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नारीमन की कहानियां
Wo Tum Thi Mahak-Nariman ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

आंखों में आंसुओं का सैलाब बार-बार उमड़ रहा था। सीने की घुटन और सिसकियां रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। यह सब तो फिल्मों में ही होता है। हकीकत में कहीं ऐसा होता है। महक सोच रही थी पापा ने इस बात की भनक भी नहीं लगने दी। आज तक मुझे पता ही नहीं चल पाया कि मैं भी दकियानूसी सोच की बलि चढ़ते हुए बाल-बाल बची। पापा ने उन अतीत की घिनौनी यादों को हमारे पास फटकने भी नहीं दिया। सोचकर उसका अंग-अंग सिहर उठा।

चुलबुली, चंचल, मस्त, मनमौजी महक ज़िन्दगी को अपने अंदाज़ से जीती थी। आज उसके विवाह को भी कुछ वर्ष हो चले थे। बच्चों के पालन-पोषण के लिए उसने अच्छी भली नौकरी भी छोड़ दी थी। उसकी दो बड़ी बहने थी तीनों को ही मम्मी पापा ने बेटों से भी बढ़कर पाला-पोसा था। आज तक ज़िन्दगी में उन्हें कभी नहीं लगा था कि वह बेटियां है। तीनों की शादियां हो चुकी थी, सब अपने-अपने घरों में खुश थी। महक का विवाह मनोज से हुआ था। वह शहर के प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफेसर थे। उनके दो बच्चे थे, घर के कामकाज और बच्चों में मस्त रहती थी। बहुत खुश थी महक।

“नाश्ता क्यों नहीं किया? क्या हुआ महक” मनोज बोले।

“कुछ भी तो नहीं अंदर ही अंदर एक बेचैनी-सी हो रही है, कहीं कोई अनहोनी ना हो” तभी फोन की घंटी बजी, “अरे मां तुम ठीक हो, पापा कैसे हैं?”

“महक बेटा जल्दी आ जाओ पापा की तबियत बहुत खराब है।”

“हां मां मैं आ रही हूं।” हड़बड़ाते हुए उसने फोन रखा और बोली, “जल्दी चलो पापा की तबियत बहुत खराब है।” घर पहुंची तो पता चला कि पापा सिटी हॉस्पिटल में है। वह वहां पहुंची तो उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया था। डॉक्टर के अनुसार उन्हें दस दिन के लिए एडमिट कर दिया था। – “पापा आप बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे, तब तक मैं आपके साथ रहंगी। आप सब लोग घर जाओ, मैं पापा के साथ ही रहूंगी।”

“चलो ठीक है, अपना भी ध्यान रखना।” कहकर मनोज और सब लोग घर चले गए। महक और पापा की बहुत बनती थी। मनोज से भी अधिक हर बात पापा के साथ शेयर करती थी। वह कुर्सी पर बैठी पापा को देख रही थी, दवाई लेकर अभी-अभी सोए थे। तभी अचानक ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, “नहीं नहीं यह नहीं हो सकता।” आवाज़ सुनकर नर्स दौड़ी-दौड़ी आई और इंजेक्शन दिया। फिर उन्हें नींद आ गई। तीन-चार दिन हो गए अक्सर पापा नींद में चिल्लाने लगते, “यह नहीं हो सकता मैं जा रहा हूं उसे लेने।” डॉक्टर के अनुसार उनकी याददाश्त पर असर पड़ा था। कभी वह कुछ समय के लिए सब-कुछ भूल जाते थे और कभी उन्हें बचपन की पुरानी बातें सालों पुरानी बातें याद आने लगती थी। इसी वजह से वह बार-बार चिल्लाने लगते थे। नींद में आज भी अचानक पापा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे, “कि यह नहीं हो सकता, मैं जा रहा हूं उसे लेने मैं जा रहा हूं,” उसके बाद उन्होंने दोबारा आंखें नहीं खोली वे दुनिया छोड़ कर जा चुके थे। इतना गहरा सदमा, पूरी तरह से हम-सब टूट गए थे।

समय बीतता गया पर महक के दिमाग से एक बात नहीं जा रही थी कि पापा आखिरी वक्त पर किसके बारे में बात कर रहे थे। मनोज ने समझाया – “महक इतना मत सोचो, उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। ऐसे में वह कुछ भी बोल देते थे। परेशान मत हो, ज्यादा मत सोचो।” अभी तो मां भी कुछ बताने की हालत में नहीं थी। कौन थी वह? किसे लाने की बात कर रहे थे? यह बात उसे घन की तरह खाए जा रही थी। किस समय की याद पापा को आई थी। अंतिम समय में जिसका जिक्र उन्होंने आज तक नहीं किया। वह तो मुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानते थे। सोच-सोच कर उसका दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो चुकी थी और दिन पर दिन वह कमजोर होने लगी। आंखें शाम से ही बोझिल होने लगती थी। दिल करता था कि सो जाऊं पर वह जब सोती तो देर तक नींद ही नहीं आती थी। उसे कभी-कभी तो सोच दिमाग की देहरी पर ऐसी बैठती की पूरी रात करवट बदलते-बदलते कब भोर हुई पता ही नहीं चलता।

तीन-चार महीने बीत चुके थे, किंतु महक के दिमाग से अभी तक यह फितूर नहीं उतरा था, उसे बस जानना था कि वह कौन थी? आज मां ने बुलाया था। वह जाते हुए बोली, “मनोज मैं दो-तीन दिन में आ जाऊंगी, अपना और बच्चों का ध्यान रखना। कहकर वह चली गई। महक को देखकर मां बहुत खुश हुई। अकेलापन उन्हें काटने को आता था। “बच्चों को भी ले आती बेटा।”, “आजकल एग्जाम चल रहे हैं, यहां आते तो सारा घर सिर पर उठा लेते। पढ़ना-वढ़ना तो कुछ नहीं इसलिए मैं नहीं लाई। मनोज से तो थोड़ा डरते हैं मुझे तो कुछ समझते ही नहीं।” मां अभी भी संभल नहीं पाई थी, बार-बार पापा को याद करके रो पड़ती थी। बड़ी दीदी ने मां को अपने पास ही रख लिया था। अकेली भी वह कैसे रहती। दीदी और जीजू ज़रूरी काम से दो-तीन दिन के लिए बाहर गए थे। एक बेटा था, वह विदेश पढ़ाई के सिलसिले में गया था। रात को महक मां के साथ सोई। आधी रात को आंख खुली तो देखा मां जागी हुई है। “क्या हुआ मां?”

“कुछ नहीं बेटा नींद नहीं आ रही है।”

“सो जाओ मां बीमार हो जाओगी।”

“अरे बेटा नींद ही नहीं आती अब रात भर। काश तुम्हारे पापा होते।” कहकर रोने लगी

“भगवान ने मुझे उठा लिया होता, वह तो मेरी ज़िन्दगी में फरिश्ते से भी बढ़कर थे।”

“बेटा हम इस शहर के नहीं हैं, हमारी जड़े तो एक बड़े गांव से हैं। जिसके जमींदार तुम्हारे दादा जी थे। तुम तीनों उस जमींदार खानदान से ताल्लुक रखती हो तीनों बहनें। तुम्हारे पापा उनकी इकलौती संतान थे और मैं शहर के अनाथालय की सबसे होनहार लड़की थी। मेरी काबिलियत से मुझे गांव की पाठशाला में सरकारी नौकरी मिल गई। तुम्हारे पापा गांव के जमींदार के बेटे थे। पर वह दूसरों से एकदम अलग। बड़ी-बड़ी आंखें, लंबा कद बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व था उनका और मैं उन्हें मन ही मन चाहने लगी थी। वह अक्सर गांव के बच्चों के दाखिले के सिलसिले में पाठशाला आया करते थे। मुझे क्या मालूम था कि वह मुझे भी पसंद करते हैं। एक दिन एकांत में उन्होंने अपने दिल की बात मेरे सामने कहीं और शादी का प्रस्ताव रख दिया। मैं बहत ही असमंजस की स्थिति में थी। मां बाबजी ने इनका बहुत विरोध किया। “कि हम किसी भी अनाथ से तेरी शादी नहीं होने देंगे। जिसके घर बार मां-बाप खानदान का कुछ पता नहीं। पर इनकी ज़िद के आगे किसी की चलने वाली कहां थी। उन्होंने इनके आगे घुटने टेक दिए और हमारी शादी हो गई पर उन्होंने मुझे बहू के रूप में स्वीकार नहीं किया। हम साथ रहते थे पर मझसे वो लोग बात नहीं करते थे. बहत बुरा लगता था। तुम्हारे पापा समझाते थे कि समय के साथ-साथ सब ठीक हो जाएगा। शादी के साल बाद जब पता चला कि मैं मां बनने वाली हूं तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इन्होंने सुना तो यह भी बहुत खुश हुए। मां-बाबूजी को पता चला तो वे कुछ नहीं बोले पर उनकी आंखों की चमक ने मुझे उनकी खुशी का आभास करा दिया। आने वाले मेहमान का इंतज़ार वह भी कर रहे थे। पाठशाला में लोगों ने बताया कि “टीचर जी जमींदार साहब ने जब सुना कि आपके पांव भारी है तो पूरे गांव में आने वाले पोते की खुशी में लड्डू बटवा दिए।” मैं भीतर ही भीतर बहुत खुश थी। ठीक ही कहते हैं कि असल से भी प्यारा ब्याज होता है। अब वह घड़ी आई, दर्द के मारे मेरा बुरा हाल था। मां और दाई मां मुझे लेकर गांव से दूर हमारा एक पुराना घर था वहां ले गई। वहां मैंने तुम्हारी बड़ी दीदी को जन्म दिया। मुझे घर पर ना पाकर तुम्हारे पापा समझ गए कि मैं वही हूं क्योंकि पुराने मकान में ही जच्चा और बच्चा रहा करते थे। यह यहीं पर सभी बच्चों का जन्म होता था। लड़की देख कर दाई मां और मां का मुंह उतर गया। लड़की हुई है, सुनकर सारे घर में मातम-सा छा गया। सिर्फ तुम्हारे पापा बहुत खुश थे एक डेढ़ महीने बाद जब मैं वापस घर आई तो मां के ताने”, एक लड़के को भी जन्म नहीं दे सकी।

बाबूजी, “पहले बेटे ने ही नाक कटा दी, हमने दिल में पत्थर रख दिया और आप लोगों के सामने मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं रहे। लड़की हुई है कहां मुंह छुपाएं।”

समय का पहिया चलता रहा, अब बड़ी दीदी को 2 साल हो चुके थे। फिर से मैं मां बनने वाली थी, तुम्हारे पापा ने सुना तो उनकी खुशी देख कर मैं भी बहुत प्रसन्न थी। एक दिन मैंने सुना बाबूजी मां से कह रहे थे “कि अगर अबकी बार लड़की हुई तो बेटे की दूसरी शादी करवा दूंगा। हमें भी तो वारिस चाहिए अपनी खानदानी विरासत संभालने के लिए।”

सुनकर मेरा कलेजा बाहर आ गया। कुछ दिनों बाद तेरी मंझली दीदी का जन्म हुआ और घर में फिर मातम अफसोस फैल गया और तेरे पापा को तो उनकी बातों का कोई फर्क ही नहीं पड़ता था। उनके लिए लड़की लड़का दोनों ही समान थे। वह अक्सर कहते थे कि “मां-बाबूजी की बातों को दिल पर मत लेना, तुम्हें मुझ पर तो विश्वास है ना।”

अब वह चाहते थे कि हमारे और बच्चे ना हो, वे दोनों बेटियों को पढ़ा-लिखा कर बहुत बड़ा बनाना चाहते थे। पर विधि को यह मंजूर नहीं था। अभी तेरी मझली दीदी को 6 महीने भी नहीं हुए थे कि मेरे पांव भारी हो गए। अब कुछ समझ नहीं आया इनके कई दोस्तों ने सलाह दी कि”अबॉर्शन करवा लो” पर इन्होंने करारा जवाब दिया, “मैं जीव हत्या का पाप अपने सर पर नहीं ले सकता, ईश्वर की मर्जी है मुझे माननी ही पड़ेगी।” इन के हर अंदाज को मेरा नमन, कहते-कहते मां जोर से रोने लगी।

“मां चलो सो जाओ बहुत हुआ अब मुझे नहीं सुनना सो जाओ।”

“बेटा, मैं अपनी बात पूरी किए बगैर सो नहीं सकती। अब दिन गुज़रने लगे, मुझे देखकर लगता भी नहीं था कि मैं मां बनने वाली हूं। सात आठ महीने हो चुके थे, पूरी तरह पीली पड़ गई थी। तुम्हारे पापा ने स्कूल की नौकरी छुड़वा दी, कहते थे आराम करो। बड़ी दीदी तीन साल की और मझली अभी साल की भी नहीं हुई थी। दोनों छोटे ही थे, मां बाबूजी लड़की समझ कर दोनों की ओर देखते भी नहीं थे। जब देखो तब ताने देते थे।

“डूब के मर क्यों नहीं जाती तीनों चुल्लू भर पानी में, हमारे बेटे की ज़िन्दगी नर्क बना दी।”

आठवां महीना चल रहा था, तुम्हारे पापा काम के सिलसिले में शहर गए थे। सुबह से ही शरीर भारी-भारी लग रहा था। अचानक तबियत बिगड़ने लगी तो मैंने मां को कहा, मां ने दाई मां को बुलाया। दाई मां ने कहा, “लगता है कि कल तक बच्चे का जन्म हो जाए।” मैंने कहा, “अभी तो आठवां महीना शुरू हुए दो दिन हुए हैं।” तो वह बोले, “कई बार कमज़ोरी की वजह से बच्चा जल्दी हो जाता है।” और उसी पुराने घर में ले गए, जहां बड़की दीदी और मंझली हुई थी। मैं पूरी रात दर्द के मारे तड़पती रही। सहारा सिर्फ तुम्हारे पापा का था, वह भी शहर गए थे। सुबह पंछी चहचहाये और घंटियों की आवाज सनाई दे रही थी। दर्द की इंतहा थी। अब तो मैं बार-बार बेहोश भी हो रही थी। दाई मां मुझे कहती जोर लगा बस ज़ोर लगा सब जल्दी हो जाएगा। अब मुझे हल्की-सी बच्चे की चीख सुनाई दी मुझे लगा जैसे बच्चा पैदा हो गया। कमज़ोरी के मारे ना तो मैं बोल सकती थी और ना ही शरीर को हिला-डुला पा रही थी। सिर्फ धुंधला-धुंधला दिख रहा था। मैंने सुना दाई मां कह रही थी, “यह तो बेहोश हो गई, लड़की है वह भी नीली पड़ी है। शायद यह बच नहीं पाएगी। क्या करना है मालकिन?” तभी मां की आवाज़ सुनाई दी मां बोली, “देखो मटका पड़ा है उसे तोड़ उसके नीचे वाले हिस्से में बच्ची को लपेटकर रख दे, यह तो देखने लायक भी नहीं है। पूरा बदन नीला पड़ा है, यह शायद जिंदा भी ना हो इसे ले जा और कब्रिस्तान में फेंक आ।” मैं मुंह से कुछ भी नहीं बोल पा रही थी मुझे यकीन था कि बच्ची ज़िंदा है। मैंने कानों से उसकी हल्की-सी चीख सुनी थी। छ:-सात घंटे बीत गए थे, करीब शाम के चार बजे तुम्हारे पापा आए। मां और दाई मां से पूछा तो उन्होंने कहा, “मरी हुई लड़की पैदा हुई थी, उससे अब तक यहां रखने का क्या फायदा। टूटे मटके में रखकर उसे कब्रिस्तान छोड़ आई हूं, देखने लायक ही नहीं थी।” मां बोली, “चलो तुम्हारे सर से बला टली।” यह सुनकर पापा की समझ में कुछ नहीं आया, “यह सब क्या बता रही हैं क्या हुआ बताओ? यह दाई मां क्या कह रही है? तुम से सुनना चाहता हूं, बोलो कुछ तो बोलो कहते हुए वे अंदर आए।” मैं रोने के सिवा कुछ कह ही नहीं पा रही थी पर इन्हें देख कर थोड़ी हिम्मत आई और मैंने उन्हें सारी बातें धीरे-धीरे बताई। बोले, “तुम चिंता मत करो हमारी बच्ची को कुछ नहीं होगा मैं जा रहा हूं उसे लेने, वह बिलकुल ठीक होगी कुछ नहीं हो सकता उसे।” कह कर तुम्हारे पिताजी चले गए और मुझ पर बुरे-बुरे ख्यालों के बादल मंडराने लगे। कहीं कोई जंगली जानवर ने तो नहीं मार डाला होगा? कोई कौवे गीदड़ बाज ही ना नोंच लें नन्ही-सी जान को सोच कर मेरा दिल दहल रहा था। कब्रिस्तान हैं, चीटियां, कीड़े-मकोड़े चमगादड़, मुझे क्यों बचाया भगवान तूने, सोच रही थी। कि तुम्हारे पापा गोदी में लिए बच्ची को ले आए और बोले, “जल्दी जन्म होने के कारण कमज़ोर और नीली पड़ी है। बच्ची मरी थोड़े ही है मेरे जिगर के टुकड़े को मरा हुआ मान लिया मां तुमने। सांस ले रही है, मैंने रास्ते में चिकोटी काटी तो रोई भी थी, इसे दूध पिलाओ ठीक है बिल्कुल। अब हम कभी घर वापस नहीं जाएंगे मेरे कोई मां-बाप है ही नहीं। क्या ऐसे होते हैं माता-पिता?” तुम्हारे बाबू जी ने सारे रिश्ते-नाते तोड़ दिए मां बाबूजी से और हम शहर बस गए। अच्छे पढ़े-लिखे होने के कारण तुम्हारे पिताजी की अच्छी नौकरी लग गई और मैं भी बच्चों के लालन-पालन के साथ-साथ ट्यूशन पढाया करती थी। तुम तीनों बहुत छोटे थे इसलिए तुम्हें कुछ याद नहीं और पापा ने भी मुझसे कहा था कि कभी भी पुरानी ज़िन्दगी का जिक्र मत करना मगर मैं जानती हूं की तुम पापा के जाने के बाद से ही बहुत परेशान हो। उनका जाना तो तुमने प्रकृति का नियम मान लिया पर वह जिसके लिए अंतिम समय में चिंतित थे वह ठीक होगी उसे कुछ नहीं हो सकता। कौन है वह? यह सोच-सोच कर तुमने अपने आपको बहुत परेशान कर लिया है। उस वक्त वह इन्हीं पुरानी यादों के भंवर में फंसे थे बेटा तुम्हारी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैं तुम्हें बता रही हूं। वह बच्ची कोई और नहीं थी, “वो तुम थी महक”।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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