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मेरा पहला प्यार: First Love Story
Mera Pehla Pyar

First Love Story: मैं बी.एड. कर रही थी। हमारा घर एक बहुत बड़े कंपाउंड में बना हुआ था, जिसके चारो ओर घर बने हुए थे, बीच में पार्क था। मुख्य सड़क तक जाने का बस एक छोटा-सा ही रास्ता था। उस दिन मेरा प्रेक्टीकल था और पहली बार साड़ी पहनी थी, जल्दबाजी में जाते हुए रास्ते के बीच में दो लड़के मोटरसाइकिल खड़ी कर बातें कर रहे थे, उसके हैंडिल में मेरी साड़ी का पल्लू बुरी तरह फंस गया। पल्लू निकालने के चक्कर में मैं कई बार उससे टकराई। हाथों का स्पर्श हुआ इन कुछ क्षणों के सामिप्य से मुझे एक अजीब सी अनुभूति होने लगी, पल्लू फट गया था। मुझे कालिज के लिए देर हो रही थी, इसलिए बड़बड़ाती हुई भागी।
अगले दिन फिर वही नजारा। मैं संकुचित हो उठी, बचकर पास से निकलते हुए बोली, ‘खड़े होने का और कोई रास्ता नहीं मिला, सबका रास्ता रोककर खड़े हो जाते हो।’
‘जी, मजबूरी थी’ उनमें से एक बोला, ‘आपका यह पल्लू वापस करना था।’ मैंने कहा, ‘ऐसा करो इस पर मिट्टïी का तेल डालो और माचिस छुआ दो।’
‘अरे नहीं-नहीं, हम तो इसे संभाल कर रखेंगे, नाक पोंछने के काम आएगा।’ मैंने बहस करना ठीक नहीं समझा और आगे बढ़ गई। आज मैंने जींस और टॉप पहन रखा था। मैं चुपचाप निकल रही थी कि उसने टोका, ‘आज आपने साड़ी नहीं पहनी?’
‘क्यों?’ मैंने उसे घूरा। बोला, ‘आप पल्लू उड़ाती हुई चलती हैं न, मेरी मोटरसाइकिल कह रही थी, अगर अब पल्लू फंसे तो मेरी झाड़-पोंछ के लिए रखना।’
थोड़ा आगे बढ़ी तो उसने पूछा, ‘आपका नाम क्या है?’
‘क्यों बताऊं, मुझे आपसे कोई फ्रेंडशिप तो करनी नहीं है’ वह बोला, ‘चलिए मत बताइए, वो तो हम मालूम कर ही लेंगे। अच्छा, कौन से स्कूल में पढ़ती हैं आप?’
‘स्कूल में? मैं कालिज में पढ़ती हूं।’
‘लगता तो नहीं’, वह शरारत से बोला। ‘और आप! आप तो लगता है प्राइमरी भी नहीं पढ़े। जरा सिविक सेंस नहीं, रोज रास्ते के बीच में खड़े हो जाते हैं।’ इसी तरह की नोंक-झोंक में कई दिन निकल गए। वो तीन दिन नहीं दिखा। एक अजीब सी बेचैनी होने लगी। उदासी का आवरण मेरे तन-मन पर छा गया। यह मुझे क्या हो गया है? हर क्षण उसी का ध्यान, पढ़ाई से मन हट गया। कहीं वो बीमार तो नहीं। उसका नाम, पता कुछ भी तो मालूम नहीं। मैंने पूरा कंपाउंड छान मारा। एक कठोर अनुशासित, पुरातनवादी, परंपरावादी परिवार में रहते हुए भी, उसका चुंबकीय आकर्षक व्यक्तित्व मेरे दिलो-दिमाग पर गहराता चला गया।
आज ‘हे भगवान!’ कहकर मैं घर से निकली पर आज भी जब नहीं दिखा, तो मैं रूआंसी हो उठी। पर ये क्या? मुख्य सड़क पर उसे खड़ा देख, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। छूटते ही मैंने पूछा, ‘क्यों इतने दिन कहां रहे। स्कूल में स्वच्छता अभियान था क्या। और हलो! नाम क्या है आपका, कौन सी कक्षा में पढ़ रहे हो और घर का नंबर क्या है?’
‘क्यों! मैं अपना नाम क्यों बताऊं, मुझे आपसे कोई फ्रेंडशिप तो करनी नहीं है, घर का नंबर क्यों पूछ रही हो, अपनी डोली मेरे घर लानी है क्या?’
‘अरे हटो जी! यह मुंह और मसूर की दाल।’ मैं कालिज चली गई।
अगले दिन मिला, कहने लगा, मैं मसूर की दाल खाकर आया हूं। मेरा हाथ पकड़ा और एक पर्चा थमा दिया। मैंने सोचा जरूर यह प्रेम पत्र होगा, कालिज पहुंचते ही जल्दी-जल्दी खोलकर पढ़ा, जैसे कोई एप्लीकेशन हो। नाम- शिवम, काम- एमबीबीएस फोर्थ ईयर, घर का पता…., एक साल बाद बंगलौर में इंटर्नशिप फिर विदेश…। हमारा घर बन रहा है, पूरा होते ही हम वहां शिफ्ट हो जाएंगे।
ना संबोधन, ना समाप्ति, मेेरे स्वाभिमान को चोट पहुंची। भावनाएं आहत हो उठी, अपमान सा लगा।
अगले दिन मिला तो बड़े रौब से बोला, ‘बैठो मोटरसाइकिल पर, आगे जलूस निकल रहा है।’ मैं मजबूरी में बैठ तो गई पर डर गई, कहीं कोई देख न ले। थोड़ी दूर जाते ही उसने एक झटके से मेरा हाथ अपने कंधे पर रख लिया बोला, ‘मोटरसाइकिल पर बैठना नहीं आता क्या? पहली बार बैठी हो’, रास्ते में न जाने कितनी बार झटके लगे, उसकी कमर का स्पर्श मुझे रोमांचित करता रहा। कई दिन ऐसे ही बीत गए।
एक दिन जानबूझकर कालिज के लिए मुझे देर करा दी और पूछने लगा, ‘अब पीरियड तो शुरू हो चुका होगा, अब तुम्हारे सर क्या करेंगे?’
‘मेरा अचार डालेंगे, अब क्या मैं पीरियड अटैंड करूंगी? अब तो कैंटीन में जाकर टाइम पास करूंगी।’
थोड़ी देर में वो भी कैंटीन में आ गया, चाय समोसा लेकर एक ओर बैठ गया। जाते-जाते कह गया मेरा पेमेंट कर देना। मैं एकदम चिल्ला पड़ी क्यों भाई मैं क्यों दूंगी तुम्हारे पैसे…?
‘अरे वाह! रोज मोटरसाइकिल की सवारी करती हो एक दिन चाय नहीं पिला सकती।’ मैं बोली, ‘कल से किसी डाक्टरनी को ही बिठाना अपनी खटारा पर…’ मैं पेमेंट करने कैंटीन बॉय के पास गई तो उसने बताया पैसे तो वो साहब दे गए हैं।
समय बीतता गया, उनका घर बन गया। वो शिफ्ट हो गए। गृहप्रवेश पर मैं भी गई, पूरे फंक्शन में वो मुझे इग्नोर करता रहा। कॉरीडोर में सामना होते ही उसने कहा, ‘इतनी सज-संवर कर क्यों आई हो?’ ‘सज-संवर कर! अरे भई, फंक्शन में आए हैं’ मैं बोली, ‘ओह! मैंने समझा मुझे दिखाने आई हो। कोई गिफ्ट-विफ्ट भी लाई हो या यूं ही खाली हाथ।’
‘लाई हूं ना’, मैंने अपने पर्स में से एक पुराना पेन निकाल कर दिया, ‘लो बहुत कीमती है, संभाल कर रखना। पूरे पांच रुपये का है, था तो दो रुपये वाला भी, पर भई हमें अपने, अपने स्टैंडर्ड का भी तो ध्यान रखना था।’
‘वाह! क्या स्टैंडर्ड है’, कहकर हंसता हुआ वह आगे बढ़ गया।
घर पास में ही था, अत: मैं कभी-कभी जाती रहती थी। एक दिन सब लोग ड्राइंग रूम में बैठे थे, बातों-बातों में मैंने उन्हें अपनी जाति के रस्मो-रिवाज के बारे में बताया कि हमारे यहां रिश्ता अपनी जात-बिरादरी में, बड़ों की स्वीकृति से ही होता है। अगर कोई जात से बाहर जाने का साहस करता है तो गांव में पंचायत की खाप बैठती है और लड़का व लड़की को आमने-सामने गले में रस्सी बांधकर लटका दिया जाता है। गांव से भाग जाने पर जब भी पकड़ में आते हैं तब भी यही सजा दी जाती है, चाहे उनका बच्चा भी हो जाए। बच्चे को अनाथाश्रम में भेज दिया जाता है। बड़े लोगों का कहना है कि जात के बाहर शादी करने पर जाति की अपनी विशेषताएं और गुण समाप्त हो जाते हैं। अगर कोई विरोध करता है तो पंचों के लठेत उसे समाप्त कर देते हैं। हमारे घर में रोज ही ऐसी कहानियां सुनाई जाती हैं, ताकि हम बच्चे कोई गलत कदम उठाने की हिम्मत न कर बैठें।
शिवम विदेश चले गए, कई वर्ष बीत गए। मेरी शादी हो गई, मैं मां बन गई। एक दिन बाजार में अचानक उनकी मम्मी मिल गई। कहने लगीं, शिवम आने वाला है। वह बहुत बड़ा सर्जन बन गया है, उसे इनाम मिलने वाला है। और शादी, मेरे पूछने पर वो कहने लगीं, ‘नहीं करता, कहता है शादी प्रोफेशन में बाधा है।’
जब मैं मिलने गई, तो एकांत पाते ही मैंने पूछा, ‘शादी क्यों नहीं की अब तक।’
कहने लगा, ‘फिर किसी का पल्लू मोटरसाइकिल में फंसा ही नहीं।’ मैं गुस्से से बोली, ‘सच-सच बताओ, मैं मजाक नही कर रही हूं।’
मेरे पास आकर अत्यधिक प्यार भरी निगाह से एकटक मुझे देखते हुए कहने लगा, ‘क्या करता ‘खाप’ बीच में आ गई।’
भारी मन से मैं घर लौट आई। जिस निगाह के लिए, जिन प्यार भरे दो शब्दों के लिए मैं वर्षों तरसी, वो आज जाकर मिले। कभी कोई तो इशारा किया होता। मैं तो अनजाने ही नख-शिख स्नेह-सागर में डूब गई थी। अगर समय रहते उसकी इस भावना का आभास भर हो जाता तो अपनी जाति के इस रस्मो-रिवाज से लड़ती तो जरूर।
मम्मी शब्द सुन मैं वर्तमान में लौट आई। मेरे दोनों गाल गीले हो रहे थे।
पहले प्यार का होना जितना आसान नहीं होता है, ठीक उसी तरह उसे भूलना भी आसान नहीं होता है। पहला प्यार आपको उन चीजों से रू-ब-रू करवाता है, जिससे आप पहले कभी नहीं होते हो। पहले प्यार में आपको सभी चीजें अच्छी लगने लगती है। आप जवानी के दौर में होते हैं, उत्साहवर्धक होते हैं। जीवन में किसी घटना का होना केवल एक बार होता है, इसलिए वह घटना विशेष होती है। उसको भूलना बहुत मुश्किल हो जाता है। पहला प्रेमी आपके जीवन की प्रेरणा होता है, जिसे आप हमेशा याद करते रहते हैं।
किसी ने सही ही कहा है कि अमूमन हर चीज का कोई विकल्प होता है, लेकिन पहले प्यार का कोई विकल्प नहीं होता। पहले प्यार के दौरान हमें किसी भी चीज की अपेक्षा नहीं होती, क्योंकि यह ईमानदारी से विकसित होता है। पहले प्यार के बाद इंसान स्वार्थी हो जाता है, वह दोबारा प्यार में पड़ता है, लेकिन पहले की तरह प्यार में नहीं डूब जाता है।

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