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Nariman ki Kahaniyan: आत्म-सम्मोहन-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब
Aatm- Sammohan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Nariman ki Kahaniyan: दूसरी बार बेल बजने पर, उसने बालों में ब्रश मारना रोक कर मोबाईल उठाया। “हां सुदीप” कहते ही उसने स्पीकर ऑन कर, मोबाईल को ड्रेसिंग टेबल पर रखा और फिर शीशे के सामने खड़े होकर बालों को संवारने लगी। सामने दीवार पर लगी घड़ी दस बज कर इक्कीस मिनट का समय दिखा रही थी। अभी दस-पन्द्रह मिनट और उसे तैयारी में लगेंगे। बीस-पच्चीस मिनट के.एफ.सी रेस्तरां में पहुंचने में। वहां भी कई बार बहुत भीड़ रहती है, खास करके इतवार को और आधा घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

“दीदी, क्या हाल है?” सुदीप ने अपने जाने-पहचाने अंदाज में कहा, “और जीजाजी और बच्चे कैसे हैं?”

“सब ठीक हैं। तुम अपनी सुनाओ?” आवाज सपाट थी, कोई स्नेह नहीं जैसा वह अक्सर करती थी। मन में था. यदि कोई काम की बात है तो करें नहीं तो फोन बंद करे। आज का दिन वैसे भी बहत व्यस्त होने वाला था। मुश्किल से ही सप्ताह में एक छुट्टी आती है। इस दिन कितने ही काम करने वाले होते हैं। आज नितिका की सहेली रिंकल का जन्मदिन था। वहां आठ-दस परिवार एकत्रित हो रहे थे। उसकी सहेलियों के परिवारों को भी आमंत्रित किया गया था। सात बजे केक काटा जाएगा, फिर डी. जे. डांस, खाना-पीना, कोक और स्नैक्स से लेकर व्हिस्की, चिकन, तक सब कुछ था। दस बजे डिनर। उस घेरे के जन्मदिन की पार्टियां आम तौर पर बच्चों के बहाने अपनी हैसियत की प्रदर्शनी का मौका होती। व्यापार व बिजनेस के ताने-बाने फैलाने के अवसर और महिलाओं के लिए अघोषित तौर पर सुन्दरता मुकाबले का एवंट।

“कोई खास नहीं, पापा जी की चेस्ट-पेन नहीं हट रही। डॉक्टर कहता, एक बार सारे टैस्ट करवा लो। डॉयगनोंज तो हो कि आखिर बीमारी क्या है?” सुदीप ने कहा, परन्तु उसका सारा ध्यान अपने बाल संवारने पर ही लगा रहा और मन ही मन वह सोच रही थी, ‘उस दिन रूबी कैसे गर्दन मटका-मटका कर बातें कर रही थी। उसका सारा जोर इस बात पर था कि वह कैसे अपने बालों की कलर-साईनिंग दिखा सके। ना शक्ल, ना अक्ल, जैसे भूतनी हो। जब किसी पार्टी पर जाना हो, ब्यूटी पार्लर में जाकर ही तैयार होती है। आज उसने अपनी ब्यूटी पार्लर वाली से शाम को पांच से साढ़े छः बजे तक का टाइम बुक किया है। वहीं से सीधा पार्टी में।

“ठीक है! करवा लेने चाहिए!” उसने लापरवाही से समर्थन किया। उसके बताने के पीछे जो अनकहा हो सकता था, उस ओर उसका ध्यान नहीं गया या उसने ज्यादा महसूस ही नहीं किया। जेहन में तो कुछ ही उत्तेजना और बेचैनी भरी थी। आने वाली पार्टी के कल्पित दृश्य, उसकी मौजूदगी का जलवा! अमरपाली बूटीक से उसने पिछले ही दिनों नया सूट खरीदा था, एकदम नए फैशन का। कमीज का कमर से यू-कट काफी ऊंचा था। किनारी पर लगी रंग-बिरंगी झालर। आराम से खड़े होने पर तो कम नजर नहीं आती थी परन्तु चलते या झुकते हुए झालर से जिस्म के फ्लैश लगातार उभरते थे। साथ ही खुला-सा पजामानुमा सलवार, जो टखने से कुछ ऊंची थी। बूटीक वाली का कहना था, “एकदम नया डिजाईन तैयार किया है। बहुत दिमाग लगाया है इस पर। एक बार आप इस सूट में मार्किट में गई तो देखना, सभी की आंखें खुली की खुली रह जाएंगी।” उसने उसी समय उसे ट्राई किया, उसे पसंद आ गया। मंहगा तो था, ‘चार झालर लगा कर बारह हजार मांग लिए। क्या है इसमें ऐसा? ‘बारह हजार’, सुन कर वह कुछ सोच में पड़ गई। परन्तु इस दुविधा को तुरन्त बूटीक वाली मिसेज संधू ने ताड़ लिया, “मैम! बारह हजार भी आप के लिए हैं, आप हमारे रैग्लुर कस्टमर हैं। अन्य किसी को तो मैं पन्द्रह से कम नहीं देती। हमारा टेलर मास्टर चार दिन लगा रहा इस पर! कितना कपड़ा खराब हुआ, इस आखिरी डिजाईन पर पहुंचने तक। यह एकदम हमारा अपना डिजाईन है, ओरजिनल! अभी दो ही सूट तैयार किए हैं। एक हम डिस्पले पर रखेंगे।” बात करते हुए उसने अदा से सूट को परे सरका दिया और शो-केस की ओर इशारा किया, “आप कोई और देख लें।” प्रतिदिन की व्यवहार-कुशलता से वह जान चुकी थी कि वह इसे अवश्य खरीदेगी। किसी भी कीमत पर खरीदेगी।

“जीजा जी, घर पर हैं!” कुछ देर बाद सुदीप की आवाज फिर सुनाई दी। वह शायद बहन के जवाब की प्रतीक्षा कर रहा था, लेकिन वह तो भूल ही गई थी कि फोन चल रहा है और दूसरी ओर सुदीप है।

“हां, लेकिन अभी निकलने वाले हैं।” उसने नपे-तुले शब्दों में कहा।

“मैं सोच रहा था, अगर वह हमें बस-स्टैंड से ले लेते।”

सुन कर जैसे वह चौंक गई। मतलब, आज के सारे प्रोग्राम का कबाड़ा। लेकिन वह ऐसे कैसे कर सकती थी या राजन और बच्चे कैसे सहजता से इस बात को स्वीकार कर लेते। “उनके कामों का तुम्हें मालूम ही है। इधर-उधर, सारा दिन ही उन्हें भटकना पड़ता है। पता नहीं कब किस का फोन आ जाए, उसी समय पहुंचना होता है।” उसने स्वीकृति देने की बजाए टाल दिया। होशियारपुर से वहां तक पहुंचने में सवा घंटा, फिर अड्डे से किसी लैब तक जाओ। वहां मालूम नहीं सैंपल की बारी कब तक आए, कब रिपोर्ट मिले, उतनी देर…? “अब जो होशियारपुर में भी बहुत अच्छी लैब है। टैस्ट जहां से मर्जी करवा लो, अधिक हुआ तो रिपोर्टस यहां किसी स्पेशलिस्ट को दिखा लेंगे।” उसने बात को टालने के लिए दूसरी ओर ही धकेल दिया। उसका ध्यान अपने बालों या शीशे में झलकते अपने अक्स पर था। जब से उसने ‘स्टार स्टडी इंमीग्रेशन’ का ऑफिस ज्वाइन किया था, अपने बाल छोटे करवा लिए थे, तरूणा जैसे, जो मुश्किल से कंधे तक पहुंचते थे। इससे उसे अपनी उम्र भी काफी कम दिखाई देती थी। उसने अपने शरीर की देख-रेख में अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया था। हर पन्द्रह दिनों के बाद वह नियम से अपने बालों की ट्रीमिंग करवाती थी। ‘नेचुरल ब्यूटी पार्लर’ से उसने चार हजार का ‘मंथली-पैकेज’ ले लिया था। इसमें एक सप्ताह छोड़ कर बालों की ट्रीमिंग भी शामिल थी। एक बार फुल बॉडी वैक्सिंग व मसाज। नाखूनों और आंखों के साथ प्रत्येक अंग की विशेष संभाल व तराश। एक बार पार्टी मेकअप। यदि एक बार से अधिक हो जाता तो उसके पांच सौ रुपए अलग से लगते थे।

“मम्मा! अब चलें ना! बहुत भूख लगी है।” बैडरूम से निकलती नितिका, उसके पास आकर खड़ी हो गई। उसने मां को सीधे देखने की बजाए शीशे से झलकते उसके प्रतिबिंब को देखा। दोनों बच्चों को तैयार कर, उसने पहले ही उन्हें टी. वी. के सामने बिठा दिया था, राजन के पास। यह तैयारी रेस्तरां में नाश्ता करने, वहां से पी. वी. आर. में फिल्म देखने जाने के लिए थी। पार्टी की तैयारी बाद में की जानी थी। अक्सर इतवार को वे नाश्ता बाहर ही करते थे। कभी ‘शान पंजाब’ में अमृतसरी नान, फौजी रेस्तरां में पनीर के परौंठे, के.एफ.सी. में पीजा कोक या फिर शहर के लगभग हर रेस्टोरेंट. ढाबें या होटल के खाने का स्वाद व रेट उन्हें मालम थे। इतवार के नाश्ते, लंच और डिनर के प्रोग्राम पहले ही बन जाते थे।

“चलते हैं, बेटा बस और पांच मिनट। आप पापा के साथ बैठो!” उसने उसे भेज दिया। टी. वी. पर हनुमान संबंधी एक सीरियल आ रहा था। राजन उसे देखने में व्यस्त था। यह सीरियल उसका भी मनपसंद था, वह भी उसे कम ही मिस करती थी, परन्तु आज…।

“वह तो ठीक है, लेकिन हर कोई सलाह देता है, जालंधर ‘फेथ’ से करवाओ। डॉक्टर ने भी यही रिकमैड किया है। पापा जी को भी लगता है!” सुदीप ने कुछ देर इंतजार करने के बाद कहा।

“आ जाओ फिर! बस अड्डे से कपूरथला के लिए ऑटो चलते हैं, वो ले लेना। इसी रोड़ पर है ‘फेथ’। जब वहां से फारिग हो गए तो फोन कर लेना, फिर देखते हैं। वैसे आज बुरी तरह से फंसी हुई हूं। नितिका की सहेली का जन्मदिन है। वह कितने दिनों से इसकी तैयारी कर रही है, उसके साथ वहां भी जाना है। दो एजेंट से मुलाकात तय है, वे कुछ नए एजेंटों से मिलवाएंगे।” वह मनगढ़त विस्तार देने लगी। बिना किसी नतीजे पर पहुंचे ही बात को खत्म करने के इरादे से बोली, “फारिग होकर फोन कर लेना!” लेकिन इससे पहले कि ओ.के. कहती, शायद सुदीप को इस बात का एहसास हो गया था कि उसे टाला जा रहा है। उसने झिझकते हुए कहा, “अगर कुछ पैसे दे देते! बहुत जरूरत थी। मुझे तो दो महीने से तनख्वाह ही नहीं मिली, फैक्टरी का काम बस ऐसे ही चल रहा है।” उसने जैसे स्पष्टीकरण दिया।

“हूं, तो असल बात यह है!” उसने मन ही मन सोचा। उसके हाथों का क्रश रुक गया। एक पल के लिए वह झिझकी, क्या कह ? सुदीप की मजबूरी को समझ गई परन्तु अगले ही पल वह फिर से लापरवाह हो गई, “पैसे तो सुदीप अभी नहीं हो पाएंगे। इन्होंने पिछले महीने ही नई डिजाईर ली है। तीन लाख उसकी डाऊन पैमेंट करनी पड़ी, तीस हजार महीने की किश्त है। पच्चीस हजार कोठी की किश्त है, बच्चों की फीस, बिजली, पेट्रोल, इस महीने पचास हजार पसनल लोन का भुगतान किया है।” पसर्नल लोन की बात उसने फालतू में ही जोड़ ली थी। वैसे इन पैसों को लौटाने के बारे में पिछले चार-साढे चार सालों में उसने कभी गंभीरता से नहीं सोचा था। वह भी जैसे राजन की तरह ही ढलने लगी थी, क्या हुआ अगर सात लाख दे दिए। बिजनेस में ही लगाए हैं, कोई जुआ तो नहीं खेला। लोग-बाग तो दामादों को बिजनेस तक खोल कर देते हैं।” इन मामलों में राजन बहुत ढिठाई से सोचता था. पारंपरिक दामाद की भांति। वह हमेशा इस बात का ध्यान रखता, हमारे जाने पर उन्होंने क्या किया और यहां आने पर उनके लिए क्या लेकर आए।

पहले-पहल उसे राजन का यह व्यवहार बहुत चुभता रहा, फिर धीरे-धीरे वह उसकी तरह ही सोचने लगी। आत्म-सम्मोहन में खोने लगी। उसे लगने लगा, यह उसका अधिकार है। जैसे वह आस-पास से सुनती, ‘फलां’ ने अपनी बेटी को यह दिया। प्रसव के समय यह लाए या व्रत के समय यह सामान दिया आदि। उसे लगता, उसके मायके वालों को भी यह सब करना चाहिए। उनकी माली हालत के बारे में जानते हुए भी उसकी इच्छाएं बढ़ती गई।

उसकी इच्छाएं स्कूल में छठी-सातवीं क्लास से ही बढ़ने लगी थीं। वह अपने कपड़ों, बनने-संवारने में अधिक ध्यान देती। नवीं कक्षा तक पहुंचते ही वह स्कूल के सारे लड़कों तो क्या, अध्यापकों की नजरों का भी केन्द्र बन गई। जब भी स्कूल में कोई फंक्शन होता या किसी वी.आई.पी का आगमन होता तो उसे ही फूलों से स्वागत करने, अभिवादन करने या कोट-कमीज पर बैज लगाने का काम सौंपा जाता। मैडम एक-दो दिन पहले ही उससे कह देती, “श्रेया! कल बन-संवर कर आना।” मध्यवर्गीय परिवार की हालत भले अधिक अच्छी नहीं थी परन्तु मां कुछ चाव से, कुछ जिद के कारण, उसकी इच्छाओं की पूर्ति की कोई न कोई राह निकाल ही लेती। घर में राम प्रसाद अकेले ही कमाने वाला था। तीन बच्चे। बड़ी सुजाता, उससे छोटी वह। उसके बाद कौशल्या को दो बार एबोर्सन करवाने पड़े क्योंकि दोनों बार मादा भ्रूण निकले। तीसरी बार भी अगर लड़का ना होता तो शायद…।

सुदीप के जन्म तक, घर में वही सभी की नजरों का केन्द्र रही। वह बचपन से ही बहुत सुन्दर थी। सुदीप के जन्म के बाद उसकी ओर ध्यान कम दिया जाने लगा था। जिससे वह चिढने लगी। मां की गोद में सदीप को देख कर वह मां से उसे गोदी में लेने की जिद करने लगती। दांव लगने पर सुदीप की पिटाई भी कर देती। घर की भले बंधी-बंधाई आमदनी थी परन्तु जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगे, मुश्किलें बढ़ने लगी। तीन बच्चों की पढ़ाई का खर्चा, खाना-पीना, कपड़े-लत्ते। मुहल्लेदारी में एक खास प्रकार का जीवन-स्तर बनाए रखने की मजबूरी भी थी। शहर के मध्य में बने पुराने मुहल्ले राम नगर में चार माले में बने दो कमरे। गली से जुड़ा बाथरूम, लैटरीन। आस-पास भी उसी आर्थिक स्थिति वाले ही परिवार थे परन्तु हर कोई अपनी हैसियत को दूसरे से बेहतर समझता था। इसलिए कुछ खर्च अपनी चादर से बाहर भी हो जाते थे।

सुजाता को प्लस-टू के बाद छः महीनों का कटिंग एंड टेलरिंग का डिप्लोमा करवाया गया और आदमपुर में कंप्यूटर सैंटर चलाने वाले एक लड़के से उसे ब्याह दिया गया। प्लस-टू के बाद राम प्रसाद ने उसे भी वही डिप्लोमा करवा कर ब्याहने के बारे में सोचा। परन्तु वह इंजीनियरिंग करने के लिए जिद करने लगी। उसकी अधिकतर सहेलियां इंजीनियरिंग या नर्सिंग की ओर जाने के बारे में सोच रही थी। कुछ पढ़ाई के आधार पर बाहर जाने के लिए आईलैटस या इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स करने की सलाह करने लगी। राम प्रसाद ने तो एकदम हाथ खड़े कर दिए और कहा, ‘मुझमें इतनी हिम्मत नहीं।’ उसने बी.कॉम करने की स्वीकृति मुश्किल से दी। वह भी सरकारी कॉलेज से, जहां फीस कम थी। इन बातों से उसके भीतर परिवार के लिए खीझ उमड़ने लगी। जब कभी अपनी पुरानी सहेलियों से मिलती, उनकी बातें सुन कर उसका सीना चाक होने लगता। साथ ही उसे अपने मां-बाप पर गुस्सा आने लगता। सोचती, ‘ऐसे मां-बाप को गोली मार देनी चाहिए। अगर पढ़ा-लिखा नहीं सकते तो पैदा करके लाईन लगाने की क्या जरूरत थी। बस लड़का चाहिए। अगर दो एबोर्सन के बाद भी लड़का पैदा ना होता तो पता नहीं और कितने कत्ल करते ये लोग!”

बी.कॉम के आखिरी वर्ष में ही उसके लिए राजन का रिश्ता आ गया। उसकी मौसी की रिश्तेदारी से परिवार था। किसी विवाह के समय उसकी होने वाली सास कृष्णा देवी ने उसे पसंद कर लिया और मौसी को बात चलाने के लिए जोर दिया। “हमें कुछ नहीं चाहिए। भले तीन कपड़ों में लडकी भेज दे। हम बाद में रिसेप्सन भी करेंगे।” रिश्ता आते ही घर भर में उत्साह फैलने लगा। अर्बन एस्टेट में आठ मालों की दो मंजिली कोठी, इकलौता लड़का। अर्बन एस्टेट की मेन मार्किट में ही ‘बहल प्रॉपर्टीज’ का शानदार दफ्तर। उसकी सुन्दरता ने परिवार को आकर्षित किया था और उन्हें बहल की शानो-शौकत ने। यदि यह पढना चाहेगी तो हम इसे सी. ए. करवा देंगे। हमारा परिवार कौन-सा बडा है. जो अधिक काम होगा। फिर घर के कामकाज के लिए फुल टाईम नौकरानी है।’

विवाह हो गया। भले राम प्रसाद को अपनी हैसियत से अधिक खर्च करना पड़ा। इस मौक पर उसका ई.पी.एफ. काम आया। कुछ कौशल्या के गहनें काम आए। उस घर में आकर श्रेया की आंखें चुंधिया गई। आने-जाने के लिए कार, बनने-संवरने के लिए ब्यूटी पार्लर, शोपिंग के लिए मॉल या फिर घूमना-फिरना। बन-संवर कर पार्टी में जाना। इन पार्टियों/डिनर्स का सिलसिला जब कम हुआ तो उसे पहला झटका राजन की ओर से लगा। जब उसे मालूम हुआ कि वह दसवीं पास भी नहीं है। वह हर बात अपने मां-बाप, खास करके मां से पूछ कर करता। यहां तक कि बाजार शोपिंग के लिए जाने के लिए भी मां के कहने पर चलता। वह परेशान होने लगी। ‘क्या देखा, इसमें!’ कभी उसे मौसी पर गुस्सा आता, कभी अपने मां-बाप पर। ‘जरा पूछताछ ही कर लेते, लड़का कितना काबिल है। बस कपड़े पहनने, खाना-पीना आ गया, बस सब हो गया क्या। जिन्दगी यही है क्या।’ कभी-कभी उसकी बचकाना हरकतों पर वह ग्लानि से भर उठती। अभी विवाह को छ:-सात महीने ही हुए थे। वह राजन के साथ मायके गई थी। सुबह उठ कर वापसी के लिए चलने लगे तो कौशल्या ने कहा, “चलो, आज कांगड़ा माता को माथा टेक आते हैं।” राजन तैयार हो गया।

शहर से बाहर निकलते ही राम प्रसाद ने सरसरी ढंग से कहा, “तेल वगैरह देख लेते, कहीं डलवाना हुआ तो यहीं से डलवा लेंगे। आगे पता नहीं पेट्रोल पंप कितनी दूर हो।” उसने गाड़ी पेट्रोल पंप पर जा लगाई। राम प्रसाद ने बाहर निकल कर पर्स निकाल लिया। तीन हजार का पेट्रोल पड़ गया। राजन ने ऊपरी तौर से कहा, “आप रहने दें, पैसे मैं दे देता हूं।” उसके घूमने का सारा मजा किरकिरा हो गया। घर आकर वह पति से झगड़ने लगी, “जब गाड़ी में पहले ही पेट्रोल था तो उसे फुल करवाने की क्या आवश्यकता थी?”

“क्यों? उन्होंने खुद ही कहा था।”

उन्होंने कहा, उनका फर्ज बनता था। आप कुछ सोच लेते। इतनी भूख दिखाने की क्या जरूरत थी?”.

“यदि वे खुद गाड़ी करके जाते तो कितने की पड़ती?”

“कितने की होती? दो हजार में घूम आते और एहसान भी ना होता!” परन्त यह गिले-शिकवे. रुठना. टटना-जडना पीछे रह गया और वह सुख-सुविधाओं में खोती चली गई। ब्यूटी पार्लर, बूटीक द्वारा तराशे जाती अपनी सन्दरता का अंहभाव उसे अलग ही दनिया में ले जाता। समय के साथ-साथ, वह इस परिवार में रचती गई और उसमें अंहकार व आत्म-सम्मोहन बढ़ता गया।

सन पन्द्रह के नवंबर में राम प्रसाद रिटायर हो गया। उस समय तक अपनी आवश्यकताओं के कारण, वह दो बार जी. पी. एफ. से पैसे निकलवा चुका था, फिर भी ग्रैच्यूटी, छुट्टियों के पैसे और जी.पी. एफ. को मिला कर पन्द्रह लाख उसे मिल गया। उसने राजन से इंन्वैस्ट के बारे में सरसरी तौर पर सलाह ली तो उसने अपने बिजनेस में पैसे लगाने के लिए जोर दिया, “अभी प्रापर्टी में मंदी है। परन्तु साल-दो साल तक इसमें उछाल आएगा। इसमें लगे पैसे छलांग लगा कर आगे बढ़ेंगे।” उसकी बात राम प्रसाद को जंच गई। कुछ वह उनकी अमीरी के प्रभाव में भी था।

अगले साल नोटबंदी आ गई। अधिकतर छोटे और मंझोले कारोबारियों को बुरी तरह से धक्का लगा। ‘बहल प्रापर्टीज’ का काम भी प्रभावित हुआ परन्तु वह अधिकतर कोठियां और पी.जी. किराए पर चढ़ाने का काम भी करते थे और रेत, बजरी और ईंटों की सप्लाई का भी। लेकिन वह हरदम काम के न होने का रोना-धोना करते थे। राम प्रसाद मन ही मन घबराने लगा, पछतावा भी होता परन्तु मन की बात किसी से न कहता। सुदीप से तो क्या बात करता, उसने कभी कौशल्या से भी इस बात को साझा नहीं किया था। वह इस बात की तसल्ली रखता कि पैसे कभी तो वापस मिलेंगे। वह सोचता, चलो श्रेया के पास ही पैसे गए हैं।

बड़े बहल हंस राज की मृत्यु के बाद राजन अपने हिसाब से काम करने लगा। उसमें श्रेया की मर्जी और दखलादाजी भी शामिल होने लगी। हंस राज काम को कभी बेकाबू नहीं होने देता था, ना सुख-सुविधाओं को, परन्तु उसकी मृत्यु के तीन ही महीनों बाद उन्होंने अपनी पुरानी गाड़ी बेच कर नई जैन ले ली। घर का सारा फर्नीचर बदल दिया। खासकर, करतारपुर से कारीगर बुलवा कर कमरों के अनुसार फर्नीचर तैयार करवाया। बेड, सोफे, डाईनिंग टेबल वगैरह सब कुछ नया। एमबे का एजेंट होने के नाते उसे अक्सर घरों में जाना पड़ता था, जहां कहीं भी कुछ नया देख आती, वह वही लेने के लिए बैचेन होने लगती।

बच्चे स्कूल, ट्यूशन और होमवर्क में खोए रहते। बाकी समय में नेट द्वारा वीडियो गेम्ज खेलते या सीरियल देखते। वह उनकी निगरानी रखती परन्त उनके साथ समय नहीं बिता पाती थी सिवाय इतवार के। इतवार को भी उसके कई काम पहले से ही नियत होते, कभी ब्यूटी पार्लर जाना, कभी किसी एजेंट के पास जाना। फैमिली फ्रेंड्स के घेरे में कोई न कोई फंक्शन या पार्टी में जाने के लिए तैयारी करना। मां होने की बजाए शायद वह ‘होम-सुपरडेंट’ की भूमिका अधिक निभा रही थी। बच्चों को जन्म देने के बाद पल-पल उनके साथ समर्पित भाव की बजाए वह स्व-केन्द्रित अधिक होती जा रही थी। उम्र के निशानों को हटाने-छिपाने के लिए वह कई तरह के पापड़ बेलती। तैंतीसवें वर्ष में पहुंच कर भी वह खुद को तेईस-चौबीस के भ्रम में जी रही थी। जिम, ब्यूटी पार्लर, बूटीक उसके इस भ्रम के आभामंडल को बनाए रखने में सहायक हो रहे थे। आठ वर्षों की नितिका के साथ चलते हुए वह और भी चुस्त-दुरुस्त दिखने का यत्न करती कि देखने वाला उसे नितिका की मां नहीं, बड़ी बहन समझे। अगर कोई अनजाने में ऐसा समझ लेता तो वह भ्रमजाल के सातवें आसमान पर जा पहुंचती।

परिवारिक फ्रेंड्स के घेरे में उसके व रूबी के बीच सुन्दर होने की प्रतियोगिता चल रही थी। ‘स्टार स्टडी इंमीग्रेशन’ में जाने के बाद वह तरूणा द्वारा बनने-संवरने को अधिक गौर से देखती। बातों-बातों में उसके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली क्रीम, लिस्टिक, हेअर कलर की जानकारी लेती रहती। उसे इस बात का बुरा लगता, जब लोग उसको अधिक आकर्षक ढंग से देखते थे। उसकी बाईस-तेईस वर्ष की उम्र को भूल कर, उससे आगे निकलने की चाहत में रहती। पिछले महीने जब एमबे कमिशन के सवा दो लाख उसके खाते में आए, तब उसने एक बार राजन को कहा, “इसमें से लाख रुपया पापा जी को लौटा देते हैं।”

“उनका काम बहुत अच्छा चल रहा है। लौटा देंगे, जब उन्हें जरूरत होगी।” यह राजन का स्वभाव भी था, जिससे पैसे लेने होते, वह उसे सदा याद रहता। जिसे लौटाने होते, वहां टालमटोल करता रहता। कोई संबंध, कोई चरित्र उसके लिए बिजनेस से ऊपर नहीं था, उसके मुनाफे से ऊपर।

“परन्तु यदि उस समय अपने पास ना हों?”

“देखी जाएगी फिलहाल तो डिजाईर बेच कर सविफ्ट लेते हैं। तीन लाख इसका मिल जाएगा। कुछ यह कमीशन वाले, आधी डाऊन पेमैंट करके बाकी किश्तें कर लेंगे।”

“इसे भी रख लेते हैं, एक्टिवा पर जाते हुए बुरा लगता, वैसे भी अपने फ्रेंडस सर्किल में सभी के पास भी दो-दो गाड़ियां हैं।” यह उसके मन में दबी हुई चाह थी।

“परन्तु इससे किश्त बहुत बनेगी?” राजन कुछ पल हिचकिचाया।

“मैं ऐमबे में कुछ और मेहनत कर लेती।” इंमीग्रेशन की नौकरी में आमदनी निश्चित थी, महीने के बारह हजार। यदि वह अपने निजी घेरे से कोई केस ले आए तो उसमें से तीन प्रतिशत अलग से मिलते। बातों ही बातों में फैसला हो गया और उससे अगले दिन उनके घर पर नई गाड़ी आ गई।

“दीदी, कुछ ही दे देते?” उसकी आवाज में मिन्नत सुनाई देने लगी थी।

“अभी तो नहीं हो पाएंगे। यदि ज्यादा ही जरूरत है तो सुजाता से पूछ ले या मैं उसे कह देती हूं?” बालों की सैंटिंग को आखिरी टच देते हुए उसने सलाह दी। आस-पास की सुनहरी लटों को क्लिप में बांधा। जो ना अधिक कसे हुए लग रहे थे और ना ढीले ही कि तरतीब खराब हो जाए। बालों से फारिग होते ही, जैसे उसे याद आया हो, “पापाजी, पास में है तो जरा मेरी बात उनसे करवा दे।” शायद इसके द्वारा वह टॉपिक ही बदलना चाह रही थी। शायद उसे बाप का मोह आ गया था, पता नहीं।

“हां पुत्त, क्या हाल है!” उधर से कमजोर-सी थकी-थकी सी आवाज आई, “राजन और बच्चे ठीक हैं?”

“हां पापाजी, आप अपनी सेहत का ख्याल रखा करें।”

“बहुत रखता हूं लेकिन उम्र का तकाजा भी है।”

“सही दवा लें।”

“श्रेया, जल्दी करो, कहीं के.एफ.सी. में ब्रेकफास्ट करते हुए फिल्म का टाईम ना निकल जाए!” राजन बैडरूम से बाहर निकल आया। शायद सीरियल खत्म हो गया था।

“आप बच्चों को लेकर बाहर चलें।” उसने माथे पर आई एक लट को पीछे करते हुए कहा और खुद पर निगाह डालते हुए बोली, “अच्छा पापाजी, रात को बात करूंगी।” कहते हुए उसने फोन काट दिया।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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