विवाह महीना-भर हो गया। रत्ना के आने से पति-गृह में उजाला हो गया है। और पति हृदय पवित्र। सागर में कमल खिल गया। रात का समय था। आचार्य महाशय भोजन करके लेटे हुए थे उसी पलंग पर, जिसने किसी दिन उन्हें घर से निकलवाया था, जिसने उसके भाग्य-चक्र को परिवर्तित कर दिया।
महीना-भर से वह अवसर ढूँढ रहे हैं कि वह रहस्य रत्ना से बतला दूँ। उनका संस्कारों से दबा हुआ हृदय यह नहीं मानता कि मेरा सौभाग्य मेरे गुणों ही का अनुगृहीत है। वह अपने रुपये को भट्ठी में पिघलाकर उसका मूल्य जानने की चेष्टा कर रहे हैं। किन्तु अवसर नहीं मिलता। रत्ना ज्यों ही सामने आ जाती है, वह मंत्रमुग्ध से हो जाते हैं। बाग में रोने कौन जाता है, रोने के लिए तो अँधेरी कोठी ही चाहिए।
इतने में रत्ना मुस्कराती हुई कमरे में आयी। दीपक की ज्योति मंद पड़ गयी।
आचार्य ने मुस्कराकर कहा-अब चिराग बंद कर दूँ न?
रत्ना बोली- क्यों, क्या मुझसे शर्म आती है।
आचार्य- हाँ वास्तव में शर्म आती है।
रत्ना- इसलिए कि मैंने तुम्हें जीत लिया?
आचार्य- नहीं, इसलिए कि मैंने तुम्हें धोखा दिया।
रत्ना- तुममें धोखा देने की शक्ति नहीं है।
आचार्य- तुम नहीं जानती। मैंने तुम्हें बहुत बड़ा धोखा दिया है।
रत्ना- सब जानती हूँ।
आचार्य- सब जानती हो, मैं कौन हूँ?
रत्ना- खूब जानती हूँ। बहुत दिनों से जानती हूँ। जब हम तुम दोनों इसी बगीचे में खेला करते थे। मैं तुमको मारती थी और तुम रोते थे। मैं तुमको अपनी झूठी मिठाइयाँ देती थी और तुम दौड़कर लेते थे, तब भी मुझे तुमसे प्रेम था, हां, वह दया के रूप में व्यक्त होता था।
आचार्य ने चकित होकर कहा- रत्ना, यह जानकर भी तुमने …
रत्ना- हाँ, जानकर ही। न जानती तो शायद न करती।
आचार्य- यह वही चारपाई है।
रत्ना- और मैं घाते में।
आचार्य ने उसे गले लगाकर कहा- तुम क्षमा की देवी हो।
रत्ना ने उत्तर दिया-मैं तुम्हारी चेरी हूँ।
आचार्य- रायसाहब भी जानते हैं?
रत्ना- नहीं, उन्हें नहीं मालूम है। उनसे भूलकर भी न कहना, नहीं तो वह आत्मघात कर लेंगे।
आचार्य- वह कोड़े अभी तक याद हैं।
रत्ना- अब पिताजी के पास उसका प्रायश्चित करने के लिए कुछ नहीं रह गया। क्या अब भी तुम्हें सन्तोष नहीं हुआ?
□□□
