Mulla Nasruddin ki kahaniya: बुखारा में मुल्ला नसरुद्दीन को न तो अपने रिश्तेदार मिले और न पुराने दोस्त। उसे अपने पिता का मकान भी नहीं मिला। वह मकान, जहाँ उसने जन्म लिया था। न वह छायादार बगीचा ही मिला, जहाँ सर्दी के मौसम में पेड़ों की पीली-पीली पत्तियाँ सरसराती हुई झूलती थीं। पके फल धरती पर भद से गिरते थे। जहाँ चिड़ियाँ ऊँची आवाज़ में गाती थीं और खुशबूदार घास पर सूरज की किरणें नाचा करती थीं। जहाँ मक्खियाँ मुरझाते हुए फूलों के रस की अंतिम बूँद चूसती हुई भनभनाया करती थीं और सिंचाई के तालाब में झरना रहस्यपूर्ण अंदाज़ में बच्चों को कभी ख़त्म न होने वाली अनोखी कहानियाँ सुनाया करता था। वह स्थान अब ऊसर मैदान में बदल गया था। उस पर बीच-बीच में मलबे के ढेर लगे थे। टूटी हुई दीवारें खड़ी थी। चटाइयों के टुकड़े बिखरे सड़ रहे थे। काँटेदार झाड़ियाँ उग आई थीं। वहाँ मुल्ला नसरुद्दीन को न तो एक चिड़िया दिखाई दी और न एक मक्खी । केवल पत्थरों के ढेर के नीचे से, जहाँ उसका पैर पड़ गया था, अचानक ही एक लंबी तेल की धार उबल पड़ी थी और धूप में हल्की चमक के साथ पत्थरों के दूसरे ढेर में जा छिपी थी। वह एक साँप था; अतीत में इन्सान के छोड़े हुए वीरान स्थानों का एकमात्र और अकेला निवासी ।
मुल्ला नसरुद्दीन कुछ देर तक नीची निगाह किए चुपचाप खड़ा रहा। उसका मन दुख से बोझिल हो उठा था ।
पूरे बदन को कँपा देने वाली खाँसी की आवाज़ सुनकर वह चौंक पड़ा। उसने पीछे मुड़कर देखा ।
परेशानियों और ग़रीबी से दोहरा एक बूढ़ा उस बंजर धरती को लाँघते हुए उसी ओर आ रहा था।
मुल्ला नसरुद्दीन ने उसे रोककर कहा, ‘अस्सलामवालेकुम बुजुर्गवार, अल्लाह आपको सेहत और तरक्की बख़्शे । क्या आप बता सकते हैं कि इस ज़मीन पर किसका मकान था ?’
‘यहाँ जीनसाज़ शेर मुहम्मद का मकान था।’ बूढ़े ने उत्तर दिया, ‘मैं उनसे एक मुद्दत से परिचित था । शेर मुहम्मद सुप्रसिद्ध मुल्ला नसरुद्दीन के पिता थे। और ऐ मुसाफ़िर, तुमने मुल्ला नसरुद्दीन के बारे में ज़रूर बहुत कुछ सुना होगा । ‘
‘हाँ, कुछ सुना तो है। लेकिन आप यह बताइए कि मुल्ला नसरुद्दीन के पिता जीनसाज़ शेर मुहम्मद और उनके घरवाले कहाँ गए ?’
‘इतने ज़ोर से मत बोलो मेरे बेटे । बुखारा में हज़ारों जासूस हैं। अगर वे हम लोगों की बातचीत सुन लेंगे तो हम परेशानियों मे पड़ जाएँगे। तुम ज़रूर कहीं बहुत से आ रहे हो इसलिए नहीं जानते कि हमारे शहर में मुल्ला नसरुद्दीन का नाम लेने की सख्त मुमानियत है। उसका नाम लेना ही जेल में ठूंस दिए जाने के लिए काफ़ी है। आओ, मेरे और पास आ जाओ। मैं तुम्हें बताता हूँ कि शेर मुहम्मद का क्या हुआ।’
घबराहट और बेचैनी को छिपाते हुए मुल्ला नसरुद्दीन बूढ़े के पास आ गया।
बूढ़े ने खाँसते हुए कहना शुरू किया, ‘यह घटना पुराने अमीर के ज़माने की है। मुल्ला नसरुद्दीन के बुखारा से निकल जाने के लगभग अठारह महीने के बाद बाज़ारों में अफ़वाह फैली कि वह गैर-कानूनी ढंग से चोरी-छिपे फिर बुखारा में लौट आया है और अमीर का मज़ाक़ उड़ाने वाले गीत लिख रहा है। यह अफ़वाह अमीर के महल तक भी पहुँच गई। सिपाहियों ने मुल्ला नसरुद्दीन को बहुत खोजा, लेकिन कामियाबी नहीं मिली। अमीर ने उसके पिता, दोनों भाइयों, चाचा और दूर तक के रिश्तेदारों और दोस्तों की गिरफ्तारी का हुक्म दे दिया। साथ ही यह भी हुक्म दे दिया कि उन लोगों को तब तक यातनाएँ दी जाएँ जब तक कि वे नसरुद्दीन का पता न बता दें। अल्लाह का शुक्र है कि उसने उन लोगों को ख़ामोश रहने और यातनाओं को सहने की ताक़त दे दी। लेकिन उसका पिता जीनसाज़ शेर मुहम्मद उन यातनाओं को सहन नहीं कर पाया। वह बीमार पड़ गया और कुछ दिनों बाद मर गया। उसके रिश्तेदार और दोस्त अमीर के गुस्से से बचने के लिए बुखारा छोड़कर भाग गए। किसी को पता नहीं कि वे कहाँ हैं? अमीर ने उनके बाग-बगीचे और मकानों को तहस-नहस और बर्बाद करने का हुक्म दे दिया ताकि मुल्ला नसरुद्दीन की याद तक बाकी न रहे । ‘
‘लेकिन उन पर ज़ोर-जुल्म क्यों किए गए ?’ मुल्ला नसरुद्दीन ने ऊँची आवाज़ में पूछा।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन बूढ़े ने उन्हें नहीं देखा। उसकी नज़र कमज़ोर थी।
‘उन्हें क्यों सताया गया? मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मुल्ला नसरुद्दीन उस समय बुखारा में नहीं था । ‘
‘यह कौन कह सकता है?’ बूढ़े ने कहा, ‘मुल्ला नसरुद्दीन की जब जहाँ मर्जी होती है, पहुँच जाता है। हमारा बेमिसाल मुल्ला नसरुद्दीन हर जगह है, और कहीं भी नहीं है।’
यह कहकर बूढ़ा खाँसते हुए आगे बढ़ गया।
नसरुद्दीन ने अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा छिपा लिया और गधे की ओर बढ़ने लगा।
उसने अपनी बाँहें गधे की गर्दन में डाल दीं और आँसुओं से भीगा अपना गाल उसकी गंधभरी गर्दन से लगाते हुए बोला, ‘ऐ मेरे अच्छे और सच्चे दोस्त, तू देख रहा है मेरे प्यारे लोगों में से तेरे सिवा और कोई नहीं बचा। अब तू ही मेरी आवारागर्दी में मेरा एकमात्र साथी है। ‘
गधा जैसे अपने मालिक का दुख समझ रहा था। वह बिल्कुल चुपचाप खड़ा रहा। उसने झाड़ी की पत्तियाँ तक खाना छोड़ दिया। वे उसके मुँह में लटकती रह गईं।
घंटे भर बाद मुल्ला नसरुद्दीन अपने दुख पर काबू पा चुका था। उसके आँसू सूख चुके थे।
‘कोई बात नहीं,’ गधे की पीठ पर धौल लगाते हुए चिल्लाया,
‘कोई चिंता नहीं। बुखारा के लोग मुझे अब भी याद करते हैं। उनके दिलों में अब भी मेरी याद बाक़ी है। किसी-न-किसी तरह हम कुछ दोस्तों को खोज ही लेंगे और अमीर के बारे में ऐसा गीत बनाएँगे – ऐसा गीत बनाएँगे कि वह गुस्से से अपने तख़्त पर ही फट जाएगा और उसकी गंदी आँतें महल की दीवारों पर जा गिरेंगी। चल मेरे वफ़ादार गधे ! आगे बढ़ ।’
