saubhaagy ke kodeby by munshi premchand
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तीन साल उड़ गए, नथुवा के गाने की सारे शहर में धूम मच गई। और वह केवल एक गुणी नहीं था। गाना, शहनाई बजाना, पखावज, सारणी, तम्बूरा, सितार-सभी कलाओं में दक्ष हो गया। उस्तादों को भी उसकी चमत्कारिक बुद्धि पर आश्चर्य होता था।। ऐसा मालूम होता था कि उसने पहले की पढ़ी हुई विद्या दुहरा ली है। लोग दस-दस सालों तक सितार बजाना सीखते रहते हैं और नहीं आता, नथुवा को एक महीने में उसके तारों का ज्ञान हो गया। ऐसे कितने ही रत्न पड़े हुए हैं, जो किसी पारखी से भेंट न होने के कारण मिट्टी में मिल जाते हैं।

संयोग से इन्हीं दिनों ग्वालियर में एक संगीत-सम्मेलन हुआ। देश-देशांतरों के संगीत के आचार्य निमन्त्रित हुए। उस्ताद पूरे को न्यौता मिला। नथुवा इन्हीं का शिष्य था। उस्ताद ग्वालियर चले तो नाथू को भी साथ लेते गये। एक सप्ताह तक ग्वालियर में बड़ी धूमधाम रही। नाथूराम ने वहाँ खूब नाम कमाया। उसे सोने का तमगा इनाम मिला। ग्वालियर के संगीत-विद्यालय के अध्यक्ष ने उस्ताद घूरे से आग्रह किया, नाथूराम को संगीत-विद्यालय में दाखिला करा दो। यहाँ संगीत के साथ उसकी शिक्षा भी हो जायेगी। घूरे को मानना पड़ा। नाथूराम भी राजी हो गया।

नाथूराम ने पाँच वर्षों में विद्यालय की सर्वोच्च उपाधि प्राप्त कर ली। इसके साथ-साथ भाषा, गणित और विज्ञान में उसकी बुद्धि ने अपनी प्रखरता का परिचय दिया। अब वह समाज का भूषण था। कोई उससे न पूछता था.. कौन जाति हो? उसका रहन-सहन, तौर-तरीका अब गायकों का-सा नहीं, शिक्षित समुदाय का- सा था। अपने सम्मान की रक्षा के लिए वह ऊँचे वर्ण वालों का-सा आचरण रखने लगा। मदिरा-मांस त्याग दिया, नियमित रूप से संध्योपासना करने लगा। कोई कुलीन ब्राह्मण भी इतना आचार-विचार न करता होगा। नाथूराम का तो पहले ही नाम हो चुका था। अब उसका कुछ और सुसंस्कार हुआ। वह ना.रा.आचार्य मशहूर हो गया। साधारण लोग ‘आचार्य’ ही कहा करते थे। राज-दरबार से उसे अच्छा वेतन मिलने लगा। 18 वर्ष की आयु में इतनी ख्याति विरले ही किसी गुणी को नसीब होती है। लेकिन ख्याति-प्रेम वह प्यास है जो कभी नहीं बुझती, वह अगस्त ऋषि की भांति सागर को पीकर भी शान्त नहीं होती। महाशय आचार्य ने यूरोप को प्रस्थान किया। वह पाश्चात्य संगीत पर भी अधिकृत होना चाहते थे। जर्मनी के सबसे बड़े संगीत-विद्यालय में दाखिल हो गए और पाँच वर्षों के निरंतर परिश्रम और उद्योग के बाद आचार्य की पदवी लेकर इटली की सैर करते हुए ग्वालियर लौट पाये और उसके एक ही सप्ताह के बाद मदन कम्पनी ने उन्हें तीन हजार रुपये मासिक वेतन पर अपनी सब शाखाओं का निरीक्षक नियुक्त किया। यह यूरोप जाने के पहले ही हजारों रुपये जमा कर चुके थे। यूरोप में भी ओपेराओ और नाट्यशालाओं में उनकी खूब आवभगत हुई थी। कभी-कभी एक-एक दिन में इतनी आमदनी हो जाती थी, जितनी यहीं के बड़े-से-बड़े गवैयों को बरसों में भी नहीं होती। लखनऊ से विशेष प्रेम होने के कारण उन्होंने वहीं निवास करने का निश्चय किया।

आचार्य महाशय लखनऊ पहुँचे, तो उनका चित्त गदगद हो गया। यहीं उनका बचपन बीता था। यहीं एक दिन वह अनाथ थे। यहीं गलियों में कनकौए लूटते फिरते थे। यही बाजारों में पैसे माँगते-फिरते थे। आह! यही उन पर हंटरों की मार पड़ी थी, जिसके निशान अब तक बने थे। अब यह दाग उन्हें सौभाग्य की रेखाओं से भी प्रिय लगते। यथार्थ में वह कोड़ों की मार उनके लिए शिव का वरदान थी। रायसाहब के प्रति अब उनके दिल में क्रोध या प्रतिकार लेश मात्र भी न था। उनकी बुराइयाँ भूल गई थीं, भलाइयां याद रह गई थीं, और रत्ना तो उन्हें दया और वात्सल्य की मूर्ति-सी याद आती। विपत्ति पुराने घावों को बढ़ाती है, सम्पत्ति उन्हें भर देती है। गाड़ी से उतरे तो उनकी छाती धड़क रही थी। 10 वर्ष का बालक 23 वर्ष का जवान, शिक्षित भद्र युवक हो गया था। उसकी माँ भी उसे देखकर न कह सकती थी कि यह मेरा नथुवा है। लेकिन उसकी कायापलट की अपेक्षा नगर की कायापलट और भी विस्मयकारी थी। यह लखनऊ नहीं, कोई दूसरा ही नगर था।

स्टेशन से बाहर निकलते ही देखा कि शहर के कितने ही छोटे-बड़े आदमी उनका स्वागत करने को खड़े हैं। उनमें एक युवती रमणी भी थी, जो रत्ना से बहुत मिलती थी। लोगों ने उनसे हाथ मिलाया और रत्ना ने उनके गले में फूलों का हार डाल दिया। यह विदेश में भारत का नाम रोशन करने का पुरस्कार था। आचार्य के पैर डगमगाने लगे, ऐसा जान पड़ता था, अब नहीं खड़े रह सकते। यह वही रत्ना है। भोली-भाली बालिका ने सौंदर्य, लज्जा, गर्व और विजय की देवी का रूप धारण कर लिया है। उनकी हिम्मत न पड़ी कि रत्ना की तरफ सीधी आँखों देख सके।

लोगों से हाथ मिलाने के बाद वह उस बँगले में आये, जो उनके लिए पहले ही से सजाया गया था। उसको देखकर व चौंक पड़े। यह वही बँगला था, जहाँ रत्ना के साथ वह खेलते थे, सामान भी वही था, तस्वीरें वही, कुर्सियाँ और मेज़ वही, शीशे के आलात वही, यहाँ तक कि फर्श भी वही था। उसके अंदर कदम रखते हुए आचार्य महाशय के हृदय में कुछ वही भाव जागृत हो रहे थे, जो किसी देवता के मंदिर में जाकर धर्मपरायण हिन्दू के हृदय में होते हैं। वह रत्ना के शयनागार में पहुँचे, तो उनके हृदय में ऐसी ऐंठन हुई कि आँसू बहने लगे- यह वही पलंग है, वही बिस्तर और यही फर्श, उन्होंने अधीर होकर पूछा- यह किसका बँगला है?

कम्पनी का मैनेजर साथ था, बोला- एक राय भोलानाथ हैं, उन्हीं का है।

आचार्य-रायसाहब कहां गये?

मैनेजर- खुदा जाने कहां गये। यह बँगला कर्ज की इल्लत में नीलाम हो रहा था। मैंने देखा, हमारे थियेटर से करीब है, अधिकारियों से खतोकिताबत की और इसे कम्पनी के नाम खरीद लिया। 40 हजार में यह बँगला सामान समेत लिया गया है।

आचार्य- मुफ्त मिल गया, तुम्हें रायसाहब की कुछ खबर नहीं?

मैनेजर- सुना था कि कहीं तीर्थ करने गये थे, खुद जाने लौटे या नहीं। आचार्य महाशय जब शाम को सावधान होकर बैठे तो एक आदमी से पूछा- क्यों जी, उस्ताद घूरे का भी हाल जानते हो? उनका नाम बहुत सुना है।

आदमी ने सकरुण भाव से कहा-खुदावन्द! उनका हाल कुछ न पूछिए, शराब पीकर घर आ रहे थे, रास्ते में बेहोश सड़क पर गिर पड़े। उधर से एक मोटर लारी आ रही थी। ड्राइवर ने देखा नहीं, लारी उनके ऊपर से निकल गई। सुबह को लाश मिली। खुदावंद, अपने फन में एक था। अब उनकी मौत से लखनऊ वीरान हो गया। अब ऐसा कोई नहीं रहा, जिस पर लखनऊ को घमण्ड हो। नथुवा नाम के एक लड़के को उन्होंने कुछ सिखाया था उन्हें उससे हम लोगों को उम्मीद थी कि उस्ताद का नाम जिंदा रखेगा, पर वह यहाँ से ग्वालियर चला गया, फिर पता नहीं कि कहां गया।

आचार्य महाशय के प्राण सूखे जाते थे कि अब बात खुली, अब खुली। दम रुका हुआ था, जैसे कोई तलवार लिये सिर पर खड़ा हो। बारे, कुशल हुई, घड़ा चोट खाकर भी बच गया।

आचार्य महाशय उस घर में रहते थे, किन्तु उसी तरह जैसे कोई नई बहू अपनी ससुराल में रहे। उनके हृदय से पुराने संस्कार न मिटते थे। उनकी आत्मा इस यथार्थ को स्वीकार न करती कि अब यह मेरा घर है। वह जोर से हँसते तो सहसा चौंक पड़ते। मित्रवर आकर शोर मचाते, तो उन्हें एक अज्ञात शंका होती थी। लिखने-पढ़ने के कमरे में शायद वह सोते, तो उन्हें रात-भर नींद न आती। यह खयाल दिल में जमा हुआ था कि यह पढ़ने-लिखने का कमरा है। बहुत अच्छा होने पर भी वह पुराने सामान को बदल न सकते थे। और रत्ना के शयनागार को तो उन्होंने फिर कभी नहीं खोला। वह ज्यों-का-त्यों बंद पड़ा रहता था। उसके अंदर जाते हुए उनके पैर थरथराने लगते थे। उस पलंग पर सोने का ध्यान ही उन्हें नहीं आया।

लखनऊ में कई बार उन्होंने विश्वविद्यालय में अपने संगीत-नैपुण्य का चमत्कार दिखाया। किसी राजा-रईस के घर अब यह गाने न जाते थे, चाहे कोई उन्हें लाखों रुपये ही क्यों न दे, यह उनका प्रण था। लोग अलौकिक गान सुनकर अलौकिक आनन्द उठाते थे।

एक दिन प्रातःकाल आचार्य महाशय संध्या से उठे थे कि राय भोलानाथ उनसे मिलने आये। रत्ना भी उनके साथ थी। आचार्य महाशय पर रोब छा गया। बड़े-बड़े यूरोपी थियेटरों में भी। उनका हृदय इतना भयभीत न हुआ था। उन्होंने जमीन तक झुककर रायसाहब को सलाम किया। भोलानाथ उनकी नम्रता से कुछ विस्मित-से हो गए। बहुत दिन हुए, जब लोग उन्हें सलाम किया करते थे। अब तो जहां जाते थे, हँसी उड़ाई जाती थी। रत्ना भी लज्जित हो गई।

रायसाहब ने कातर नेत्रों से इधर-उधर देखकर कहा- आपको यह जगह तो पसंद आयी होगी।