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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

स्कूल पहुँचते-पहुँचते आज फिर से देर हो गई। धैर्य जैसे ही स्कूल के गेट पर पहुँचा, गेटकीपर गेट पर ताला लगा रहा था। धैर्य ने गेटमैन की खुशामद करते हुए कहा, “अंकल, बस एक मिनट लेट हो गया। प्लीज, अंदर जाने दीजिए।” ।

“तुमको तो रोजाना ही एक मिनट की देरी होती है। जाओ, दौड़ो जल्दी से।” – गेटकीपर ने धैर्य को झिड़कते हुए गेट खोल दिया।

भारी बस्ते को पीठ पर सँभालते हुए धैर्य दौड़ा और प्रेयर की लाइन में सबसे पीछे जाकर खड़ा हो गया। लेकिन क्लासटीचर ने हाथ से इशारा करते हुए उसे लेट कमर्स की लाइन में खड़ा कर दिया।

धैर्य डर के मारे काँपने लगा। अब प्रेयर के बाद उसे टीचर से पनिशमेंट मिलेगा। एक महीने से लगभग रोज ही ऐसा हो रहा है। स्कूल पहुँचते-पहुँचते वह थोड़ा-बहुत लेट जरूर हो जाता है। इसलिए उसे पनिश होना ही पड़ता है।

क्या करे वह? वह तो सुबह जल्दी जागकर समय पर ही स्कूल के लिए तैयार हो जाता है, लेकिन जब से पापा ने मम्मी को नया मोबाइल लाकर दिया है, वे उसमें न जाने क्या-क्या देखती रहती हैं। पता नहीं रात को कब सोती हैं? सोती भी हैं या नहीं? धैर्य के तो सोने तक वे मोबाइल में ही व्यस्त दिखती हैं। इसीलिए देर से जाग पाती हैं और फिर लबड़-दबड़ करके जल्दी-जल्दी स्कूल के लिए टिफिन बनाती हैं। टिफिन बनाते समय भी मोबाइल पर किसी न किसी के साथ उनकी चैटिंग या बातचीत चलती रहती है। धैर्य समझ नहीं पाता कि इतनी बातें कहाँ से आती हैं उसकी मम्मी के पास।

टिफिन को बस्ते में रखकर और भारी बस्ते को अपनी पीठ पर लादकर वह बहुत तेजी से स्कूल की ओर दौड़ता है। यहाँ तक कि कभी-कभी तो वह हाँफने लगता है। कभी-कभी उसे लगता है कि तेज चलते-चलते उसके पैर हाथी के पैरों जैसे मोटे-मोटे हो गए हैं और अब उससे एक कदम भी आगे नहीं चला जाएगा। फिर भी वह स्कूल में लेट पहुँचने पर मिलने वाले पनिशमेंट को याद करके फिर से हिम्मत जुटाता है और बड़े-बड़े डग भरते हुए स्कूल पहुंचता है।

महीने के अंतिम शनिवार को स्कूल में पेरेंट्स-टीचर एसोसिएशन की मीटिंग होती है। इस बार अपनी मम्मी के साथ स्कूल जाते समय धैर्य मन ही मन बहुत डर रहा था । आज मैडम पूरे महीने स्कूल लेट आने की शिकायत मम्मी से जरूर करेंगी। तब घर पहुँचकर मम्मी की डॉट भी उसे खानी ही पड़ेगी।

मीटिंग शुरू होते ही सभी क्लासटीचर्स अपने-अपने क्लासेज में जाकर बैठ गईं। एक-एक कर वे स्टूडेंट्स का नाम पुकारतीं। जिसका नाम पुकारा जाता, वह और उसके मम्मी, पापा या दोनों टीचर के सामने पहुँच जाते। पूरे महीने में उस स्टूडेंट्स द्वारा अच्छे या खराब जो भी काम किए गए होते, उनके बारे में टीचर उसके पेरेंट्स को बताते। जैसे –

“नवीन ने इस मन्थ अपना होमवर्क कंप्लीट नहीं किया ।”

“रोमा ने पोयम लर्न नहीं की।”

“स्नेहा ने क्लासरूम में एक स्टूडेंट की बुक फाड़ दी।”

अपना नाम पकारा जाते ही धैर्य कॉप उठा। वह सहमा सहमा-सा अपनी मम्मी के साथ मैम के सामने खड़ा हो गया। वह सोच रहा था, ‘अब मैम मम्मी से उसकी शिकायत करेंगी। इस मन्थ धैर्य एक भी दिन स्कूल राइट टाइम नहीं आया। वह क्या उत्तर देगा इस बात का?’

लेकिन शिकायत की जगह मैम का प्रश्न सुनकर वह एकदम से चौंक गया। वे उसकी मम्मी से पूछ रही थीं, “आप अपने मोबाइल का यूज कितने घंटे करती हैं?”

“क् … क्या मतलब?’ – धैर्य की मम्मी हकला-सी गईं और उल्टा मैम से ही पूछने लगीं, “मैडम, मेरे मोबाइल के प्रयोग से आपका क्या मतलब है?”

“आई थिंक, यू आर हैबीचुअल टू यूज योअर मोबाइल टू मच । एम आई करैक्ट?”

“हाँ, करती हूँ, पर इस बात का धैर्य की स्कूली बातों से क्या मतलब है? आप ये सब क्यों पूछ रही हैं?”

“है … मतलब है … तभी तो मैं आपसे पूछ रही हूँ।”

“अच्छा बताइए। क्या मतलब है?”

“इस मन्थ धैर्य मोस्टली स्कूल लेट पहुंचा है। लेट आने के कारण उसे डेली कुछ न कुछ पनिशमेंट भी मिलता रहा है। फिर भी इसके लेट आने पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जबकि यह अपनी क्लास का बहुत ही ब्रिलियेंट और ओबीडेंट स्टूडेंट है।”

मैम की बात सुनकर धैर्य की मम्मी ने धैर्य की ओर टेड़ी नजर से देखा, तो वह सहम गया। तब मैम ने उनसे बोला, “नो … नो … उसको ऐसे मत देखिए । धैर्य ने इस बारे में एक भी दिन आपकी कोई कंपलेंट नहीं की। बट बेचारा पूरे मन्थ चुपचाप आँसू बहाते हुए पनिश होता रहा। इसके साथ आने वाले एक-दो फँड्स, जो आपके घर के पास ही से आते हैं, ने आपके बारे में बताया कि आप मोबाइल का बहुत अधिक यूज करती हैं। उसी कारण धैर्य को समय से टिफिन लगाकर नहीं दे पातीं। इसलिए वह भागते-भागते भी स्कूल टाइम से नहीं पहुंच पाता और डेली पनिश होता है।”

सुनकर धैर्य की मम्मी की नजरें झुक गईं।

मैडम ने उन्हें समझाया, “आप तो वैल लिटरेट लगती हैं। पेरेंट्स की एक्टिविटी और बीहेविअर से बच्चों का रुटीन भी बहुत इफैक्टेड होता है। यह आप अच्छी तरह जानती होंगी। इस मीटिंग का मतलब केवल स्टूडेंट्स की कंपलेंट्स का पुलिंदा खोलकर उनके पेरेंट्स के सामने रख देना ही नहीं होता। स्टूडेंट्स के भी अपने कुछ प्रोब्लम होते हैं। उन पर गौर करके पेरेंट्स के साथ मिलकर उनका सोल्यूशन निकालना भी इस मीटिंग का एक पार्ट होता है।”

धैर्य की मम्मी को एहसास हुआ कि मैम सच कह रही हैं। मोबाइल की लत ने सचमुच ही उसे कितना स्वार्थी बना दिया था। वे हाथ जोड़कर मैम को धन्यवाद देते हुए धैर्य को लेकर घर आ गईं।

अगले दिन से धैर्य को न लेट कमर्स की लाइन में खड़ा होना पड़ा और न ही पनिश होना पड़ा। उसने अटेंडेंस के टाइम बहुत प्यार से मैम की तरफ देखा। मैम ने भी उसे प्यारी-सी स्माइल दी। धैर्य के दिल ने कहा, “थैंक्यू मैम!’

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’