भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
जम्हाई लेते हुए अक्षत ने दरवाजे पर पड़ा अखबार उठाया ही था कि ठिठक गया। ‘रविवार को भला कौन पत्र दे गया।’ सोचते हुए उसने वो बंद लिफाफा भी उठा लिया, जिस पर पते की जगह केवल उसके पापा का नाम लिखा हुआ था। अक्षत ने दोनों चीजें पापा के हवाले की और खुद उनके पास खड़ा हो गया। अब उनकी उत्सुकता इस बात में थी कि आखिरकार इस लिफाफे में भला क्या बला है।
और लिफाफे में मौजूद एक छोटा-सा कागज का टुकड़ा वाकई उनके लिए किसी बला से कम न था, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- “आज भरी दोपहर तुम्हारे घर डकैती पड़ेगी। रोक सको तो रोक लो-डाकू शातिरसिंह व गिरोह”
अब अक्षत की बड़ी बहन सलोनी और मम्मी भी पापा के इर्द गिर्द मौजूद थे।
“मुझे तो ये किसी की शरारत लगती है। भला आज के जमाने में डाकू-वाकू कहां?” पापा बोले।
“सही कहा पापाजी, यूं भी डाकू किसी को पहले पत्र भेजकर सावधान नहीं करते।” अक्षत ने कहा।
“मेरी मानो तो आप एक बार पुलिस स्टेशन जाकर इस पत्र के बारे में बता दीजिए।” मम्मी ने भोलेपन से कहा तो वे तीनों हंस दिए।
“डाका पड़े न पड़े, तुम शहर भर में मेरा जुलूस जरूर निकलवा दोगी। अरी भागवान, चिंता क्यों करती हो। हमारे पास-पड़ोस में भी घर हैं। चलती सड़क है। ऐसे कैसे कोई हमारे घर आ धमकेगा भला।” पापा ने समझाया तो लेकिन मम्मी के चेहरे से तनाव कम न हुआ।
धीरे-धीरे सभी अपने कामकाज में लग गए। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजते ही वे चौंक गए और सुबह मिला पत्र उनकी आंखों के सामने तैर गया। सलोनी दरवाजा खोलने बढ़ी ही थी कि पापा ने उसे रोक दिया, “ठहरो, मैं देखता हूं।”
अक्षत अपना बैट उठाए पापा के पीछे बढ़ गया, जबकि सलोनी ने मोबाइल पर 100 नंबर दबाकर रख लिया ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत पुलिस को कॉल की जा सके। मम्मी सीढ़ियों पर खड़ी हनुमान चालीसा बुदबुदाने लगी।
दरवाजा खोलने से पहले पापा ने भीतर से पूछा, “कौन है?”
“अजी घबराइए मत, दरवाजा तो खोलिए।” बाहर से आवाज आई तो पापा ने झटके से दरवाजा खोल दिया। बाहर अपने छोटे भाई संजीव व उसके परिवार को देख उनकी जान में जान आई।
“क्या भाईसाहब, दरवाजा खोलने में इतनी देर लगा दी।” संजीव की नजर अक्षत पर पड़ी तो हैरानी से बोले, “और भतीजे, तुम ये बैट उठाए किसके सिर पर मारने लगे थे?”
“अरे नहीं चाचाजी, वो तो मैं इसे उठाकर दूसरे कमरे में ले जा रहा था।” अक्षत झेंप गया।
“आज रविवार था तो हम सबने सोचा कि आज अचानक आपके यहां आकर इस दिन को यादगार बनाया जाए। हम भले ही एक शहर में रहते हैं, पर आपस में मिले तो जमाना हो जाता है।” संजीव ने भीतर आते हुए कहा। उनके दोनों बच्चे प्रथम और वंशिका, अक्षत और सलोनी के साथ दूसरे कमरे में चले गए, जबकि दोनों भाई और उनकी पत्नियां ड्राइंग रूम में बैठकर बातचीत करने लगे।
“भाभीजी, सच कहूं तो आपके लजीज खाने का स्वाद ही मुझे यहां खींच लाया है। अब आप…” बातूनी संजीव की अधूरी छोड़ी गई बात का मतलब समझते ही मम्मी उठ खड़ी हुई, “देवरजी, आप दोनों भाई गपशप कीजिए। मैं झटपट आपकी पेटपूजा का इंतजाम करती हूं।” संजीव की पत्नी मीरा भी उनका हाथ बंटाने किचन में चली गई।
दोपहर हो चली थी। अक्षत के मम्मी-पापा संजीव को सपरिवार घर आया देख खुशी व उत्साह का अनुभव करते सोच रहे थे कि यदि कोई चोर-डाकू आया भी तो उससे अब आसानी से निपट लिया जाएगा।
मम्मी ने लंच में कई तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए। जिन्हें खाकर दोनों परिवारों के सभी सदस्यों के दिल बाग बाग हो गए। बतियाने व थोड़ा आराम करने के बाद शाम को संजीव अपने परिवार समेत लौट गया।
“आज का रविवार बहुत बढ़िया बीता। संजीव का सरप्राइज भी क्या खूब था।” पापा सोफे पर पसरे ही थे कि अक्षत का हैरानी भरा स्वर सुनाई दिया, “अरे पापा ये देखिए एक और खत! दरवाजे के पास पड़ा था।” उसने सुबह जैसा एक और लिफाफा अपने पापा को थमाया तो सबकी सांसें जैसे रूक गई।
“आपके यहां डकैती पड़ ही गई, वो भी लजीज खाने की। इस डकैती में खुशी-खुशी सहयोग देने के लिए मेरा पूरा गिरोह आपका ऋणी रहेगा।-डाकू शातिरसिंह”
खत के नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी तारीख देखकर सबके मुंह से एक साथ निकला, “एक अप्रैल!”
“और शातिर डाकू हमारे यहां डाका डालकर हम सबको अप्रैल-फूल भी बना गया।” पापा की हंसी थमने का नाम ही नहीं ले रही थी, “वाकई शातिर निकला मेरा छोटा भाई। अपने भाई को भी नहीं बख़्शा।”
“वैसे ऐसे डाके आगे भी पड़ते रहें तो उसमें बुराई ही क्या है। कोई तो है जो मेरे खाने की तारीफ करता है।” कहते हुए मम्मी भी मुस्करा उठी थी। जबकि सकपकाए अक्षत ने तय कर लिया था कि अगली बार वह भी पहली अप्रैल पर अपने चाचा को नहले पे दहला देकर दिखाएगा।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
