Nabhag
Nabhag

Hindi Katha: प्राचीन समय में पृथ्वी पर दिष्ट नामक एक राजा राज्य करते थे । दिष्ट एक धर्मात्मा और सदाचारी राजा थे। उनका एक पुत्र था, जिसका नाम नाभाग था। एक बार नाभाग घोड़े पर सवार होकर नगर में घूम रहा था। तभी उसकी दृष्टि मंदावती नामक एक सुंदर वैश्य-युवती पर पड़ी। मंदावती नगर के प्रसिद्ध व्यापारी सुदर्शन की पुत्री थी। मंदावती का रूप – सौंदर्य देख नाभाग उस पर आसक्त हो गया और उसका पीछा करते हुए उसके घर पहुँचा गया। नाभाग को द्वार पर खड़े देख सुदर्शन ने उसका भव्य स्वागत किया और उसे बैठने के लिए सुंदर आसन प्रदान किया। तत्पश्चात् उससे वहाँ आने का कारण पूछा।

सुदर्शन बोला – “ मान्यवर ! मैं आपकी पुत्री मंदावती को चाहने लगा हूँ और उससे विवाह करने का इच्छुक हूँ। मैं उसके बिना अब एक पल भी जीवित नहीं रह सकता। वह मेरी प्राण – प्रिया बन चुकी है। अत: आप उसका विवाह मेरे साथ करने की कृपा करें। “

नाभाग का मन वश में नहीं है, यह जानकर सुदर्शन उसे समझाते हुए बोला ” राजकुमार ! आप क्षत्रिय हैं और हम वैश्य। आप प्रजा की रक्षा करते हैं, जबकि हम अपने धर्म का पालन करते हैं। किसी भी प्रकार से हम आपके योग्य नहीं है। फिर भी यदि आप अपने निश्चय पर दृढ़ हैं, तो पहले अपने पिताजी से आज्ञा ले लीजिए। उनके सहमत होने पर मैं मंदावती का विवाह आपके साथ कर दूँगा “

नाभाग ने अपनी इच्छा पिता दिष्ट को बताई । तब राजा दिष्ट ने अपने कुल पुरोहित ऋचीक मुनि से इस विषय में चर्चा की। ऋचीक मुनि बोले – ” राजन ! नाभाग का प्रथम विवाह किसी राजा की कन्या के साथ होना चाहिए। उसके बाद वह वैश्य-कन्या से विवाह कर सकता है। ऐसा न करने पर उसे पाप का भागी बनना पड़ेगा।” नाभाग ने ऋचीक मुनि की बात अनसुनी कर दी और मंदावती का हरण कर लिया।

तब सुदर्शन ने राजा दिष्ट से रक्षा की प्रार्थना की । दिष्ट ने कुपित होकर अस्त्र धारण कर लिए और युद्ध के लिए नाभाग के सामने पहुँच गए। पिता और पुत्र भीषण युद्ध आरम्भ हो गया। दोनों ही वीर और पराक्रमी थे, अतः युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकल पा रहा था।

सहसा वहाँ परिब्राट नामक मुनि प्रकट हुए और दिष्ट से बोले-” ‘राजन ! नाभाग धर्म-भ्रष्ट हो चुका है। वैश्य युवती मंदावती का हरण करने के कारण यह क्षत्रिय नहीं रहा। अब इसके साथ युद्ध करना उचित नहीं है। इसलिए आप यह युद्ध बंद कर दीजिए । “

युद्ध बंद करके राजा दिष्ट नाभाग से बोले – ” वत्स ! बाभ्रव्य मुनि धार्मिक न्याय के लिए नियुक्त हैं। वे तुम्हारे लिए जो धर्मानुसार कर्म निर्धारित करें, तुम उसका उसका पालन करो। “

तब बाभ्रव्य मुनि ने नाभाग के लिए पशुपालन, कृषि तथा वाणिज्य – ये ही उत्तम कर्म बताए। मुनि की आज्ञानुसार नाभाग ने वैसा ही किया। कुछ समय बाद नाभाग को मंदावती से एक पुत्र प्राप्त हुआ, जो भनन्दन के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस प्रकार नाभाग ने क्षत्रिय धर्म त्यागकर वैश्य धर्म अपना लिया।