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Moral Stories in Hindi "Yah Dosti Ab Nahi Todengen"

Moral Stories in Hindi “Yah Dosti Ab Nahi Todengen”

पात्र-परिचय हवा दीदी निक्का, निक्की और मोहल्ले के अन्य बच्चे बहेलिया, लघुपतनक कौआ, कबूतर और उनका मुखिया चित्रग्रीव चूहा हिरण्यक, कछुआ मंदरक, चित्रांग हिरन, लालची लुब्धक सियार तथा गज्जू दादा

पहला दृश्य

(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान, जिसमें एक तरफ बच्चे खड़े-खड़े बातें कर रहे हैं। तभी हवा तेजी से बहती हुई आती है और बच्चों को मजे से बातें करते और खेलते देख, ठिठक जाती है। फिर हवा दीदी बच्चों के पास आकर बड़े उत्साह से बताने लगती है….)

हवा दीदी : अरे वाह, दोस्ती हो तो ऐसी। मैं तो देखकर गद्गद हो गई।

निक्का : दोस्ती किसकी…।

निक्की : किसकी दोस्ती हवा दीदी? तुम क्या कह रही हो? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता।

हवा दीदी : (हँसते हुए) सच्ची पूछो, तो जब मैंने जंगल से गुजरते हुए देखा था यह नाटक तो खुद मेरी समझ में नहीं आया था। यह दोस्ती भला कैसे हो सकती है? एक चूहे की कबूतरों के मुखिया से, कौए और हिरन से दोस्ती। और वह भी ऐसी पक्की कि वाह-वाह। मेरा मन तो इस दोस्ती पर निसार हो जाता है।

निक्का : सच्ची हवा दीदी?

निक्की : तब तो आप हमें भी यह किस्सा सुनाइए?

हवा दीदी : हाँ-हाँ, सुनाऊँगी, सुनाऊँगी, पंचतंत्र की यह कहानी। पर पहले तो तुम नाटक देखो?

निक्का : नाटक…?

निक्की : कैसा नाटक हवा दीदी?

हवा दीदी : एक चूहे और कबूतरों के मुखिया और कौए और हिरन की दोस्ती का यह नाटक, जो मैंने जंगल में देखा था। और इसे बड़े ही अनोखे ढंग से करा रहे थे अपने गज्जू दादा। लो, तुम भी देखो यह नाटक।

दूसरा दृश्य

(स्थान-एक घने जंगल का दृश्य। उस जंगल में विशाल बरगद का एक पेड़ था। उस पर अनेक पक्षी रहते थे। उन्हीं में लघुपतनक नाम का कौआ भी था। वह बड़ा समझदार था तथा उसके दिल में दूसरों के लिए बड़ा प्यार और हमदर्दी थी।)

लघुपतनक : (अपने आप से) पता नहीं, लोग दूसरों को सताते क्यों हैं? अगर सब प्यार से रहें और एक-दूसरे की मदद करें, तो यह दुनिया स्वर्ग बन सकती है। लेकिन कब से मैं तलाश रहा हूँ, मुझे इस दुनिया में कोई ऐसा दोस्त नहीं मिला, जिसके दिल में दूसरों के लिए सच्चा प्यार हो।

(एक बार लघुपतनक कौए ने एक भयानक बहेलिए को देखा। उसके पास एक बड़ा विशाल जाल था। आते ही उसने पेड़ के पास अनाज के कुछ दाने बिखराए और उस पर जाल डाल दिया। इसके बाद खुद थोड़ी दूर जाकर बैठ गया।)

लघुपतनक : (अपने आप से) ओह, मैं समझ गया कि यह बहेलिया क्या चाहता है? इसने कितनी होशियारी से जाल डाला है, ताकि जब पक्षी इस जाल में फँस जाएँ तो वह उन्हें पकड़कर मार डाले।

(लघुपतनक कौआ दूर से उस बहेलिए की करतूत देख रहा था। उसने बरगद पर बैठे सभी पक्षियों को चेता दिया।)

लघुपतनक : देखो, तुम इस बहेलिए के जाल में मत फँस जाना। यह बड़ा दुष्ट है, दाने डालकर और उस पर जाल बिछाकर दूर बैठ गया है, ताकि जो भी पक्षी इसमें फँसे, उसे वह आसानी से मार डाले।

(यह सुनकर बरगद पर बैठे सभी पक्षी सतर्क हो गए।)

एक कौआ : हाँ भाई, लघुपतनक की बात तो ठीक है।

दूसरा कौआ : सचमुच यहाँ तो खतरा है।

तीसरा कौआ : खतरा, बड़ा खतरा। हमें सावधान रहना चाहिए। वरना तो इस बहेलिए के जाल से बचना मुश्किल है।

तीसरा दृश्य

(थोड़ी देर में कबूतरों की एक विशाल टोली कहीं से उड़ती हुई आई। उन्होंने नीचे दाने देखे तो सभी के मन में लालच आ गया। वे झटपट उन दानों को खाना चाहते थे। पर उन कबूतरों के बुद्धिमान और समझदार मुखिया चित्रग्रीव ने उन्हें रोका।)

चित्रग्रीव : सुनो साथियो, मेरी बात ध्यान से सुनो, वरना हमें पछताना पड़ सकता है। जरा सोचो, धरती पर इस तरह दाने भला किसने बिखराए होंगे? मुझे तो इसमें कोई बड़ा धोखा लग रहा है। हमें लालच में नहीं फँसना चाहिए, नहीं तो हमें अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है।

(पर कबूतर भूखे थे। दाने देखकर उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने अपने मुखिया की बात अनसुनी कर दी।)

एक कबूतर : पर ये दाने तो हम खाएँगे, फिर चाहे जो भी हो।

कुछ कबूतर : हाँ-हाँ, क्या करें? हमें बुरी तरह भूख लगी है। तो फिर क्या करें हम?

(जैसे ही वे उन दानों को चुगने के लिए बैठे, वे बुरी तरह जाल में फँस गए। अब तो सारे कबूतर परेशान ! उन्हें सामने मौत दिखाई दे रही थी।)

एक कबूतर : अरे-अरे, लालच में पड़कर हम मारे गए।

दूसरा कबूतर : अब तो हमारा बच पाना मुश्किल है।

तीसरा कबूतर : काश, हमने अपने मुखिया चित्रग्रीव की सलाह मान ली होती।

सभी कबूतर : अब तो मरने के लिए तैयार हो जाओ। यह दुष्ट बहेलिया हमें छोड़ेगा नहीं।

(कबूतरों को दुखी देखकर, उनके मुखिया चित्रग्रीव को दया आ गई।)

चित्रग्रीव : देखो, मैंने तुम्हें कितना समझाया था, पर लालच में अंधे होकर तुमने मेरी बात नहीं सुनी। लेकिन अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। तुम लोग कोशिश करो तो अब भी अपनी जान बचा सकते हो।

सभी कबूतर : (एक साथ) भला कैसे? कृपया जल्दी बताइए, इस समय हमारे पास बचने का क्या रास्ता है?

चित्रग्रीव : (गंभीर होकर) मेरी बात ध्यान से सुनो। अगर तुम सभी एक साथ जोर लगा करके एक ही दिशा में उड़ोगे, तो यह जाल भी तुम्हारे साथ उड़ जाएगा। फिर यह बहेलिया तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। बस, जान बचाने का अब अकेला यही रास्ता बचा है।

सभी कबूतर : (एक साथ) तो ठीक है, ठीक है, हम यही करेंगे।

(चित्रग्रीव की बात सुनकर कबूतरों ने एक ही दिशा में पूरी ताकत लगाकर उड़ना शुरू किया। पूरा जोर लगाकर वे उड़े तो जाल भी उनके साथ ही उड़ने लगा। फिर वे मिलकर एक ही दिशा की ओर चल पड़े। बहेलिए ने यह देखा तो हक्का-बक्का रह गया।)

बहेलिया : (दुखी होकर) अरे, यह क्या हुआ? कहाँ तो मैं खुश हो रहा था कि इतने सारे कबूतर मेरे जाल में फँस गए और कहाँ मुझे जाल से भी हाथ धोना पड़ा। यह तो बुरा हुआ, बहुत बुरा। अरे, ऐसा तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।

(बरगद के पेड़ पर बैठा कौआ लघुपतनक यह तमाशा देख रहा था। उसे कबूतरों के मुखिया चित्रग्रीव की समझदारी देखकर बड़ा अच्छा लगा।)

लघुपतनक : (अपने आप से) सचमुच, कबतरों का मुखिया तो बड़ा ही समझदार निकला। इसकी जितनी भी तारीफ की जाए, कम है। अपनी समझदारी से इसने सभी कबूतरों को संकट से निकाल लिया। लेकिन अब भला ये कबूतर जाते कहाँ हैं और करते क्या हैं? मुझे यह जानने की बड़ी उत्सुकता है। इसलिए मैं भी उनके पीछे-पीछे उड़कर जाता हूँ। देखू कि ये आखिर कैसे बच पाते हैं?

चौथा दृश्य

(आखिर चित्रग्रीव के साथ उड़ते हुए सभी कबूतर जंगल में एक जगह पहुँचे। वहाँ चित्रग्रीव का दोस्त हिरण्यक चूहा रहता था। चित्रग्रीव ने आवाज दी, तो हिरण्यक चूहा झट बाहर आ गया।)

हिरण्यक : अरे मित्र, मुझे किसलिए याद किया है ? सब कुशल तो है!

(चित्रग्रीव ने पूरी बात सुनाकर उसे सभी कबूतरों के बंधन काटने के लिए कहा।)

हिरण्यक : दोस्त, बात तो तुम ठीक कह रहे हो, पर मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। मेरे दाँत कमजोर हो गए हैं और यह जाल बड़ा मजबूत है। कह नहीं सकता कि जाल काटकर सभी कबूतरों को छुड़ा पाऊँगा या नहीं? लेकिन तुम तो सब कबूतरों के मुखिया ठहरे। फिर मेरे पक्के मित्र भी हो। तो पहले तुम्हारे ही बंधन काट देता हूँ।

चित्रग्रीव : न-न मित्र, ऐसा अनर्थ मत करना। मैं इन कबूतरों का मुखिया हूँ। मुखिया का धर्म है कि पहले सबकी जान बचाए, फिर अपने बारे में सोचे। जब तक तुम एक-एक कबूतर के बंधन नहीं काट देते, मैं नहीं चाहूँगा कि तुम मेरे बंधन काटो।

हिरण्यक : वाह मित्र! मैंने तुम्हारे जैसे अच्छे और ऊँचे आदर्शों वाले लोग बहुत कम देखे हैं। मैं जी भरकर तुम्हारी तारीफ करता हूँ। अब मैं सबके बंधन काटने के बाद ही तुम्हारे बंधन काढूँगा।

(दूर बैठा लघुपतनक कौआ भी यह सुन रहा था। चित्रग्रीव की बात सुनकर उसके मुँह से भी निकला…)

लघुपतनक : वाह-वाह चित्रग्रीव, वाह ! मैंने तुम्हारे जैसे बड़े दिल का कोई मुखिया आज तक नहीं देखा। सचमुच तुम्हारा कोई जवाब नहीं!

(हिरण्यक चूहा पूरे जोश और उत्साह से भरकर अपने काम में जुट गया। उसने एक-एक कर सारे कबूतरों के बंधन काट दिए। अंत में चित्रग्रीव को भी बंधन से मुक्त कर दिया। चित्रग्रीव और दूसरे कबूतरों ने बार-बार उसे धन्यवाद दिया और नीले आसमान की ओर उड़ चले।)

पाँचवाँ दृश्य

(लघुपतनक कौआ यह सारा कुछ देख रहा था। उसके मन में कबूतरों के मुखिया चित्रग्रीव की उदारता की गहरी छाप पड़ गई थी।)

लघुपतनक : (अपने आप से) मेरे मन से बार-बार चित्रग्रीव के लिए प्रशंसा के शब्द फूटते हैं। साथ ही हिरण्यक चूहे की मित्रता का भी मैं बड़ा कद्रदान बन गया हूँ। दोनों पुराने मित्रों चित्रग्रीव और हिरण्यक की मीठी बातचीत और एक-दूसरे पर उनके भरोसे ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया। इतने अच्छे लोग दुनिया में बहुत कम मिलते हैं। काश, मुझे भी इनकी मित्रता का सौभाग्य मिल पाता।

(चित्रग्रीव और उसके साथी कबूतर उड़कर चले गए। लघुपतनक कौआ अपने आप से…)

लघुपतनक : मेरा मन बार-बार कह रहा है कि काश! मैं भी इतने अच्छे दोस्त हिरण्यक चूहे से दोस्ती कर सकूँ! पता नहीं, मेरी यह इच्छा पूरी होगी भी कि नहीं? पर जो भी हो, मुझे एक बार कोशिश तो जरूर करनी चाहिए।

(लघुपतनक जिस पेड़ पर बैठा था, उसने वहीं से आवाज लगाई।)

लघुपतनक : भाई हिरण्यक चूहे, मेरी बात सुन रहे हो ना? मैं हूँ लघुपतनक कौआ। मैं तुम्हारी मित्रता और उज्ज्वल चरित्र से बहुत प्रभावित हूँ और तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ। क्या तुम मुझसे दोस्ती करना पसंद करोगे?

हिरण्यक : (गंभीर होकर) अरे भई लघुपतनक कौए, तुम्हारे और मेरे स्वभाव में बड़ा अंतर है। कौओं का तो काम ही है चूहों को खाना। फिर भला मेरी और तुम्हारी मित्रता कैसे हो सकती है?

लघुपतनक : (बहुत भावपूर्ण लहजे में) बात असल में यह है भाई हिरण्यक, कि मैं तुमसे और तुम्हारी मित्रता से बहुत अधिक प्रभावित हूँ और तुमसे दोस्ती करने के लिए तरस रहा हूँ। तुम मुझे अच्छी तरह आजमा लो, फिर दोस्ती करना। लेकिन करना जरूर। सच मानो तो तुमसे दोस्ती करना मेरे जीवन का बड़ा सौभाग्य होगा। मैंने अपने जीवन में तुम्हारे जैसे अच्छे और सच्चे मित्र बहुत कम देखे हैं।

(लघुपतनक की बातों में सच्चाई थी। उसने हिरण्यक के मन को छू लिया।)

हिरण्यक : (अपने आप से) यह कौआ तो सचमुच बड़ा नेक और अच्छे स्वभाव का लगता है। मैं खामखा इतनी देर से इसे बुरा-भला कह रहा हूँ।

(कुछ समय में ही लघुपतनक कौए और हिरण्यक चूहे में खासा प्रेम और विश्वास पैदा हो गया। अब वे अकसर साथ-साथ ही रहते थे। फिर एक दिन लघुपतनक ने हिरण्यक चूहे से विदा माँगी।)

लघुपतनक : सुनो मित्र, अब शायद हमारे बिछुड़ने का समय आ गया। मैं यहाँ से जा रहा हूँ।

हिरण्यक : (चौंककर) क्यों-क्यों, भला ऐसी क्या बात आ गई?

लघुपतनक : सुनो मित्र, यहाँ का राजा बड़ा अन्यायी है। लोग इसके कारण बहुत दुखी हैं। कहते हैं, ऐसे राज्य में रहने से कोई लाभ नहीं, जिसका राजा क्रूर और कठोर हो। इसलिए मुझे लग रहा है कि हमें तत्काल उस राज्य को छोड़ देना चाहिए। दक्षिण में एक दुर्गम वन है। वहाँ एक बहुत बड़ा तालाब है। उसमें मेरा मित्र मंथरक कछुआ रहता है। मेरा मन है कि उसके पास जाऊँ और वहीं जाकर रहूँ। इससे अपने उस पुराने मित्र से मिलने का मौका भी मिलेगा।

हिरण्यक : अगर यही बात है तो फिर मुझे यहाँ अकेले किसके भरोसे छोड़े जाते हो? मुझे भी अपने साथ ले चलो।

लघुपतनक : (खुश होकर) हाँ-हाँ, ठीक है मित्र, चलो मेरे साथ।

छठा दृश्य

(लघुपतनक कौए ने हिरण्यक चूहे को अपनी चोंच में दबाया और उड़ चला। दोनों दुर्गम वन में आ पहुँचे। फिर वे उस तालाब के पास पहुंचे जिसमें लघुपतनक का दोस्त मंथरक कछुआ रहता था।)

मंथरक : (डरकर) अरे, यह चूहा कहाँ से आ गया? यह तो बड़ा खतरनाक मालूम पड़ता है। मुझे जल्दी से पानी में डुबकी लगा लेनी चाहिए।

(मंथरक कछुए ने हिरण्यक चूहे को देखकर झट पानी में डबकी लगा ली। पर लघपतनक कौए ने अपनी पुरानी मित्रता की याद दिलाई तो वह बाहर निकल आया।)

मंथरक : (खुश होकर) ओह, तुम्हारे साथ हिरण्यक चूहे को देखकर मैं तो डर गया था। पर अब मैं निश्चिंत हूँ। आओ मित्र आओ। स्वागत है तुम्हारा!

(फिर तीनों मित्रों लघुपतनक कौए, हिरण्यक चूहे और मंथरक कछुए ने बड़ी मीठी-मीठी बातें होने लगीं। तीनों ने एक-दूसरे को अपने दिल का हाल बताया। हिरण्यक चूहे ने अपने पिछले जन्म की दुखभरी कथा सुनाई। उसे सुनकर मंथरक कछुआ बहुत प्रभावित हुआ।)

मंथरक : भाई, मैं जानता हूँ कि तुम बहुत दुखी हो। पर अपने दुख के आँसू पोंछ डालो। मैं तुम्हारा सच्चा मित्र हूँ। तुम मित्र के घर आए हो तो फिर दुख किस बात का? खुशी-खुशी यहाँ रहो। तुम्हारी जो भी सेवा मैं कर सकूँगा, जरूर करूँगा।

(तीनों मित्र खुशी-खुशी उस सरोवर के किनारे रहने लगे। इतने में एक दिन उन्होंने देखा, एक हिरन घबराया हुआ उसी ओर भागा आ रहा है। उसके पीछे-पीछे हाथ में धनुष-बाण लिए बहेलिया था जो उसे मार डालना चाहता था। लघुपतनक कौए को हिरन पर बड़ा तरस आ गया।)

लघुपतनक : अरे भई हिरन, तुम इतने भयभीत क्यों हो? यहीं कहीं छिप जाओ, जिससे बहेलिया तुम्हें ढूँढ़ न पाए। हम तुम्हारे सच्चे मित्र हैं। तुम निर्भय और निश्चिंत होकर यहाँ रहो।

(सुनकर चित्रांग हिरन को बड़ा चैन पड़ा। अब तीन मित्रों की मंडली में एक चौथा मित्र चित्रांग हिरन भी शामिल हो गया था। चारों आपस में खूब बातें करते। खुलकर अपने मन का हाल बताते तथा दुख में एक-दूसरे का दिल बहलाने की कोशिश करते। अकसर वे साथ-साथ ही घूमने भी निकलते थे। उनका प्यार और दोस्ती देखकर जंगल के दूसरे जानवर भी बहुत हैरान होते थे।)

जंगल के दूसरे जानवर : (एक साथ) सचमुच दोस्ती हो तो ऐसी। सच्ची बात तो यह है कि इतने अच्छे दोस्त बहुत कम होते हैं, जो दूसरे के लिए जान की भी परवाह न करते हों।

(कुछ दिन बाद वहाँ घूमता-घामता एक लालची सियार आया। हिरन को देखकर उसके मुँह में पानी भर आया।)

लुब्धक सियार : (अपने आप से)जैसे भी हो, मैं इस हिरन को जरूर खाऊँगा। पर कोई बढ़िया तरीका निकालना होगा, नहीं तो इसके मित्र इसकी मदद के लिए आ जाएँगे। फिर मेरी इच्छा कैसे पूरी होगी?

सातवाँ दृश्य

(पर चित्रांग हिरन तो हर वक्त अपने बाकी तीन मित्रों के साथ रहता था। तो भला वह उसे कैसे फाँस पाता? सियार अपने आप से…)

लुब्धक सियार : अरे वाह, एक तरीका समझ में आ गया। मैं इस हिरन से दोस्ती नहीं, दोस्ती का नाटक करूँगा। अपनी कपट दोस्ती में इसे फँसाकर, फिर मजे से इसका मांस खाऊँगा।

(एक दिन लुब्धक सियार ने चित्रांग हिरन से प्यार का दिखावा करते हुए बात शुरू की।)

लुब्धक सियार : तुम मुझे बड़े अच्छे और भोले-भाले लगते हो। मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ। लगता है, इस दोस्ती से हम दोनों को ही खूब आनंद मिलेगा। तो बताओ, क्या तुम मुझे दोस्त बनाना मंजूर करोगे?

चित्रांग : भाई, तुम बातें तो बड़ी मीठी कर रहे हो। लगता है, तुम भी दिल के बड़े अच्छे हो। जल्दी ही मैं अपने साथी मित्रों से पूछूगा। अगर उन्हें आपत्ति नहीं हुई तो मैं तुम्हें जरूर अपना मित्र बना लूँगा।

लुब्धक सियार : ठीक है भाई, पर जल्दी पूछकर बताना। मैं तुमसे मित्रता करने के लिए तरस रहा हूँ।

(आखिर चित्रांग हिरन ने एक दिन अपने साथियों के आगे बात चलाई।)

चित्रांग : इन दिनों लुब्धक मुझसे बहुत दोस्ती की बातें करता है। वह बड़ा खुशमिजाज है और हमेशा हँसता-मुसकराता रहता है। क्या हम उसे मित्र बना सकते हैं?

(इस पर चित्रांग के दोस्तों के मन में खटका हुआ।)

लघुपतनक : भई, हम तो लुब्धक सियार को जानते नहीं। पता नहीं उसके मन में क्या है? उसकी नीयत कैसी है? कहीं उसको मित्र बनाने से तुम्हें प्राणों के लाले न पड़ जाएँ?

चित्रांग : मुझे लगता है, वह ऐसा नहीं है, बातें तो बड़ी भली-भली करता है।

हिरण्यक : पर होशियार रहने की जरूरत है। कई बार मीठी बात करने वाले पीठ में छुरा भी घोंप देते हैं।

(लेकिन चित्रांग हिरन के बार-बार अनुरोध करने पर किसी तरह बेमन से उसके दोस्तों ने लुब्धक सियार की दोस्ती मंजूर कर ली। अब तो लुब्धक सियार चित्रांग हिरन से बार-बार मिलता। दोनों कभी-कभी साथ-साथ घूमने भी चले जाते।)

लुब्धक सियार : चलो मित्र, घूमने चलें। आज किसी नए रास्ते पर चलते हैं।

चित्रग्रीव : हाँ-हाँ, चलो।

लुब्धक सियार : सच-सच बताओ, मेरे साथ घूमना तुम्हें अच्छा लगता है न?

चित्रग्रीव : (मजे में सिर हिलाकर) बहुत अच्छा लगता है, बहुत अच्छा।

लुब्धक सियार : अभी तो तुमने देखा ही क्या है ? मैं तुम्हें जंगल और आसपास के गाँवों में ऐसी कई जगहें दिखाऊँगा, जहाँ खूब हरियाली ही हरियाली है। तब और भी मजा आएगा।

चित्रग्रीव : (खुश होकर) अरे वाह, फिर तो मेरी मौज आ जाएगी। खूब हरी-हरी घास खाऊँगा।

(एक दिन लुब्धक सियार ने देखा कि बहेलियों ने कहीं खेत में जाल डाला हुआ है। बस, वह दौड़ा दौड़ा हिरन के पास गया।)

सियार : झटपट मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें एक ऐसे खेत में ले चलता हूँ, जहाँ चारों ओर खूब हरियाली है। ऐसा लगता है, मानो स्वर्ग का सुख धरती पर उतर आया हो।

(सुनकर चित्रांग हिरन झटपट सियार के साथ चल पड़ा। पर जैसे ही वहाँ वह नरम-नरम पत्तों को खाना चाहता था, उसके पैर जाल में फँस गए। घबराहट के मारे वह पसीने-पसीने हो गया। उसने उसी समय सियार को आवाज लगाई।)

हिरण्यक : मित्र, जल्दी आओ। मुझे बंधन से छुड़ाओ।

लुब्धक सियार : (गंभीर चेहरा बनाकर) अरे, तुम जाल में फँस गए? यह तो बुरा हुआ, बहुत बुरा। पर अब क्या हो सकता है ? वैसे तो मैं अपने पैने दाँतों से झटपट जाल काटकर इससे छुड़ा ही लेता। लेकिन क्या करूँ? आज मेरा व्रत है, तो आज तो मैं इस जाल को काटने से रहा। हाँ, कल तक इंतजार करो। कल मैं इस जाल को काटकर तुम्हें जरूर बंधन-मुक्त कर दूंगा।

(चित्रांग हिरन सियार की चालाकी समझ गया। अपने आप से..)

चित्रांग : ओह, अब मैं समझा इस दुष्ट की की करतूत। वैसे तो यह दोस्ती का दम भरता है, पर असल में मुझे खाना चाहता है। लगता है, अब तो मेरा बच पाना मुश्किल है। और यह दुष्ट सियार मुझे बचाना तो दूर, इस प्रतीक्षा में है कि मैं मरूँ तो यह जल्दी से मुझे चीथ डाले। तभी तो मेरे सच्चे दोस्तों ने इससे दोस्ती के लिए मना किया था। पर मैं इस दुष्ट की धोखे भरी बातों में आ गया। ओह, अब मैं क्या करूँ?

आठवाँ दृश्य

(उधर चित्रांग हिरन नहीं लौटा तो उसके तीनों दोस्तों को बड़ी चिंता हुई। लघुपतनक कौआ उसकी तलाश में उड़ते-उड़ते वहीं जा पहुँचा। उसने चित्रांग हिरन को जाल में फँसा देखा तो सारा माजरा समझ गया।)

हिरण्यक : अरे चित्रांग, यह क्या? जरूर यह लुब्धक सियार कीही करतूत है, जिसने तुम्हें फँसवा दिया। मैं कहता था न कि तुम्हारे साथ धोखा होगा। देखो, वही हुआ। अब तो बचाव का एक ही रास्ता है मित्र, कि तुम पेट फुलाकर लेट जाओ, ताकि बहेलिए तुम्हें मरा हुआ समझकर छोड़ दे। इस बीच मैं चुपचाप जाल काटता हूँ।

(बहेलियों ने सचमुच हिरन को मरा हुआ समझ लिया। पर इस बीच जाल कटने के बाद वह झटपट दौड़ा तो एक बहेलिए ने उसे मारने के लिए डंडा फेंका।)

बहेलिया : ठहर, मैं तुझे नहीं छोडूंगा, ठहर।

(चित्रांग हिरन झटपट छलाँग मारता हुआ दूर चला गया। धूर्त सियार एक झाड़ी के पीछे छिपा था। बहेलिए का फेंका हुआ डंडा सीधे जाकर उसे लगा। उसी समय उसका काम तमाम हो गया।)

पेड़ पर बैठी चिड़िया : आहा, चारों मित्र फिर साथ-साथ हैं। इन्हें साथ देखकर मुझे कितना अच्छा लगता है, मैं बता नहीं सकता।

गज्जू दादा : जंगल के मेरे प्यारे-प्यारे दोस्तो, इसके बाद का किस्सा यह है कि चारों सच्चे मित्र फिर से उसी तालाब की ओर चल पड़े। अब चित्रांग हिरन ने भी अच्छी तरह से समझ लिया था कि एक सच्चे मित्र और कपटी मित्र में फर्क क्या होता है ? इसके बाद उसने दोस्ती में कभी धोखा नहीं खाया। उम्मीद है, तुम लोग भी इस नाटक से सबक लोगे और सच्ची और झूठी दोस्ती का फर्क अच्छी तरह समझोगे। चलिए, इसके बाद हम सब मिलकर नारा लगाएँ कि यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे!

नवाँ दृश्य

(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान। बच्चे हवा दीदी को घेरकर खड़े हैं और बातें कर रहे हैं।)

हवा दीदी : तो देखा तुम लोगों ने भी नाटक?

निक्का : हाँ हवा दीदी, देखा।

निक्की : बहुत अच्छा था नाटक हवा दीदी! मैंने तो इससे बहुत कुछ सीखा भी है।

हवा दीदी : अच्छा, क्या सीखा तुमने इस नाटक से?

निक्का : यही कि दोस्ती तो वह है जो एकदम पक्की हो।

निक्की : ताकि जिससे दोस्ती हो, उसके लिए जान तक दे दें।

हवा दीदी : (सिर हिलाते हुए) वाह, यह हुई ना बात? मगर यह नहीं सीखा कि दोस्ती किससे नहीं करनी चाहिए?

निक्का : सीखा है हवा दीदी, वह भी सीखा है। जो बुरे लोग हैं, उनसे दोस्ती नहीं करनी चाहिए।

निक्की : और जो स्वार्थी हैं उनसे भी दोस्ती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये लोग मदद करने की बजाय उलटा धोखा देते हैं।

हवा दीदी : सचमुच तुमने समझ ली बात। यही तो गज्जू दादा भी समझा रहे थे जंगल में यह नाटक पेश करते समय।…अच्छा, अब विदा दो। मुझे जाना है दूर, बहुत दूर ताकि जंगल में गज्जू दादा का एक और बढ़िया सा नाटक देखकर तुम्हें भी दिखा सकूँ।

सब बच्चे : (एक साथ खुशी से भरकर) हुर्रे!

(हाथ हिलाती हुई हवा दीदी विदा लेती है। बच्चे हाथ हिलाकर उसे विदा कर रहे हैं। निक्का और निक्की के चेहरे उनमें सबसे अलग नजर आ रहे हैं।)

(परदा गिरता है।)

Moral Stories in Hindi “Yah Dosti Ab- Nahi Todengen” पंचतंत्र के अनोखे नाटक आपको पढ़ कर कैसा लगा कमेंट बॉक्स में बताए।

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