Shaap by Munshi Premchand
Shaap by Munshi Premchand

चोबदार – ‘तुम्हारा क्या नाम है और कहां से आते हो?’

मैं – ‘उनसे केवल इतना कह देना कि यूरोप से एक यात्री आया है और आपके दर्शन करना चाहता है।’

चोबदार भीतर चला गया और एक क्षण के बाद आ कर बोला, ‘मेरे साथ आओ।’

मैं उसके साथ हो लिया। पहले एक लम्बी दालान मिली जिसमें भाँति-भाँति के पक्षी पिंजरों में बैठे चहक रहे थे। इसके बाद एक विस्तृत बारहदरी में पहुँचा जो सम्पूर्णतः पाषाण की बनी हुई थी। मैंने ऐसी सुन्दर गुलकारी ताजमहल के अतिरिक्त और कहीं नहीं देखी। फर्श की पच्चीकारी को देख कर उस पर पाँव धरते संकोच होता था। दीवारों पर निपुण चित्रकारों की रचनाएँ शोभायमान थीं। बारहदरी के दूसरे सिरे पर एक चबूतरा था जिस पर मोटी कालीनें बिछी हुई थीं। मैं फर्श पर बैठ गया। इतने में एक लम्बे कद का रूपवान् पुरुष अंदर आता हुआ दिखायी दिया। उसके मुख पर प्रतिभा की ज्योति झलक रही थी और आँखों से गर्व टपका पड़ता था। उसकी काली और भाले की नोक के सदृश तनी हुई मूँछें उसके भौंरे की तरह काले घुँघराले बाल उसकी आकृति की कठोरता को नम्र कर देते थे।

विनयपूर्ण वीरता का इससे सुन्दर चित्र नहीं खींच सकता था। उसने मेरी ओर देखकर मुस्कराते हुए कहा, ‘आप मुझे पहचानते हैं?’ मैं अदब से खड़ा होकर बोला, ‘मुझे आपसे परिचय का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ।’ वह कालीन पर बैठ गया और बोला, मैं शेरसिंह हूं।’ मैं अवाक् रह गया। शेर सिंह ने फिर कहा, ‘अच्छा आप प्रसन्न नहीं है कि आपने मुझे पिस्तौल का लक्ष्य नहीं बनाया? मैं तब पशु था, अब मनुष्य हूं। मैंने कहा, ‘आपको हृदय से धन्यवाद देता हूं। यदि आज्ञा हो, तो मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं।’

शेरसिंह ने मुस्कराकर कहा – ‘मैं समझ गया, पूछिए।’

मैं – ‘जब आप समझ ही गये तो मैं पूछूं क्यों?’

शेरसिंह – ‘सम्भव है, मेरा अनुमान ठीक न हो।’

मैं – ‘मुझे भय है कि उस प्रश्न से आपको दुःख न हो।’

शेरसिंह – ‘कम-से-कम आपको मुझसे ऐसी शंका न करनी चाहिए।’

मैं – ‘विद्याधरी के भ्रम में कुछ सार था?’

शेरसिंह ने सिर झुकाकर कुछ देर में उत्तर दिया – ‘जी हां, था। जिस वक्त मैंने उसकी कलाई पकड़ी थी। उस समय आवेश से मेरा एक-एक अंग कांप रहा था। मैं विद्याधरी के उस अनुग्रह को मरणपर्यंत न भूलूंगा। मगर इतना प्रायश्चित करने पर भी मुझे अपनी ग्लानि से निवृत्ति नहीं हुई। संसार की कोई वस्तु स्थिर नहीं, किन्तु पाप की कालिमा अमर और अमिट है। यश और कीर्ति कालांतर में मिट जाती हैं किंतु पाप का धब्बा नहीं मिटता। मेरा विचार है कि ईश्वर भी दाग को नहीं मिटा सकता। कोई तपस्या, कोई दंड, कोई प्रायश्चित इस कालिमा को नहीं मिटा सकता। पतितोद्धार की कथाएं और तोबा या कन्फेशन करके पाप से मुक्त होने की बातें, यह सब संसार-लिप्सी पाखंडी, धर्मावलंबियों की कमाई हैं।’

हम दोनों यही बातें कर रहे थे कि रानी प्रियंवदा सामने आकर खड़ी हो गयी। मुझे आज अनुभव हुआ, जो बहुत दिनों से पुस्तकों में पढ़ा करता था कि सौंदर्य में प्रकाश होता है। आज इसकी सत्यता मैंने अपनी आंखों से देखी। मैंने जब उन्हें पहले देखा था तो निश्चय किया था कि यह ईश्वरीय कला-नैपुण्य की पराकाष्ठा है, परन्तु अब जब मैंने उन्हें दोबारा देखा तो ज्ञात हुआ कि यह इस असल की नकल थी। प्रियंवदा ने मुस्कराकर कहा – ‘मुसाफिर, तुझे स्वदेश में भी कभी हम लोगों की याद आयी थी?’ अगर मैं चित्रकार होता तो उसके मधुर हास्य को चित्रित करके प्राचीन गुणियों को चकित कर देता। उसके मुंह से यह प्रश्न सुनने के लिए मैं तैयार न था। यदि इसी भांति मैं उसका उत्तर देता तो शायद वह मेरी धृष्टता होती और शेरसिंह के तेवर बदल जाते। मैं यह भी न कह सकता कि मेरे जीवन के सबसे सुखद भाग वही था जो ज्ञानसरोवर के तट पर व्यतीत हुआ था, किन्तु मुझे इतना साहस भी न हुआ। मैंने दबी जबान से कहा ‘क्या मैं मनुष्य नहीं हूं?’

तीन दिन बीत गये। इन तीनों दिनों में खूब मालूम हो गया कि पूर्व को अतिथ्यसेवी क्यों कहते हैं। यूरोप का कोई दूसरा मनुष्य, जो यहां की सभ्यता से परिचित न हो, यहां के सत्कार से ऊब जाता। किन्तु मुझे इन देशों के रहन-सहन का खूब अनुभव हो चुका है और मैं इस का आदर करता हूं।

चौथे दिन मेरी विनय पर रानी प्रियंवदा ने अपनी शेष कथा सुनानी शुरू की –

‘ऐ मुसाफिर! मैंने तुझसे कहा था कि अपनी रियासत का शासन-भार मैंने श्रीधर पर रख दिया था और जितनी योग्यता और दूरदर्शिता से उन्होंने इस काम को संभाला है उनकी प्रशंसा नहीं हो सकती। ऐसा बहुत कम हुआ है कि एक विद्वान पंडित, जिसका सारा जीवन पठन-पाठन में व्यतीत हुआ हो, एक रियासत का बोझ सम्हाले, किन्तु राजा बीरबल की भांति पं.श्रीधर भी सब कुछ कर सकते हैं। मैंने परीक्षार्थी उन्हें यह काम सौंपा था। अनुभव ने सिद्ध कर दिया कि यह इस कार्य के सर्वथा योग्य हैं। ऐसा जान पड़ता है कि कुल-परम्परा ने उन्हें इस काम के लिए अभ्यस्त कर दिया। जिस समय उन्होंने इसका काम अपने हाथ में लिया, यह रियासत एक उजाड़ ग्राम के सदृश थी। अब वह धनधान्यपूर्ण एक नगर है। शासन का कोई ऐसा विभाग नहीं, जिस पर उनकी सूक्ष्म दृष्टि न पहुंची हो।

थोड़ी ही दिनों में लोग उनके शील-स्वभाव पर मुग्ध हो गये और राजा रणधीर सिंह भी उन पर कृपा-दृष्टि रखने लगे। पंडितजी पहले शहर से बाहर एक ठाकुर द्वारे में रहते थे। किन्तु जब राजा साहब से मेल-जोल बढ़ा तो उनके आग्रह से विवश होकर राजमहल में चले गए। यहां तक परस्पर मैत्री और घनिष्ठता बढ़ी कि मान-प्रतिष्ठा का विचार भी जाता रहा। राजा साहब पंडितजी से संस्कृत भी पढ़ते थे और उनके समय का अधिकांश भाग पंडित जी के मकान पर ही कटता था, किन्तु शोक! यह विद्याप्रेम या शुद्ध मित्रभाव का आकर्षण न था। यह सौंदर्य का आकर्षण था। यदि उस समय मुझे लेशमात्र भी संदेह होता कि रणधीर सिंह की यह घनिष्ठता कुछ और ही पहलू लिये हुए है तो उसका अंत इतना खेदजनक न होता जितना कि हुआ। उनकी दृष्टि विद्याधरी पर उस समय पड़ी जब वह ठाकुर द्वारे में रहती थी और यह सारी कुयोजनाएं उसी की करामात थी। राजा साहब स्वभावतः बड़े ही सच्चरित्र और संयमी पुरुष थे, किंतु जिस रूप ने मेरे पति जैसे देवपुरुष का ईमान डिगा दिया, वह सब कुछ कर सकता है।

भोली-भाली विद्याधरी मनोविकारों की इस कुंठित नीति से बेखबर थी। जिस प्रकार छलांगें मारता हुआ हिरण व्याघ्र की फैलायी हुई हरी-भरी घास से प्रसन्न होकर उस ओर बढ़ता है और यह नहीं समझता कि प्रत्येक पग मुझे सर्वनाश की ओर लिये जाता है, उसी भांति विद्याधरी को उसका चंचल मन अंधकार की ओर खींचे लिए जाता था। वह राजा साहब के लिए अपने हाथों से बीड़े लगाकर भेजती, पूजा के लिए चंदन रगड़ती। रानी जी से भी उसका बहनापा हो गया। वह एक क्षण के लिए भी उसे अपने पास से न जाने देती। दोनों साथ-साथ बाग की सैर करती, साथ-साथ झूला झूलतीं, साथ-साथ चौपड़ खेलती। यह उनका श्रृंगार करती और वह उनकी मांग-चोटी संवारती मानों विद्याधरी ने रानी के हृदय में वह स्थान प्राप्त कर लिया, जो किसी समय मुझे प्राप्त था। लेकिन वह गरीब क्या जानती थी कि जब मैं बाग की रविशों में विचरती हूं तो कुवासना मेरे तलवे के नीचे आंखें बिछाती हैं, जब मैं झूला झूलती हूं तो वह आड़ में बैठी हुई आनंद से झूमती है। इस एक सरल हृदय अबला स्त्री के लिए चारों ओर से चक्रव्यूह रचा जा रहा था।

इस प्रकार एक वर्ष व्यतीत हो गया। राजा साहब का रब्त-जब्त दिनों दिन बढ़ता जाता था। पंडितजी को उनसे इतना स्नेह हो गया, जो गुरुजी को अपने एक होनहार शिष्य से होता है। मैंने जब देखा कि आठों पहर का यह सहवास पंडितजी के काम में विघ्न डालता है, तो एक दिन मैंने उनसे कहा – ‘यदि आपको कोई आपत्ति न हो, तो दूरस्थ देहातों का दौरा आरम्भ कर दें और इस बात का अनुसंधान करें कि देहातों में कृषकों के लिए बैंक खोलने में हमें प्रजा से कितनी सहानुभूति और कितनी सहायता की आशा करनी चाहिए। पंडितजी के मन की बात नहीं जानती, पर प्रत्यक्ष में उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की। दूसरे ही दिन प्रात-काल चले गये। किंतु आश्चर्य यह है कि विद्याधरी उनके साथ न गयी। अब तक पंडितजी जहां कहीं आते थे, विद्याधरी परछाई की भांति उनके साथ रहती थी। असुविधा के कष्ट का विचार भी उसके मन में न आता था। पंडितजी कितना ही समझायें, कितना ही डरायें, पर वह उनका साथ न छोड़ती थी, पर अबकी बार कष्ट के विचार ने उसे कर्तव्य के मार्ग से विमुख करा दिया। पहले उसका पतिव्रत एक वृक्ष था, जो उसके प्रेम की क्यारी में अकेला खड़ा था, किंतु अब उसकी क्यारी में मैत्री का घास-पात निकल आया था, जिसका पोषण भी उसकी भोजन पर अवलम्बित था।

ऐ मुसाफिर! छह महीने गुजर गये और पंडित श्रीधर वापस न आये। पहाड़ों की चोटियों पर छाया हुआ हिम घुल-घुलकर नदियों में बहने लगा, उनकी गोद में फिर रंग-बिरंगे फूल लहलहाने लगे। चन्द्रमा की किरणें फिर फूलों की महक सूंघने लगी। सभी पर्वतों के पक्षी अपनी वार्षिक यात्रा समाप्त कर फिर स्वदेश आ पहुंचे, किन्तु पंडितजी रियासत के कामों में ऐसे उलझे कि मेरे निरंतर आग्रह करने पर भी अर्जुन नगर न आये। विद्याधरी की ओर से वह इतने उदासीन क्यों हुए, समझ में नहीं आया। उन्हें तो उसका वियोग एक क्षण के लिए भी असह्य था। किंतु इससे अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि विद्याधरी ने भी आग्रह पूर्ण पत्रों के लिखने के अतिरिक्त उनके पास जाने का कष्ट न उठाया। वह अपने पत्रों में लिखती – स्वामी जी, मैं बहुत व्याकुल हूं, यहां मेरा मन जरा भी नहीं लगता। एक-एक दिन एक-एक वर्ष के समान व्यतीत होता है। न दिन को चैन, न रात को नींद। क्या आप मुझे भूल गये? मुझसे कौन-सा अपराध हुआ? क्या आपको मुझ पर दया भी नहीं आती? मैं आपके वियोग में रो-रोकर मरी जाती हूं। नित्य स्वप्न देखती हूं कि आप आ रहे हैं, पर यह स्वप्न सच्चा नहीं होता।’ उसके पत्र ऐसे ही प्रेममय शब्दों से भरे होते थे और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि जो कुछ वह लिखती थी, वह भी अक्षरशः सत्य था, मगर इतनी व्याकुलता, इतनी चिंता और इतनी उद्विग्नता पर भी उसके मन में कभी यह प्रश्न न उठे कि क्यों न मैं ही उनके पास चली चलूं।

बहुत ही सुहावनी ऋतु थी। ज्ञानसरोवर में यौवन-काल की अभिलाषाओं की भांति कमल के फूल खिले हुए थे। राजा रणधीर सिंह की पच्चीसवीं जयंती का शुभ-मुहूर्त आया। सारे नगर में आनंदोत्सव की तैयारियां होने लगी। गृहणियां कोरे-कोरे दीपक पानी में भिगोने लगीं कि वह अधिक तेल न सोख जायें। चैत्र की पूर्णिमा थी, किंतु दीपक की जगमगाहट ने ज्योत्सना को मात कर दिया था। मैंने राजा साहब के लिए इरफहान से एक रत्न-जड़ित तलवार मंगा रखी थी। दरबार के अन्य जागीरदारों और अधिकारियों ने भी भांति के उपहार मंगा रखे थे। मैंने विद्याधरी के घर जाकर देखा, तो वह एक पुष्पहार गूंथ रही थी। मैं आधा घंटे तक उसके सम्मुख खड़ी रही, किंतु वह अपने काम में इतनी व्यस्त थी कि उसे मेरी आहट भी न मिली। तब मैंने धीरे से पुकारा, वहन!’ विद्याधरी ने चौंक कर सिर उठाया और बड़ी शीघ्रता से वह हार फूल की डाली में छिपा दिया और लज्जित होकर बोली – ‘क्या तुम देर से खड़ी हो?’ मैंने उत्तर दिया आधा घंटे से अधिक हुआ।

विद्याधरी के चेहरे का रंग उड़ गया, आंखें झुक गयी, कुछ हिचकिचायी, कुछ घबरायी, अपने अपराधी हृदय को इन शब्दों से शांत किया – ‘यह हार मैंने ठाकुरजी के लिए गूंथा है।’ उस समय विद्याधरी की घबराहट का भेद मैं कुछ न समझी। ठाकुरजी के लिए हार गूंथना क्या कोई लज्जा की बात है? फिर जब यह हार मेरी नजरों से हटा दिया गया तो उसका जिक्र ही क्या? हम दोनों ने कितनी ही बार साथ बैठकर हार गूंथे थे। कोई निपुण मालिन भी हमसे अच्छा हार न गूंथ सकती थी, मगर इसमें शर्म क्या? दूसरे दिन यह रहस्य मेरी समझ में आ गया। वह हार राजा रणधीर सिंह को उपहार में देने के लिए बनाया गया था।

यह बहुत सुन्दर वस्तु थी। विद्याधरी ने अपना सारा चातुर्य उसके बनाने में खर्च किया था। कदाचित वह सबसे उत्तम वस्तु थी जो राजा साहब को भेंट कर सकती थी। वह ब्राह्मणी थी। राजा साहब की गुरुमाता थी। उसके हाथों से वह उपहार बहुत ही शोभा देता था किन्तु यह बात उसने मुझसे छिपायी क्यों?

मुझे उस दिन रात भर नींद न आयी। उसके इस रहस्य-भाव ने उसे मेरी नजरों से गिरा दिया। एक बार आंख झपकी तो मैंने उसे स्वप्न में देखा, मानो यह एक सुंदर पुष्प है, किंतु उसकी बास मिट गयी हो। वह मुझसे गले मिलने के लिए बढ़ी, किंतु मैं हट गयी और बोली कि तूने मुझसे वह बात छिपायी क्यों?

ऐ मुसाफिर! राजा रणधीर सिंह की उदारता ने प्रजा को मालामाल कर दिया। रईसों और अमीरों ने खिलअतें पायी। किसी को घोड़ा मिला, किसी को जागीर मिली। मुझे उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता की एक प्रति एक मखमली बस्ते में रखकर दी। विद्याधरी को एक बहुमूल्य जड़ाऊ कंगन मिला। उस कंगन में अनमोल हीरे जड़े हुए थे। देहली के निपुण स्वर्णकारों ने इसे बनाने में अपनी कला का चमत्कार दिखाया था। विद्याधरी को अब तक आभूषणों से इतना. प्रेम न था, अब तक सादगी ही उसका आभूषण और पवित्रता ही उसका श्रृंगार था, पर इस कमल पर लोट-पोट हो गयी।

आषाढ़ का महीना आया। घटाएं गगनमंडल में मंडराने लगी। पंडित श्रीधर को घर की सुध आयी। पत्र लिखा कि मैं आ रहा हूं। विद्याधरी ने मकान खूब साफ कराया और स्वयं अपना बनाव-श्रृंगार किया। उसके वस्त्रों से चंदन की महक उड़ रही थी। उसने कंगन को संदूकचे से निकाला और सोचने लगी कि इसे पहनूं या न पहनूं। उसने मन में निश्चय किया कि न पहनूंगी। संदूक बंद करके रख दिया।

सहसा लौंडी ने आकर सूचना दी कि पंडित जी आ गये। सुनते ही विद्याधरी लपक कर उठी, किंतु पति के दर्शनों की उत्सुकता उसे द्वार की ओर नहीं ले गयी। उसने बड़ी फुर्ती से संदूक खोला, कंगन निकाल कर पहना और अपनी सूरत आईने में देखने लगी।

इधर पंडितजी प्रेम की उत्कंठा से कदम बढ़ाते दालान से आंगन और आंगन से विद्याधरी के कमरे में आ पहुंचे। विद्याधरी ने आकर उनके चरणों को अपने सिर से स्पर्श किया। पंडितजी उसका यह श्रृंगार देखकर दंग रह गए। एकाएक उनकी दृष्टि उस कंगन पर पड़ी। राजा रणधीर सिंह की संगत ने उन्हें रत्नों का पारखी बना दिया था। ध्यान से देखा तो एक-एक नगीना एक एक हजार का था। चकित होकर बोले, यह कंगन कहां मिला?’

विद्याधरी ने जबाब पहले से सोच रखा था। रानी प्रियंवदा ने दिया है। यह जीवन में पहला अवसर था कि विद्याधरी ने अपने पतिदेव से कपट किया। जब हृदय शुद्ध न हो तो मुख से सत्य क्यों कर निकले। यह कंगन नहीं, वरन् एक विषैला नाग था।