा मेरे ध्यान से न उतरती। कभी-कभी कल्पना में मुझे वह देवी आकाश से उतरती हुई मालूम होती, तब चित्त चंचल हो जाता और विकल उत्कंठा होती कि किसी तरह पर लगा कर ज्ञानसरोवर के तट पर पहुंच जाऊं। आखिर एक रोज मैंने सफर का सामान दुरुस्त किया और उसी तिथि के ठीक एक हजार दिनों के बाद जब कि मैंने पहली बार ज्ञानसरोवर के तट पर कदम रखा था, मैं फिर वहां जा पहुंचा।

प्रभात का समय था। गिरिराज सुनहरा मुकुट पहने खड़े थे। मन समीर के आनन्दमय झोंकों से ज्ञानसरोवर का निर्मल प्रकाश से प्रतिबिंबित जल इस प्रकार लहरा रहा था, मानो अगणित अप्सराएं आभूषणों से जगमगाती हुई नृत्य कर रही हों। लहरों के साथ शतदल यों झकोरे लेते थे जैसे कोई बालक हिड़ोले में झूल रहा हो। पुलों के बीच में श्वेत हंस तैरते हुए ऐसे मालूम होते थे, मानों लालिमा से छाये हुए आकाश पर तारागण चमक रहे हों। मैंने उत्सुक नेत्रों से इस गुफा की ओर देखा तो यहां एक विशाल राजप्रसाद आसमान से कंधे मिलाए खड़ा था। एक ओर रमणीक उपवन था, दूसरी ओर एक गगनचुंबी मन्दिर। मुझे यह कायापलट देखकर आश्चर्य हुआ। मुख्य द्वार पर जाकर देखा, तो दो चोबदार ऊदे मखमल की वर्दियां पहने, जरी के पट्टे बांधे खड़े थे। मैंने उनसे पूछा, ‘क्यों भाई यह किसका महल है?’

चोबदार – ‘अर्जुन नगर की महारानी का।’

मैं – ‘क्या अभी हाल ही में बना है?’

चोबदार – ‘हां! तुम कौन हो?’

मैं – ‘एक परदेशी यात्री हूं। क्या तुम महारानी को मेरी सूचना दे दोगे।’