मोर का जन्म कैसे हुआ?-21 श्रेष्ठ लोक कथाएं असम: Peacock Story
Peacock Story

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Peacock Story: सत्य युग की बात है, उस समय इन्सान सत्कर्म करने वाला और शुद्ध मन का हुआ करता था। इस कारण वह देवताओं के साथ निवास करता था। मनुष्य देवताओं को देख सकता था। देवता भी मनुष्य का समान आदर करते थे।

एक विधवा औरत थी। उसका एक बेटा था। वह धीरे-धरे जवान हो गया। माँ-बेटे बहुत गरीब थे। अपने प्राणों की रक्षा के लिए दोनों भिक्षा माँगते थे। दोनों भिक्षा माँगने में तनिक भी लज्जा महसूस नहीं करते थे क्योंकि यह उनकी बाध्यता थी। उन्होंने कोई बुरा काम नहीं किया था इसलिए उन्हें लगता था कि कोई उन्हें बुरी दृष्टि से नहीं देखता है। इनकी दुर्दशा को देख एक देव कन्या बहुत दुखित हुई। एक दिन शुभ मुहूर्त में स्वर्ग से देव कन्या मर्त्यलोक में उतर आई। वह विधवा के घर में प्रकट हुई। विधवा उसे देखकर आश्चर्यचकित हुई। देव कन्या विधवा के चरणस्पर्श करने के लिए आगे बढ़ी। यह देखकर विधवा ने सकपकाते हुए अपने पाँव पीछे खींच लिए। लज्जा मिश्रित भय के साथ कहा- “बेटी तुम कौन हो? तुम्हें देखकर लगता है कि तुम कोई देव कन्या हो।”

देवकन्या ने कहा- “मैं आपके पास ही आई हूँ। कुछ बुरा मत मानना।” विधवा ने कहा- “बेटी हम बहुत दरिद्र हैं। खाने के लिए मुट्ठी भर चावल तक नहीं हैं, बैठने के लिए आसन नहीं हैं, सोने के लिए पलंग नहीं है, तुम जैसी कोमल मेहमान की सेवा मैं कैसे करूँ?”

देवकन्या ने कहा- “मुझे कुछ नहीं चाहिए। खाने-पीने की बात को लेकर चिंता न करें। सब चल जाएगा।”

कुछ समय बाद सूर्यास्त होने लगा। घर की मालकिन होने के कारण विधवा को चिंता सताने लगी। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं। अतिथि का सत्कार कैसे करें? कहीं से कुछ माँग कर ले आना चाहिए। देवकन्या ने विधवा की चिंता को ताड़ लिया। उसने अपनी अंजुलि को आगे किया तो वह चावल से भर गया। वह कहने लगी- “यह चावल ले लीजिए, आज के लिए पर्याप्त है।”

विधवा ने लाचार होकर चावल लिया। उसने इसी से देवकन्या का सत्कार करने की ठान ली, सोचा-हम तो भूखे भी रह सकते हैं, मेहमान को भूखा कैसे रखें?

वह बागान से सब्जी तोड़ लाई और उसे पकाया। देवकन्या के दिए चावल में से आधा अलग किया ताकि सुबह भी उसके लिए खाना बन सके। उसने उतना चावल बनाया जो मात्र एक जन के लिए पर्याप्त था। विधवा ने देवकन्या के लिए पत्ते पर खाना परोसा। यह देखकर देवकन्या ने कहा- “आप दोनों के लिए भोजन कहाँ है, आइए तीनों एक साथ खाते हैं।” पतीले में खाना नहीं था इसलिए विधवा ने कई बहाने बनाए पर कन्या बार-बार कहने लगी तो माँ-बेटे भी सकुचाते हुए खाने के लिए बैठ गए। कन्या ने कहा- “खाना परोस लीजिए।” – विधवा ही जानती थी कि पतीला खाली है, अब क्या करें! उसे पसीना आने लगा।

कन्या ने स्वयं उठकर पतीले का ढक्कन खोला। यह क्या! पतीला चावल से भरा था।

तीनों ने पेटभर खाना खाया। रात बहुत हो गई थी इसलिए सोने का समय हो गया था। विधवा के घर में कोई पलंग नहीं था इसलिए तीनों जमीन पर सो गए। विधवा ने देवकन्या को अपने साथ सुलाया। विधवा का बेटा कमरे के दूसरे कोने में सो गया।

दूसरे दिन सुबह कन्या जल्दी उठ गई। उसने माँ-बेटे के जगने से पहले ही घर-द्वार की साफ-सफाई की, सभी बर्तनों को धो डाला। विधवा ने उठकर हाथ मुँह धोया और मेहमान के लिए नाश्ता बनाने के लिए कल रखे हुए चावल में हाथ दिया तो पाया चावल धोए गए हैं। इस प्रकार हर दिन देवकन्या विधवा के हर काम में हाथ बँटाने लगी।

इसी तरह कई दिन बीत गए। देवकन्या विधवा के साथ घुल-मिल गई और उनके साथ रहने लगी। उसने विधवा के बेटे को अपना पति मान लिया। वह माँ-बेटे की सेवा बहू के रूप में करने लगी। विधवा भी देवकन्या को बहू के रूप में पाकर खुश थी।

एक दिन गाँव के सभी लोग एक बड़े तालाब में मछली पकड़ने के लिए गए। विधवा भी उसमें शामिल हो गई। जाते समय उसने देवकन्या से कहा”मेरे धूप में सुखाए हुए कपड़े मत समेटना, मैंने अपना फूलाम गामोछा आज तक किसी को छूने नहीं दिया है। तुम भी हाथ मत लगाना।”

सारे मछुआरे तालाब में उतर गए। तालाब मछुआरों से पट गया। सबने अपने-अपने सामर्थ्य से मछली पकड़ी। सबने अपनी-अपनी खालोई (मछली रखने के लिए बनाई गई बाँस की टोकरी) मछली से भर ली। इतने में चारों ओर अंधेरा छाने लगा और अचानक तेज आँधी-तूफान आया। ओले गिरने लगे। तेज हवा के कारण पेड़ उखड़ने लगे। ऐसा लग रहा था हवा सभी मछुआरों को उड़ा ले जाएगी। सब निरुपाय होकर अपनी-अपनी पोटली समेटकर घर की ओर भागे।

होनी को कौन टाल सकता है। उधर देवकन्या घर में अकेली थी। उसका पति भी घर में नहीं था। उसने देखा तेज बारिश और आँधी तूफान आ रहा है। सासू माँ के कपड़े भीग जाएँगे। क्या करें? भीगने देती हूँ। नहीं यह गलत होगा। जो भी हो मुझे उनके कपड़े समेट लेने चाहिए। नहीं तो भीग जाएँगे।

देवकन्या ने विधवा के सुखाए हुए कपड़ों को न चाहते हुए समेटा। वह उनके वचनों को नहीं रख पाई। वह कपड़े को लेकर रखने भीतर जा ही रही थी उसी समय तेज हवा का झोंका आया और उसे उड़ा ले गया। इतना जोरदार आँधी-तूफान आया कि सब घर-द्ववार उड़ा ले गया।

बात यह थी कि विधवा का जो बेटा था, वह एक देवपुत्र था। वह वायु देवता से आज्ञा लेकर स्वर्ग से मृत्युलोक देखने आया था। निर्धारित समय सीमा पार हो जाने के बाद भी वह वापस नहीं गया, तो वायु देवता ने उसे वापस लाने के लिए देवकन्या को धरती पर भेजा था। देवकन्या वायु देवता की आज्ञा को भूलकर धरती में ही रम गई। उसे उसकी जिम्मेदारी याद दिलाने के लिए वायु देवता विभिन्न प्रकार का रूप दिखा रहे थे। आज की आँधी भी उसी में से एक थी।

देवकन्या को हवा ने उड़ाकर एक बड़े जंगल में पहुँचा दिया। वहाँ उसका रूप बदल गया। वह देवकन्या से एक मोर बन गई। थोड़े समय के बाद काले बादल छंट गए। हवा सुस्त पड़ गई। मोरनी रूपी देव कन्या को अपने स्वामी को देखने की तीव्र इच्छा हुई। वह एक उँचे कटहल के पेड़ पर चढ़ गई। वह अपने पति को पुकारने लगी पर कहीं से उत्तर नहीं मिला। फिर वहाँ से उड़कर वह तालाब के पार सेमल के पेड़ पर जाकर बैठ गई। वहाँ अपनी सास को देखकर केका ध्वनि करने लगी। एक मयूर को केका करते देख विधवा सब बात समझ गई। उसने कहा- “बहू, मैं समझ गई। तुम मेरी बात को नहीं रख सकी, इसके दंडस्वरूप तुम्हारी यह गति हुई है। इसलिए तुम एक मयूर बन गई। जाओ अब जंगल ही तुम्हारा घर है। यदि हमारी याद आए तो मिलने के लिए अवश्य आना।”

सास-बहू के भाग्य में घटित इस दारूण घटना को और कोई जान नहीं पाया। जब भी आसमान में काले-काले बादल घिर आते, मोर को अपना पति और सासू माँ की याद आती। वह केका ध्वनि करती हुई खुले मैदान, पहाड़ों की ढलान आदि में निकल आती है। अपनी ऊँची केका ध्वनि से अपने पति और सास को बुलाती। यही कारण है कि आज भी काली घटाओं को छाते देख मोर निकल आते हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’