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Panchatantra Stories in Hindi PDF - शरारती बंदर की मुसीबत

पात्र-परिचय हवा दीदी निक्का, निक्की और मोहल्ले के अन्य बच्चे ऊधमी बंदर तथा कुछ अन्य बंदर बंदरों का मुखिया एक धनी व्यापारी, उसकी माँ, परिवार के लोग तथा मित्र मंदिर के निर्माण में जुटे कुछ मजदूर

पहला दृश्य

(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान, जिसमें एक तरफ बच्चे खड़े-खड़े बातें कर रहे हैं। तभी हवा तेजी से बहती हुई आती है और बच्चों को मजे से बातें करते और खेलते देख, ठिठक जाती है। फिर हवा दीदी बच्चों के पास आकर बड़े उत्साह से बताने लगती है….)

हवा दीदी : अरे वाह-वाह, क्या बात थी? सचमुच क्या अजब बात…?

निक्का : क्या हुआ हवा दीदी, क्या हुआ?

निक्की : अरे हवा दीदी, तुम फिर कोई किस्सा सुना रही हो?

निक्का : अच्छा हवा दीदी, क्या तुम फिर जंगल से आ रही हो?

निक्की : मीलों दूर…मीलों दूर जंगल से?

हवा दीदी : (मजे में सिर हिलाते हुए) हाँ-हाँ, बिल्कुल। मैं बड़े घने जंगल से गुजरकर आ रही हूँ जहाँ गज्जू दादा पंचतंत्र की कथाओं पर बड़े ही मजेदार नाटक पेश कर रहे हैं।

निक्की : बिल्कुल…?

निक्की : तुम इतना कैसे चल लेती हो हवा दीदी?

हवा दीदी : अरे बुद्ध, चल कैसे लेती हूँ, इसका जवाब तो फिर कभी पूछ लेना। पर अभी यह तो जान लो कि मैं जंगल में आज कौन सा गजब का नाटक देखकर आई हूँ?

निक्का : नाटक! ओहो, तो वह तो हम भी देखेंगे।

निक्का : हम भी…हम भी!

हवा दीदी : ठीक है, ठीक है। तो देखो अब कि दूसरों का कहना न मानने वाले शरारती बंदर की क्या हालत हुई?

दूसरा दृश्य

(स्थान-दक्षिण दिशा में किसी नगर में एक व्यापारी रहता था। व्यापारी धार्मिक स्वभाव का था। एक बार उसके मन में आया कि मुझे देव मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए। उसने मित्रों और परिवार वालों से कहा, तो सबने खुशी प्रकट की।)

व्यापारी की माँ : बेटा, यह नेक काम तो जितनी जल्दी हो जाए, उतना ही अच्छा है।

व्यापारी के मित्र : हाँ हाँ मित्र, माँजी बिल्कुल ठीक कह रही हैं मित्र। हमारी मदद की कोई जरूरत हो, तो जरूर बताना। इसलिए कि मंदिर के निर्माण में सहयोग करना तो बड़े पुण्य का काम है।

व्यापारी : क्यों नहीं? मैं चाहता हूँ, मंदिर बड़ा भव्य बने, भले ही इसमें कितना ही समय लग जाए।

(मंदिर का निर्माण कार्य तेजी से हो रहा है। वहाँ ईंटें, पत्थर, लकड़ी का सामान और निर्माण कार्य में काम आने वालीं दूसरी ढेर सारी चीजें पड़ी हैं। दर्जनों मजदूर और कारीगर बड़े उत्साह से मंदिर के निर्माण में जुटे हैं।)

एक मजदूर : (थोड़ी फुर्सत में) कुछ भी कहो, सेठ जी ने मंदिर बनवाने में कोई कसर नहीं रखी। लगता है, बड़ा ही सुंदर मंदिर बनेगा।

दूसरा मजदूर : फिर वे मजदूरों का भी तो कितना खयाल रखते हैं। हम सबके खाने-पीने और रहने का प्रबंध वही कर रहे हैं। और फिर मजदूरी भी तो अच्छी दे रहे हैं।

तीसरा मजदूर : सेठ जी की माता का स्वभाव भी बड़ा अच्छा है। बड़ी दयालु हैं। लगता है, इसी का प्रभाव सेठ जी पर पड़ा है।

(एक दिन मजदूर दोपहर को खाना खाकर कुछ देर के लिए विश्राम कर रहे थे। पिर जिस स्थान पर मंदिर का निर्माण हो रहा था, वहीं आसपास बंदरों की एक टोली भी रहती थी। जिस समय कारीगर छाया में विश्राम कर रहे होते, शरारती बंदरों की टोली वहाँ आकर खूब उपद्रव करती। कुछ बंदर पत्थरों के ढेर पर चढ़कर कूदते तो कुछ वहाँ पहुँच जाते, जहाँ लकड़ी का काम चल रहा था। और फिर उनकी ऊधमबाजी और अजीबोगरीब शरारतें शुरू हो जातीं।)

पहला मजदूर : इन बंदरों ने बड़ी आफत मचा रखी है। थोड़ा धमकाना पड़ेगा।

दूसरा मजदूर : हाँ, देखो ना, इतनी चीजें यहाँ पड़ी हैं। कोई चीज इधर की उधर हो गई तो?

तीसरा मजदूर : मुझे तो यह चिंता है कि यहाँ इतने औजार बिखरे पड़े हैं। कहीं ये उनसे खुद को नुकसान न पहुँचा लें।

चौथा मजदूर : अभी उठकर इनकी अच्छी तरह खबर लेता हूँ।

पहला मजदूर : भाई, मारना मत। बस, दूर से धमका दो, ताकि ये दूर चले जाएँ। बस, इतना ही काफी है।

तीसरा दृश्य

(एक दिन बंदरों की टोली इसी तरह अजीबोगरीब करतब और शरारतें कर रही थी। तभी अचानक एक बंदर का ध्यान लकड़ी के तख्ते की ओर गया। उस तख्ते को बीच से चीरकर उसमें एक बड़ी सी कील फँसा दी गई थी। शरारती बंदर को अब एक नया खेल सूझ गया।)

शरारती बंदर : यह कील इस तख्ते में क्यों गाड़ी गई है। चलो, मैं इसे निकालता हूँ।

एक बंदर : (प्यार से समझाते हुए) ऐसा मत करो भाई। इसमें कुछ खतरा हो सकता है।

शरारती बंदर : (बेफिक्री से हँसते हुए) होने दो जी, होने दो। मुझे कोई परवाह नहीं। आखिर मैं लायक बंदर हूँ, सबसे लायक। कुछ लोग तो मुझे बंदरों में सबसे तेज और चतुराई में नंबर वन कहते हैं क्योंकि मैं हर चीज में नए-नए खेल जो निकाल लेता हूँ। (फिर अचानक तख्ते में गड़ी कील की ओर इशारा करते हुए अपने आप से) अरे वाह, रे वाह, यह तो बड़ा मजेदार खेल है। मैं इस कील को उखाड़कर ही रहूँगा, चाहे कुछ भी हो जाए।

(वह अब बीच से चीरे गए उस लकड़ी के तख्ने में से कील निकालने के काम में जुट गया। लेकिन कील भी अंदर तक फँसी हुई थी। वह भला इतनी आसानी से कैसे निकल जाती? बंदरों के मुखिया ने उसे रोका…)

बंदरों का मुखिया : भाई ऐसा न करो। इससे तुम्हें खामखा चोट लग सकती है।

शरारती बंदर : (सिर मटकाता हुआ) असल में मैं देखना चाहता हूँ कि इस तख्ते में यह कील क्यों गाड़ी गई है। और इसे निकालने पर होता क्या है?

बंदरों का मुखिया : (गुस्से में) तो ठीक है, जो तुम्हें ठीक लगे, वह करो। बाद में मत रोना कि हाय-हाय, यह क्या हो गया?

शरारती बंदर : (जोर से हँसते हुए) होगा क्या? मुझे तो मजा आ रहा है, मजा।

(ऊधमी बंदर अपने काम में लगा रहा। आखिर उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस कील को खींचा तो कील तो बाहर आ गई। लेकिन साथ ही उस चिरे हुए तख्ते के दोनों हिस्से एकाएक तेजी से मिले और बंदर के शरीर का पिछला हिस्सा उसमें आ गया। बंदर के कुछ अंग बुरी तरह कुचले गए।)

शरारती बंदर : (जोर से चिल्लाता हुआ) हाय-हाय, मरा। बचाओ, बचाओ!

(पर मजदूर तो दूर विश्राम कर रहे थे। फिर भला कौन उसे बचाने के लिए आता? थोड़ी ही देर में बंदर के प्राण-पखेरू उड़ गए। उसके चेहरे पर गहरे पछतावे की छाया थी…)

शरारती बंदर : (चेहरे पर दुख की छाया) मैंने बेकार अपनी शरारतों से यह मुसीबत मोल ले ली। मुझे खामखा बिना चीजों को देखे-परखे इतनी छेड़छाड़ करने की क्या जरूरत थी?

चौथा दृश्य

(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान। बच्चे हवा दीदी को घेरकर खड़े हैं और उससे बातें कर रहे हैं।)

हवा दीदी : तो देखा न, खुद को तीस मार खाँ समझने वाले शरारती बंदर का हाल?

निक्का : (हँसते हुए) हाँ दीदी, और यह भी समझ में आ गया कि हमें क्या नहीं करना चाहिए।

निक्की : और क्या नहीं बनना चाहिए?

हवा दीदी : हाँ हाँ, बताओ-बताओ, हमें क्या नहीं करना चाहिए और क्या नहीं बनना चाहिए?

निक्का : (अजीब सी मुद्रा में) मैं बताऊँ हवा दीदी, हमें बंदरपना नहीं करना चाहिए।

निक्की : (हँसते हुए) और हवा दीदी, हम कुछ भी बनें, पर हमें ऊधमी बंदर तो बिल्कुल नहीं बनना चाहिए।

हवा दीदी : (प्यार से सिर हिलाते हुए) बिल्कुल ठीक, यानी तुम समझ गए कि पंचतंत्र के इस अनोखे नाटक की सीख क्या है?

निक्का : हाँ-हाँ हवा दीदी।

निक्की : हाँ-हाँ।

हवा दीदी : (हाथ हिलाकर दूर जाते हुए) अच्छा, तो अब इजाजत दो। मैं चली दूर, बहुत दूर, ताकि अगली बार जंगल से तुम्हारे लिए एक और मजेदार नाटक ला सकूँ।

(हाथ हिलाती हुई हवा दीदी विदा लेती है। बच्चे हाथ हिलाकर विदा कर रहे हैं। निक्का और निक्की के चेहरे सबसे अलग नजर आ रहे हैं।)

(परदा गिरता है।)

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