Samadhan
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Hindi Kahani: नितांत सूनी सीढ़ियाँ,बंद दरवाज़े और उनमे से केबल पर प्रसारित फ़िल्मों की आवाज़ों का शोर. दोपहर के बारह बजे भी सीढ़ियों पर उतरते चढ़ते ,दहशत सी होती है.समाचार पत्रों में लगभग रोज़ ही दिन दहाड़े होने वाली वारदातों की संख्या क्रमश: बढ़ती जा रही है. शुचि सोचा करती आज के माहौल में लोगों का दायरा कितना,सिमट गया है और मानस कितना संकुचित.. पास पास रहते हुए भी एक दूसरे से कितनी दूर.. यदि कोई घटना घटित हो जाय तो भी किसी को सुध लेने की फुर्सत नहीं होती.

  इसी उधेड़बुन में उसने नाइट लैच खोला..अम्मा जी जन्माष्टमी की तैयारियों में व्यस्त थीं.पिछले आठ साल से इस त्योहार पर छोटे से लल्ला को सुलाते समय वो,हमेशा यही प्रार्थना करती हैं कि,

“ हमारा घर आँगन भी इसी भाँति किलकारियों से गूँजे”

अम्मा की आँखों में,दादी बनने  की चाह देख कर शुचि का असहाय मन सोचने लगता है,

अम्मा जी को कितना विश्वास है अपनी श्रद्धा पर लेकिन क्या वो दिन कभी आएगा? क्या सच में ये घर आँगन नन्हें बालक की किलकारियों से गूंजेगा?”

घर में फैली खामोशी ने उस के मन में फैले सूनेपन को और भी गहरा कर दिया था.दुख तो इस बात का होता है उसे कि,हमेशा हँसती बतियाती रहने वाली शुचि के अंदर की पीड़ा और सूनेपन को सागर के अतिरिक्त कोई नहीं समझ पाता..इस अंतर्निहित स्वार्थ के आवरण में उनकी उदारता प्रशंसनीय है.

   सागर से असीम प्यार व अपरिमित सम्मान मिलने के बावजूद भी जीवन की यह रिक्तता उसे आजकल कुछ ज़्यादा ही सालने लगी थी.जीवन उद्देश्यहीन और निरर्थक प्रतीत होने लगा था.पार्टी,क्लब,फ़िल्मों या किसी भी मनोरंजन स्थल पर वो दिल बहला नहीं पाती.जहाँ जाती है सभी एक ही सवाल पूछते हैं,

” कोई खुशखबरी है क्या.…”

जिस प्रश्न से भागना चाहती है,वही प्रश्न बार बार दोहराया जाता है.कितनी बार तो,लोगों का मुँह बंद करने के प्रयास में वो,झूठी दलील भी  देती  है 

“ अभी हमने कुछ प्लान नहीं किया है” 

लेकिन उस समय लोग उसे इस तरह देखते हैं ,मानो उन्होंने उसके मन का चोर पकड़ लिया हो.और तब शुचि कमरा बंद करके घंटों रोती रहती है.

“ क्या सोच रही हो शुचि ,याद नहीं आज डॉक्टर ने बुलाया है”अपनी सोच में डूबी शुचि से सागर ने प्रश्न किया,

“ आज नहीं सागर,अपॉइंटमेंट कैंसिल कर दो”

“ शुचि हमदोनों ने अपने अपने परिवार जन्यों के ख़िलाफ़ जाकर विवाह किया था और संकल्प लिया था कि सुख दुख में हम दोनों एक दूसरे का साथ निभाएँगे. शहर के सर्वोत्तम डॉक्टर से तुम्हारा इलाज चल तो रहा है. थोड़ा धीरज तो रखना पड़ेगा न”

सच तो ये है. डॉक्टरों के चक्कर लगाते लगाते वो थक चुकी थी.उसे लगता  ऊपर वाले ने,उसकी ज़िंदगी की खूबसूरत डायरी का एक पन्ना कोरा ही छोड़ दिया है.उसका माँ बनना  किसी ईश्वरीय चमत्कार से कम नहीं. आख़िर कब तक और किस उम्मीद पर वो ये खेल खेलती रहेगी?

एकाएक शुचि की नज़र कॉर्नर टेबल पर सजे मनीप्लांट पर अटक गई. उसमे नन्हीं नन्हीं कोपलें फूट रहीथीं.शुचि मानो अपने आप से बात कर रही थी.

“नन्हें नन्हें फूल पौधों को जतन करने के शौक़ को, सागर दीवानगी का नाम देते हैं.उन्हें क्या मालूम कि इनमे आने वाली नन्हीं कोपलें शुचि के  मन में न जाने कितने ही आशा के दीप जलाती रहती हैं. इन नन्हीं कोपलों का धीरे धीरे आकर लेना उसके लिए किसी सुखद अनुभूति से कम नहीं”

अंतर्मन में लबालब भरे ममत्व के झरने को निर्बाध गति से बहते हुए देखने का संकल्पित मन,लिए,उसने कई बार सागर से बच्चा गोद लेने की बात की थी पर न जाने क्यों,उच्चशिक्षित होने के बावजूद,इस मामले में उनके विचार रूढ़िवादी हो जाते हैं. शायद अम्मा जी से डरते हैं.

डर तो उसके मन में भी है,सोचती है,वो स्वयं भी तो इतनी मज़बूत नहीं कि किसी दूसरे के बच्चे को अपने सीने से लगा सके. आशंकित मन सोचने लगता है,.क्या वो ख़ुद भी बच्चे को वो स्नेह और ममता दे पाएगी जिसका वो हकदार है? यदि वो ऐसा नहीं कर पायी तो?और अम्मा? यदि उन्होंने उस बच्चे को दिल से नहीं अपनाया तो?बच्चा मानसिक रूप से उस से और सागर से  दूर नहीं हो जाएगा?आज के दौर में जब अपने बच्चे ही अपने नहीं होते तब किसी दूसरे का खून अपना कैसे हो सकता है?

 कितने सवाल शुचि के मन मस्तिष्क में उठ रहे थे.तूफ़ान भी कुछ समय बाद थम जाता है ,लेकिन उसके भीतर का तूफ़ान नहीं थम रहा था.ये बहुत बड़ा निर्णय था जिसे अम्मा और सागर की सहमति के बिना वो अकेले नहीं ले सकती थी.

आसमान ,सतरंगी इंद्रधनुष से सुसज्जित था. कुदरत भी जैसे उसके फ़ैसले पर प्रसन्नता व्यक्त कर रही थी. असमंजस की स्थिति में वो सोच रही थी कि,किन शब्दों में वो सागर को अपना निर्णय सुनाएगी?यदि सागर की प्रतिक्रिया विरुद्ध हुई तो? 

आख़िर उसने अपने मन को संयमित किया,नकारात्मक विचार को मस्तिष्क से निकालकर सागर की स्टडी तक पहुँच गई. अम्मा जी आराम कुर्सी पर बैठीं कोई किताब पढ़ रही थीं. सागर लैप टॉप पर काम कर रहे थे.शुचि ने धीरे से पुकारा,

“सागर”

वो चुप रहे”

फिर उसने अम्मा की तरफ़ रुख़ किया,”अम्मा,कृष्ण भगवान को जन्म तो देवकी ने दिया था,परंतु पूजा तो यशोदा माँ को ही जाता है न?”

“बहू,वो इसलिए क्योंकि जन्म देने वाली से कहीं बड़ा दर्जा पालने वाले का होता है”

“ अम्मा,यदि यशोदा मैया के जीवन में लल्ला के आगमन से उनका आँगन किलकारियों और अठखेलियों से गूंजती हो उठा तो,अपने आँगन में किसी देवकी का लल्ला क्यों नहीं आ सकता?फिर मैं भी तो उस पर ममता न्योछावर करूँगी ,तो वो भी कृष्ण की तरह हमे ज़रूर स्नेह देगा.अम्मा क्या वक्त के साथ कभी प्रेम बदला है? यदि वो तब संभव था तो अब क्यों नहीं?”

उदास गमगीन सागर देर तक,शुचि के चेहरे पर उतरते चढ़ते भावों को पढ़ने का प्रयास कर रहे थे. शुचि ने साफ़ किंतु स्पष्ट शब्दों में अपना निर्णय सुनाया,

“मैंने अनाथाश्रम से बच्चा गोद लेने का पक्का इरादा कर लिया है.किंतु आपके आशीर्वाद के बिना मैं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकूँगी”

सागर वहीं थे,उन्होंने कुछ नहीं कहा..अम्मा अभी भी पालने में फूल सजा रही थीं.भाव विभोर होकर बोलीं,

“ कन्हैया ने यशोदा के गर्भ से नहीं देवकी के गर्भ से इस पृथ्वी पर अवतार लिया था.जा बेटी जा आज अपने लल्ला को घर लेन की तैयारी कर”

 उन्होंने अपना वरद हस्त शुचि के सिर पर रखा तो सागर और शुचि दोनों उनके गले लग गए थे.शुचि सोच रही थी,कि यदि ईश्वर हमे कोई संकट देते हैं तो साथ में उसका समाधान भी ज़रूर देते हैं. ये हमारे ऊपर है कि हम कौन सा रास्ता चुनते हैं.खिला खिला चंद्रमा मुस्कुरा रहा था और दो जोड़ी आँखे सपनों का ताना बाना बन रहे थे

पुष्पा भाटिया

मेरा नाम मोनिका अग्रवाल है। मैं कंप्यूटर विषय से स्नातक हूं।अपने जीवन के अनुभवों को कलमबद्ध करने का जुनून सा है जो मेरे हौंसलों को उड़ान देता है।मैंने कुछ वर्ष पूर्व टी वी और मैग्जीन के लिए कुछ विज्ञापनों में काम किया है । मेरा एक...