jara sanbhal ke babu Motivational story
jara sanbhal ke babu Motivational story

कुप्पू की साइकिल सड़क पर जोर से फर्राटा न भरे तो भला उसे कुप्पू की साइकिल कौन कहे? उसने कोई हफ्ता भर पहले ही अपने प्यारे दोस्त सत्ते से साइकिल चलाना सीखा था। बड़ी चोटें खाकर। और बेचारे सत्ते ने भी क्या – क्या जतन न किए उसे सिखाने के लिए! खूब पसीना बहाया।… पर अब तो कुप्पू खुद को उस्ताद समझता था और साइकिल के बगैर उसे चैन ही नहीं पड़ता था। यहाँ तक कि घर के बिल्कुल पास जाना होता, तो भी वह बड़ी शान से साइकिल पर चढ़कर जाता।

एकदम हीरो वाले अंदाज में उछलकर गद्दी पर बैठता, फिर दे – दनादन पैडल शुरू! उसे इसमें मजे आते थे। हालाँकि एक-दो बार तो कुप्पू इसी तेजी की वजह से साइकिल से गिरते-गिरते बचा। पापा ने बड़े प्यार से समझाया, “कुप्पू, ऐसे तो चोट लग जाएगी। तुम जरा धीरे साइकिल चलाया करो।” कुप्पू ने सुना, ऊपर-ऊपर से हाँ-हाँ भी की, पर जल्दी ही भूल गया। तेज साइकिल चलाने में जो मजा आता था, वह भला पापा को कैसे समझाए? मगर इस फर्राटे के चक्कर में एक-दो बार तो उसने ऐसे गलत मोड़ काटे कि अगर सामने वाले ने तुरंत समझदारी से ब्रेक न लगाए होते, तो सचमुच टक्कर हो जाती। दो-एक बार सत्ते ने भी देखा। उसने हलके से डाँटा, “कुप्पू, यह क्या बेवकूफी है? तुम गिरोगे तो लोग कहेंगे, सत्ते ने क्या खाक साइकिल सिखाई है! थोड़ा देख – भालकर चलाओ।” पर कुप्पू को भला क्या परवाह? अब तो साइकिल चलाना उसके लिए नशा था। एक दिन ऐसे ही कुप्पू चौराहे पर गलत मोड़ काट रहा था, तभी उसकी साइकिल सामने से आ रहे मोनू की साइकिल से टकराई और झट नीचे गिर गई। मोनू को थोड़ी चोट आई, पर वह बड़ा अच्छा और समझदार था। कुप्पू के मोहल्ले में ही उसका घर था। लिहाजा कुप्पू पर गुस्सा न करके वह अपनी राह चला गया। हाँ, जाने से पहले उसने कुप्पू को हाथ पकड़कर उठाया और प्यार से बोला, “जरा आसपास देखकर चलाया करो।”

उसके जाने के बाद कुप्पू धूल झाड़ते हुए देखने लगा, भला कहाँ-कहाँ चोट लगी है? उसके हाथ-पैरों में खरोंचें आ गई थीं। कपड़ों पर भी धूल लगी थी। पर साइकिल की हालत तो इससे भी बुरी थी। वह बुरी तरह कराह रही थी। खासकर साइकिल के पहिए एकदम टेढ़े-मेढ़े हो गए थे। हैंडिल भी बड़े अजीब ढंग से मुड़-तुड़ गया था। कुप्पू को लगा, साइकिल से आवाज आ रही है, “हाय-हाय …! हाय-हाय कुप्पू, तुमने मेरी क्या हालत कर दी! तुम तो बहुत गंदे हो कुप्पू!” कुप्पू दुखी और शर्मिंदा था। अब भला वह साइकिल कैसे चलाए? जैसे-तैसे उसे घसीटता हुआ घर तक लाया और रोते हुए बोला, “पापा, मेरी साइकिल…!” पापा ने कुप्पू की यह हालत देखी, तो कुछ कहा नहीं। उसी समय गए और अपनी जान-पहचान के मैकेनिक मुन्ने खाँ से साइकिल ठीक कराकर ले आए। साइकिल अब ऊपर से देखने में ठीक-ठाक लग रही थी। फिर भी न जाने क्यों, उसकी कराह नहीं गई। कुप्पू को लगता, जैसे साइकिल से कराहती हुई शिकायती आवाज आ रही है, ‘देखो, देखो कुप्पू! देखो, मैं कितनी सुंदर थी और तुमने मुझे बदसूरत बना दिया। अगर तुम ठीक से चलाते, तो मेरी शक्ल क्या ऐसी होती?

मुझे अंदर तक चोट…!’ साइकिल जब कराहती हुई अपनी बात कह रही थी, तो उसकी बात हैंडिल पर लगी सफेद खरगोशनी जैसी घंटी ने भी सुनी। उसने कहा, “तुम चिंता न करो प्यारी बहन! मैं कुछ करूँगी।” “तुम…! तुम कैसे करोगी भला? मुझे तो यकीन नहीं आ रहा।” दुखी साइकिल ने अचकचाकर कहा। इस पर खरगोशनी जैसी शक्ल वाली घंटी टुनटुन करके हँसते हुए बोली, “तुम देखती जाओ प्यारी बहन, कि मैं क्या करती हूँ?” * अगले दिन कुप्पू साइकिल पर बैठकर कुछ दूर आगे गया ही था कि एकाएक घंटी बजी। उसमें से आवाज आई, “जरा सँभल के बाबू, सँभल के! अरे भई कुप्पू, सँभल के!” कुप्पू को समझ में नहीं आया, कहाँ से आ रही है यह घंटी जैसी टुनटुनाती आवाज! क्या घंटी से? उसने सफेद खरगोशनी जैसी शक्ल वाली अपनी घंटी को बजाकर देखा, पर घंटी तो ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन बोल रही थी। तो फिर किसने अभी-अभी कहा, ‘जरा सँभल के बाबू, सँभल के!’… यह तो अजीब बात है, बड़ी अजीब! कुछ देर बाद कुप्पू यह सब भूलकर फिर मस्ती से साइकिल चलाने लगा। आगे एक तीखा मोड़ था, गोलाई वाला। कुप्पू को मोड़ पर तेजी से साइकिल चलाने में मजा आता था, जिससे साइकिल तेज-तेज घूमती थी हवा से बातें करते हुए। पर इस बार जैसे ही उसने मोड़ पर साइकिल की स्पीड बढ़ाई, उसे फिर वही आवाज सुनाई दी – सँभलकर साइकिल चलाना कुप्पू, सँभल के, वरना पड़ेगा बहुत पछताना बाबू, सँभल के! सुनकर कुप्पू हक्का-बक्का रह गया। पर यह बात सिर्फ कुप्पू ने ही नहीं, सड़क पर चलते लोगों ने भी सुनी। वे जोरों से हँस पड़े। उन्हें यों तालियाँ पीट-पीटकर हँसते देखा, तो कुप्पू को बड़ी शर्म आई। आखिर कुप्पू को अपनी गलती समझ में आ गई और उसने आसपास अच्छी तरह देख-भालकर, जरा कायदे से साइकिल चलाना शुरू किया। इस पर सबसे ज्यादा खुश था उसका दोस्त सत्ते। वह बार-बार खुश होकर कहता था, “आखिर तुम ठीक राह पर आ ही गए कुप्पू! मुझे पता था… मुझे पता था एक दिन…!” कहते-कहते उसकी आँखों में खुशी झिलमिला उठी। खुश कुप्पू भी था, पर वह आज तक समझ नहीं पाया कि किसने उसे आवाज देकर कहा था, “सँभल के साइकिल चलाना कुप्पू, सँभल के!” हाँ, पर उसके हैंडिल पर लगी सफेद खरगोशनी जैसी शक्ल वाली घंटी कभी-कभी ऐसी शरारती नजरों से उसे देखकर हँसती है कि कुप्पू को लगता हैं, हो न हो, यह शरारत इस प्यारी खरगोशनी की ही है।