param vairagya
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विटोबा की नगरी, पंढरपुर में सभी बिठ्ठल भगवान के भक्त हैं। उन्हीं भक्तों में से एक थे रांका। रांका अनढ़ और बहुत गरीब थे। उनका रांका नाम सार्थक था। वे गृहस्थ थे और बिठ्ठलनाथ की कृपा से उनकी पत्नी वैराग्य में उनसे बीस ही थीं। जंगल से लकड़ियां बटोरकर लाना और उन्हें बाजार में बेचकर जो कुछ मिल जाता था उसी से उनका गुजर-बसर चल जाता था।

उनकी दीनता देख महान संत नामदेव को बड़ी दया आई। वे बिठोबा के बड़े लाडले भक्त थे। उन्होंने भगवान बिठ्ठल से प्रार्थना की कि ‘आपका परम भक्त कितना दुःखी है, यह आपको क्यों नहीं दिखता? “बिठ्ठलजी मुस्वफ़ुराए और बोले-” नामदेवजी! रांका एक योगी है उसके लिए स्वर्ण और मिट्टी समान है।” रांका को तो अपनी गरीबी ही प्रिय है। वह तो परम वैराग्य प्राप्त कर चुका है। जो लेना ही न चाहे उसे दिया कैसे जाए? विश्वास न हो तो कल वन में छिपकर देख लीजिए। दूसरे दिन प्रातः रांका अपनी पत्नी के साथ प्रतिदिन की भांति जंगल में लकड़ियां बटोरने चले जा रहे थे।

इतने में प्रभु ने रास्ते में स्वर्ण मोहरों से भरी एक थैली रख दी। पत्नी कुछ पीछे रह गई थी। रांका ने मोहरों से भरी थैली देखी और रुक गए। उसके बाद वे मोहरों को मिट्टी से ढकने का प्रयास करने लगे। उन्होंने सोचा कि औरतों को सोना बहुत-पसंद है यदि उनकी पत्नी ने देख लिया तो उन्हें कहीं सोने से मोह न हो जाए। इतने में उनकी पत्नी पास आ गईं। उन्होंने कारण जानना चाहा तो रांका ने सब कुछ बता दिया। उसके बाद उनकी पत्नी मुस्वफ़ुराने लगीं और ‘बोलीं नाथ आप स्वर्ण पर मिट्टी डालने का व्यर्थ का श्रम कर रहें हैं, हमारे लिए भला सोने और मिट्टी में फर्क ही क्या है? यह सब देखकर नामदेव मुस्वफ़ुराने लगे और वापस अपने रास्ते पर चल दिए।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)