saubhaagy ke kodeby by munshi premchand
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आचार्य-जी हां, इससे उत्तम स्थान की तो मैं कल्पना ही नहीं कर सकता। भोलानाथ- यह मेरा ही बँगला है। मैंने ही इसे बनवाया और मैंने ही इसे बिगाड़ भी दिया।

रत्ना ने झेंपते हुए कहा- दादाजी, इन बातों से क्या फायदा?

भोलानाथ- फायदा नहीं है बेटी, नुकसान भी नहीं। सज्जनों से अपनी विपत्ति कहकर चित्त शान्त होता है। महाशय, यह मेरा ही बँगला है, ‘या यों कहिए कि था। 50 हजार सालाना इलाके से मिलते थे। पर कुछ आदमियों की संगत में सट्टे का चस्का पड़ गया। दो-तीन बार ताबड़तोड़ बाजी हाथ आई, हिम्मत खुल गई। लाखों के वारे-न्यारे होने लगे, किन्तु एक ही घाटे में सारी कसर निकल गई। बधिया बैठ गई। सारी जायदाद खो बैठा। सोचिए, पच्चीस लाख का सौदा था। कौड़ी चित्त पड़ती तो आज इस बँगले का कुछ और ही ठाठ होता, नहीं तो अब पिछले दिनों को याद कर-करके हाथ मलता हूँ। मेरी रत्ना को आपके गाने से बड़ा प्रेम है। जब देखो आप ही की चर्चा किया करती है। इसे मैंने बी.ए.तक पढ़ाया है।

रत्ना का चेहरा शर्म से लाल हो गया। बोली-दादाजी, आचार्य महाशय मेरा हाल जानते हैं। इनको मेरे परिचय की जरूरत नहीं। महाशय, क्षमा कीजिएगा, पिताजी उस घाटे के कारण कुछ अव्यवस्थित चित्त-से हो गए हैं। यह कभी-कभी इस बंगले को देखने आया करें। इससे उनके आंसू पूछ जायेंगे। उन्हें इस विचार से संतोष होगा कि मेरा कोई मित्र इसका स्वामी है। बस, यही कहने के लिए यह आपकी सेवा में आये हैं।

आचार्य ने विनयपूर्ण शब्दों में कहा- इसके पूछने की जरूरत नहीं है। घर आपका है, जिस वक्त जी चाहे, शौक से आये, बल्कि आपकी इच्छा हो तो आप इसमें रह सकते हैं, मैं अपने लिए कोई दूसरा स्थान ठीक कर लूंगा।

रायसाहब ने धन्यवाद दिया और चले गये। वह दूसरे-तीसरे दिन यहाँ जरूर आते और घण्टों बैठे रहते। रत्ना भी उनके साथ अवश्य आती फिर यह एक बार प्रतिदिन आने लगे।

एक दिन उन्होंने आचार्य महाशय को एकान्त में ले जाकर पूछा- क्षमा कीजिएगा, आप अपने बाल-बच्चों को नहीं बुला लेते? अकेले तो आपको बहुत कष्ट होता होगा।

आचार्य- मेरा तो अभी विवाह नहीं हुआ और न करना चाहता हूँ।

यह कहते ही आचार्य महाशय ने आँखें नीची कर लीं।

भोलानाथ- वह क्यों, विवाह से आपको क्यों द्वेष है?

आचार्य- कोई विशेष कारण तो नहीं बता सकता, इच्छा ही तो है।

भोलानाथ- आप ब्राह्मण हैं?

आचार्यजी का रंग उड़ गया। सशंक होकर बोले- यूरोप की यात्रा के बाद वर्णभेद नहीं रहता। जन्म से चाहे जो कुछ हूँ कर्म से तो शूद्र ही हूँ।

भोलानाथ- आपकी नम्रता को धन्य है, संसार में ऐसे सज्जन लोग भी पड़े हैं। मैं भी कर्मों ही से वर्ण मानता हूँ। नम्रता, शील, विजय, आचार, धर्मनिष्ठा, यह सब ब्राह्मणों के गुण हैं और मैं आपको ब्राह्मण ही समझता हैं। जिसमें यह गुण नहीं, यह ब्राह्मण नहीं, कदापि नहीं। रत्ना को आपसे बहुत प्रेम है। आज तक कोई पुरुष उसकी आंखों में नहीं जंचता, किन्तु आपने उसे-वशीभूत कर लिया। इस धृष्टता को क्षमा कीजिएगा, आपके माता-पिता …

आचार्य- मेरे माता-पिता तो आप ही हैं। जन्म किसने दिया, यह मैं नहीं जानता। मैं बहुत छोटा था, तभी उनका स्वर्गवास हो गया।

रायसाहब-आह! वह आज जीवित होते, तो आपको देखकर उनकी गज भर की छाती होती। ऐसे सपूत बेटे कहाँ होते हैं।

इतने में रत्ना एक कागज लिये हुए आयी और रायसाहब से बोली- दादाजी आचार्य महाशय काव्य-रचना भी करते हैं, मैं इनकी मेज़ पर से यह उठा लायी हूँ। सरोजिनी नायडू के सिवा ऐसी कविता मैंने और कहीं नहीं देखी।

आचार्य ने छिपी हुई निगाहों से एक बार रत्ना को देखा और झेंपते हुए बोले- यों ही कुछ लिख लिया था। मैं काव्य-रचना क्या जानूं?

प्रेम से दोनों विह्वल हो रहे थे। रत्ना गुणों पर मोहित थी, आचार्य उसके मोह के वशीभूत थे। अगर रत्ना उनके रास्ते में न आती, तो कदाचित् वह उससे परिचित भी न होते। किन्तु प्रेम की फैली हुई बाँहों का आकर्षण किस पर न होगा? ऐसा हृदय कहां है, जिसे प्रेम जीत न सके?

आचार्य महाशय बड़ी दुविधा में पड़े हुए थे। उनका दिल कहता था, जिस क्षण रत्ना पर मेरी असलियत खुल जायेगी, उसी क्षण वह मुझसे सदैव के लिए मुँह फेर लेगी। वह कितनी ही उदार हो, जाति के बंधन को कितना ही कष्टमय समझती हो, किन्तु उस घृणा से मुक्त नहीं हो सकती, जो स्वभावतः मेरे प्रति उत्पन्न होगी । मगर इस बात को जानते हुए भी उनकी हिम्मत न पड़ती थी कि अपना वास्तविक स्वरूप खोलकर दिखा दें। आह! यदि घृणा ही तक होती तो कोई बात न थी, मगर उसे दुःख होगा, पीड़ा होगी, उसका हृदय विदीर्ण हो जायेगा, उस दशा में न जाने क्या कर बैठे। उसे इस अज्ञात दशा में रखे हुए प्रणय-पाश को दृढ़ करना उन्हें परले सिरे की नीचता प्रतीत होती थी। वह कपट है, दगा है, जो प्रेमाचरण में सर्वथा निषिद्ध है। इस संकट में पड़े हुए वह कुछ निश्चय न कर सकते थे कि क्या करना चाहिए। उधर रायसाहब की आमदोरफ्त दिनोंदिन बढ़ती जाती थी। उनके मन की बात एक-एक शब्द से झलकती थी। रत्ना का आना- जाना बन्द होता जाता था, जो उनके आशय को और भी प्रकट करता था। इस प्रकार तीन-चार महीने व्यतीत हो गए। आचार्य महाशय सोचते, यह वही रायसाहब हैं, जिन्होंने केवल रत्ना की चारपाई पर जरा देर लेटे रहने के लिए मुझे मारकर घर से निकाल दिया था। जब उन्हें मालूम होगा कि मैं वहीं अनाथ, अछूत, आश्रयहीन बालक हूँ तो उन्हें कितनी आत्मवेदना, कितनी अपमान-पीड़ा, कितनी लज्जा, कितनी दुराशा, कितना पश्चात्ताप होगा।

एक दिन रायसाहब ने कहा- विवाह की तिथि निश्चित कर लेनी चाहिए। इस लग्न में मैं इस ऋण से उऋण हो जाना चाहता हूँ।

आचार्य महाशय ने बात का मतलब समझकर भी प्रश्न किया-कैसी तिथि?

रायसाहब- यही रत्ना के विवाह की। मैं कुंडली का तो कायल नहीं, पर विवाह तो शुभ मुहूर्त में ही होगा।

आचार्य भूमि की ओर ताकते रहे, कुछ न बोले।

रायसाहब- मेरी अवस्था तो आपको मालूम ही है। कुश-कन्या के सिवा और किसी योग्य नहीं हूँ। रत्ना के सिवा और कौन है, जिसके लिए उठा रखता। आचार्य महाशय विचारों में मग्न थे।

रायसाहब-रत्ना को आप स्वयं जानते हैं। आपसे उसकी प्रशंसा करनी व्यर्थ है। वह अच्छी है या बुरी है उसे आपको स्वीकार करना पड़ेगा।

आचार्य महाशय की आँखों से आंसू बह रहे थे।

रायसाहब- मुझे पूरा विश्वास है कि आपको ईश्वर ने उसी के लिए यहाँ भेजा है। मेरी ईश्वर से यही याचना है कि तुम दोनों का जीवन सुख से कटे। मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की और कोई बात नहीं हो सकती। इस कर्तव्य से मुक्त होकर इरादा है, कुछ दिन भागवत-भजन करूँ। गौण रूप से आप ही उस फल के भी अधिकारी होंगे।

आचार्य ने अवरुद्ध कंठ से कहा- महाशय, आप मेरे पिता तुल्य हैं, पर मैं इस योग्य कदापि नहीं हूँ।

रायसाहब ने उन्हें गले लगाते हुए कहा- बेटा, तुम सवगुर्ण-सम्पन्न हो। तुम समाज के भूषण हो। मेरे लिए यह महान गौरव की बात है तुम-जैसा दामाद पाऊँ। मैं आज तिथि आदि ठीक करके कल आपको बताऊंगा।

यह कहकर रायसाहब उठ खड़े हुए। आचार्य कुछ कहना चाहते थे, पर मौका न मिला, या यों कहो हिम्मत न पड़ी। इतना मनोबल न था, घृणा सहन करने की इतनी शक्ति न थी।