‘हां, एक जान-पहचान की दुकान से ले ली।’
‘कितने की है?’
बाहर किसी ने पूछा होता, तो मैंने 500 रु. से कौड़ी कम न बताया होता, लेकिन यहाँ मैंने 25 रु. बताया।
‘तब तो बड़ी सस्ती मिल गई।’
‘और नहीं तो मैं फंसता ही क्यों?’
‘इसे मुझे देते जाना।’
ऐसा जान पड़ा, मेरे शरीर में रक्त ही न रहा। सारे अवयव निस्पंद हो गए। इनकार करता हूँ तो नहीं बचता, स्वीकार करता हूँ तो भी नहीं बचता। आज प्रातःकाल यह घड़ी मंगनी पाकर मैं फूला न समाया था। इस समय वह ऐसी मालूम हुई, मानों कौड़ियाला गेंडली मारे बैठा हो, बोला- तुम्हारे लिए कोई अच्छी घड़ी ले लूँगा।
‘जी, नहीं, माफ कीजिए, आप ही अपने लिए दूसरी घड़ी ले लीजिएगा। मुझे तो यही अच्छी लगती है। कलाई पर बाँधे रहूंगी। जब-जब इस पर आंखें पड़ेगी, तुम्हारी याद आएगी। देखो, तुमने आज तक मुझे फूटी कौड़ी भी कभी नहीं दी। अब इनकार करोगे, तो फिर कोई चीज न मांगूंगी।’
देवीजी के कोई चीज न माँगने से मुझे किसी विशेष हानि का भय न होना चाहिए था, बल्कि उनके इस विराग का स्वागत करना चाहिए था, पर न-जाने क्यों मैं डर गया। कोई ऐसी युक्ति सोचने लगा कि वह राजी हो जाएँ और घड़ी भी न देनी पड़े। बोला- घड़ी क्या चीज है, तुम्हारे लिए जान हाजिर है, प्रिय। लाओ तुम्हारी कलाई पर बाँध दूँ लेकिन बात यह है कि वक्त का ठीक-ठीक अंदाज न होने से कभी-कभी दफ्तर पहुँचने में देर हो जाती है। और व्यर्थ की फटकार सुननी पड़ती है! घड़ी तुम्हारी है, किन्तु जब तक दूसरी घड़ी न ले लूँ इसे मेरे पास रहने दो। मैं बहुत जल्द कोई सस्ते दामों की घड़ी अपने लिए लेकर और तुम्हारी घड़ी तुम्हारे पास भेज दूँगा। इसमें तो तुम्हें कोई आपत्ति न होगी।
देवीजी ने अपनी कलाई पर घड़ी बाँधते हुए कहा-राम जाने, तुम बड़े चकमेबाज हो, बातें बनाकर काम निकालना चाहते हो। यहाँ ऐसी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं। यहाँ से जाकर दो-चार दिन में दूसरी घड़ी ले लेना! दो-चार दिन जरा लेट दफ्तर चले जाना।
अब मुझे और कुछ कहने का साहस नहीं हुआ। कलाई से घड़ी के जाते ही हृदय पर चिंता का पहाड़-सा बैठ गया। ससुराल में दो दिन रहा, पर उदास और चिंतित। दानू बाबू को क्या जवाब दूंगा, यह प्रश्न किसी गुप्त वेदना की भांति चित्त को मसोसता रहा।
घर पहुंचकर जब मैंने सजल नेत्र होकर दानू बाबू, से कहा- घड़ी तो कहीं खो गई, खेद या सहानुभूति का एक शब्द भी मुँह से निकालने के बदले उन्होंने बड़ी निर्दयता से कहा- इसीलिए मैं घड़ी न देता था! आखिर वही हुआ, जिसकी मुझे शंका थी। मेरे पास वह घड़ी तीन साल रही, एक दिन भी इधर-उधर न हुई। तुमने तीन दिन में वारा-न्यारा कर दिया। आखिर कहां गये थे?
मैं तो डर रहा था कि दानू बाबू न-जाने कितनी घुड़कियाँ सुनाएंगे। यह क्षमाशीलता देखकर मेरी जान-में-जान आयी। बोला-जरा ससुराल चला गया था।
‘ तो भाभी को लिवा लाए?’
‘जी, भाभी को लिवा लाता! अपनी गुजर होती ही नहीं, भाभी को लिवा लाता।’
‘आखिर तुम इतना कमाते हो, वह क्या करते हो।’
‘ कमाता क्या हूं, अपना सिर? 30 रु. महीने का नौकर हूं?’
‘ तो तीसों खर्च कर डालते हो?’
‘क्या, 30 मेरे लिए बहुत हैं?’
‘जब तुम्हारी आमदनी 30 रु.है, तो यह सब अपने ऊपर खर्च करने का तुम्हें अधिकार नहीं। बीवी कब तक मैके में पड़ी रहेगी?’
‘जब तक और तरक्की नहीं होती तब तक मजबूरी है। किस बिरते पर बुलाऊँ?’
‘और तरक्की दो-चार साल तक न हो तो?’
‘यह तो ईश्वर ही जाने। इधर तो ऐसी आशा नहीं है।
‘शाबाश! तब तो तुम्हारी पीठ ठोकनी चाहिए। और कुछ काम क्यों नहीं करते। सुबह को क्या करते हो?’
‘सारा वक्त नहाने-धोने, खाने-पीने में निकल जाता है। फिर दोस्तों से मिलना- जुलना भी तो है।’
‘तो भाई, तुम्हारा रोग असाध्य है। ऐसे आदमी के साथ मुझे लेश मात्र भी सहानुभूति नहीं हो सकती। आपको मालूम है, मेरी घड़ी 500 रु. की थी। सारे रुपये आपको देने होंगे। आप अपने वेतन में से 15 रु. महीना मेरे हवाले रखते जाइए। इस प्रकार ढाई साल में मेरे रुपये पट जाएँ तो खूब जी खोलकर दोस्तों से मिलिएगा। समझ गए न? मैंने 50 रु. छोड़ दिए हैं, इससे अधिक रियायत नहीं कर सकता।’
‘15 रु. में मेरा गुजर कैसे होगा?’
‘गुजर तो लोग 5 रु. में भी करते हैं और 500 रु. में भी। इसकी न चलाओ, अपनी सामर्थ्य देख लो।’
दानू बाबू ने जिस निर्दयता से ये बातें कहीं, उससे मुझे विश्वास हो गया कि अब उनके सामने रोना-धोना व्यर्थ है। यह अपनी पूरी रकम लिये बिना न मानेंगे। घड़ी अधिक-से-अधिक 200 रु. की थी। लेकिन इससे क्या होता है! उन्होंने तो पहले ही उसका दाम बता दिया था। अव उस विषय पर मीनमेख विचार करने का मुझे साहस क्या हो सकता था? किस्मत ठोक कर घर आया। यह विवाह करने का मजा है! उस वक्त कैसे प्रसन्न थे, मानों चारों पदार्थ मिले जा रहे थे। अब नानी के नाम को रोओ। घड़ी को शौक चर्राया था, उसका फल भोगो। न घड़ी बाँधकर जाते, तो ऐसी कौन-सी किरकिरी हुई जाती थी। मगर तब तुम किसकी सुनते थे? देखें 15 रु. में कैसे गुजर करते हो। 30 रु. में तो तुम्हारा पूरा ही न पड़ता था, 15 रु. में तुम क्या भुना लोगे?
इन्हीं चिंताओं में पड़ा-पड़ा सो गया। भोजन करने की भी सुधि न रही!
